नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के इसी संक्षिप्त लेकिन प्रभावशाली किरदार के लिए उन्हें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में स्पेशल ज्यूरी सम्मान से नवाज़ा गया था, जो उनके अभिनय की ताकत का प्रमाण है। समय के साथ नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी भारतीय सिनेमा के सबसे बहुमुखी और परिवर्तनशील अभिनेताओं में गिने जाने लगे हैं, जिन्हें अक्सर अपने आप में एक ‘एक्टिंग स्कूल’ कहा जाता है। दिलचस्प बात यह है कि जिस साल ‘कहानी’ रिलीज़ हुई थी, उसी साल नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने कई फिल्मों में दमदार अभिनय कर अपनी असाधारण प्रतिभा साबित की थी। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘तलाश’, ‘देख इंडियन सर्कस’ और ‘कहानी’ जैसी फिल्मों में उनके शानदार अभिनय के लिए उन्हें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में स्पेशल ज्यूरी अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। यह सम्मान इस बात का जश्न था कि उन्होंने एक ही साल में अलग-अलग किरदारों के जरिए दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी और खुद को अपनी पीढ़ी के बेहतरीन अभिनेताओं में स्थापित किया। आज जब ‘कहानी’ को पीछे मुड़कर देखा जाता है, तो नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का यह किरदार याद दिलाता है कि सिनेमा में कभी-कभी सबसे ताकतवर पल वही होते हैं, जो सबसे शांत और सादगी भरे किरदारों से आते हैं।
मुंबई (रजनीश के झा)। ‘कहानी’ की रिलीज़ को आज 14 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन यह फिल्म आज भी आधुनिक हिंदी सिनेमा के सबसे अलग और प्रभावशाली थ्रिलर्स में गिनी जाती है। सुजॉय घोष के निर्देशन में बनी यह 2012 की फिल्म पारंपरिक बॉलीवुड सस्पेंस ड्रामा की सीमाओं को तोड़ते हुए एक बेहद दिलचस्प कहानी लेकर आई थी। दुर्गा पूजा के दौरान कोलकाता की हलचल भरी पृष्ठभूमि में बुनी गई इस कहानी में विद्या बालन ने एक गर्भवती महिला का किरदार निभाया था, जो अपने लापता पति की तलाश में शहर में भटकती है। फिल्म में परमब्रत चटर्जी, सास्वत चटर्जी और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी जैसे कलाकारों ने भी दमदार अभिनय किया। खास बात यह थी कि फिल्म में छोटे से छोटे किरदार ने भी कहानी को गहराई दी। इन सभी प्रदर्शनों में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का इंटेलिजेंस ब्यूरो अधिकारी खान का किरदार आज भी याद किया जाता है। यह भूमिका भले ही लंबी नहीं थी, लेकिन हर सीन में उसका प्रभाव साफ दिखाई देता था। जांच में मदद करने वाले शांत और सूक्ष्म निरीक्षण करने वाले अधिकारी के रूप में नवाज़ुद्दीन ने बेहद संयमित और प्रभावशाली अभिनय किया। कम संवाद और नियंत्रित भाव-भंगिमाओं के साथ उन्होंने एक ऐसा किरदार रचा जो पूरी तरह वास्तविक और कहानी की दुनिया में घुला-मिला लगता था। यह प्रदर्शन इस बात का प्रमाण था कि किसी कलाकार के प्रभाव के लिए स्क्रीन टाइम से ज्यादा उसके अभिनय की गहराई मायने रखती है।

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