- भक्ति, संगीत और संस्कृति का दिव्य समागम,सितार, भजन और नृत्य ने रचा आध्यात्मिक उल्लास का अलौकिक दृश्य

वाराणसी (सुरेश गांधी)। आस्था की प्राचीन नगरी काशी इन दिनों चैत्र नवरात्रि की पावन आभा में डूबी हुई है। काशी विश्वनाथ मंदिर के दिव्य प्रांगण में जब सांझ उतरती है, तो केवल दीपों का प्रकाश ही नहीं, बल्कि भक्ति, संगीत और संस्कृति का अद्भुत आलोक भी वातावरण को आलोकित कर देता है। मंदिर न्यास द्वारा आयोजित नौ दिवसीय सांस्कृतिक संध्या श्रृंखला के अंतर्गत पंचमी के दिन यह दृश्य और भी अनुपम हो उठा, जब सुर, ताल और भावनाओं ने मिलकर श्रद्धा का एक जीवंत उत्सव रच दिया। कार्यक्रम का आरंभ जैसे ही हुआ, प्रख्यात कलाकार प्रो. डॉ. राजेश शाह के सितार की तारों ने एक ऐसी धुन छेड़ी, जिसने मानो समस्त वातावरण को आध्यात्मिक तरंगों से भर दिया। तबले पर विभास महाराज की सधी हुई संगति और बुद्ध आदित्य प्रधान के सितार सहयोग ने इस प्रस्तुति को और भी ऊँचाई प्रदान की। हर स्वर में भक्ति की गूंज थी, हर आलाप में काशी की आत्मा बोल रही थी। उपस्थित श्रद्धालु इस सुरमयी साधना में ऐसे डूबे कि समय मानो ठहर गया। इसके पश्चात भजन गायक सागर मिश्रा ने जब माँ भगवती और भगवान शिव की महिमा का गान किया, तो पूरा परिसर भक्ति रस में सराबोर हो उठा। उनके स्वर में ऐसी आत्मीयता थी कि हर श्रोता स्वयं को ईश्वर के समीप अनुभव करने लगा। “हर-हर महादेव“ के उद्घोष के बीच श्रद्धालुओं की आंखों में भक्ति की आर्द्रता स्पष्ट झलक रही थी।

सांस्कृतिक संध्या के इस अनुपम आयोजन में नृत्य ने भी अपनी मोहक उपस्थिति दर्ज कराई। रश्मि वर्मा और श्वेता मिश्रा ने दुर्गा स्तुति और शिव स्तुति पर आधारित भावपूर्ण नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके भाव, मुद्राएं और लयात्मक अभिव्यक्ति ने बनारस की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को सजीव कर दिया। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं देवी और देव महिमा के स्वरूप में अवतरित होकर इस आयोजन को दिव्यता प्रदान कर रहे हों। कार्यक्रम का संचालन प्रयागराज की ओजस्वी वक्ता श्वेता श्रीवास्तव ने किया, जिनकी सशक्त और प्रभावशाली शैली ने पूरे आयोजन को एक सूत्र में पिरोए रखा। उनकी वाणी में न केवल प्रवाह था, बल्कि वह भावनात्मक जुड़ाव भी था, जिसने दर्शकों को कार्यक्रम से निरंतर जोड़े रखा। चैत्र नवरात्रि के पंचमी दिवस का विशेष महत्व माता विशालाक्षी को समर्पित होने के कारण और भी बढ़ गया। इस पावन अवसर पर भगवान शिव के विश्वेश्वर स्वरूप के दर्शन कराकर, माता के लिए वस्त्र एवं श्रृंगार सामग्री को विधिपूर्वक अर्पित किया गया। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि काशी की उस जीवंत परंपरा का भी द्योतक है, जिसमें देव और देवी के मध्य प्रेम, सम्मान और समर्पण का भाव निरंतर प्रवाहित होता रहता है। न्यास द्वारा आयोजित यह सांस्कृतिक श्रृंखला केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि धर्म, अध्यात्म और संस्कृति के समन्वय का सशक्त माध्यम बन गई है। प्रतिदिन होने वाली इन प्रस्तुतियों में न केवल कलाकारों की प्रतिभा झलकती है, बल्कि श्रद्धालुओं की अटूट आस्था भी परिलक्षित होती है। पंचमी की इस संध्या में जब “हर-हर महादेव” का जयघोष पूरे धाम में गूंजा, तो वह केवल एक उद्घोष नही था वह काशी की आत्मा की पुकार थी, जो हर युग में, हर श्रद्धालु के हृदय में अनुगूंजित होती रहती है। इस प्रकार, काशी विश्वनाथ धाम में आयोजित यह सांस्कृतिक संध्या न केवल एक सफल आयोजन के रूप में संपन्न हुई, बल्कि यह श्रद्धा, परंपरा और सनातन संस्कृति के जीवंत उत्सव के रूप में जनमानस के हृदय में अपनी अमिट छाप छोड़ी.
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