- फिलीपींस की खुदाई में मिले त्रिशूल और वज्र ने मुंबई में सामने आई सनातन प्रतीकों की अनोखी कहानी
प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने बताया कि इन कलाकृतियों में से त्रिशूल को लगभग 10,000 वर्ष पुराना और वज्र को लगभग 3,000 वर्ष पुराना माना जा रहा है। उनका दावा है कि ये सनातन परंपरा से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक हैं, जिनका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत बड़ा हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इन कलाकृतियों को 2016 में भारत लाया गया और उसके बाद उनके अध्ययन, दस्तावेज़ीकरण और शोध का कार्य शुरू किया गया। इस प्रेस कांफ्रेंस में डॉ वी. जयराज (वैज्ञानिक एवं कला इतिहासकार), श्री दीपेश मेहता (वकील एवं सॉलिसिटर (यू.के.) श्री नितेश मनोपारा (व्यवसायी) और ममता राजेश उताले (उद्यमी) भी उपस्थित थीं। अपने अनुभव साझा करते हुए सैयद शमीर हुसैन ने बताया कि खोज के कुछ दिनों बाद उन्हें साँप ने काट लिया था, लेकिन वे चमत्कारिक रूप से बच गए। उन्होंने इसे एक अद्भुत अनुभव बताया और कहा कि इन कलाकृतियों की खोज के बाद उनकी जिंदगी में कई सकारात्मक बदलाव आए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इस खोज के बारे में उन्होंने देश के कई मंत्रियों और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी पत्र लिखकर जानकारी दी है।
नीलामी की तैयारी और चैरिटी का संकल्प
प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी बताया गया कि इन दुर्लभ वस्तुओं की नीलामी 10 जून को प्रस्तावित है। नीलामी के लिए त्रिशूल की शुरुआती कीमत 500 करोड़ रुपये और वज्र की 250 करोड़ रुपये रखी गई है। यदि नीलामी से बड़ी राशि प्राप्त होती है तो उसका एक बड़ा हिस्सा चैरिटी के लिए उपयोग किया जाएगा। उनका लक्ष्य अनाथालयों की सहायता करना और बेसहारा बच्चों की शिक्षा के लिए योगदान देना है। करीब एक दशक तक चले शोध और अध्ययन के बाद इन कलाकृतियों को सार्वजनिक रूप से सामने लाया गया है। इस अनोखी खोज ने इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और आस्था से जुड़े लोगों के बीच उत्सुकता बढ़ा दी है। यदि इनकी ऐतिहासिकता और प्रामाणिकता पर व्यापक अध्ययन होता है, तो यह खोज प्राचीन सभ्यताओं, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सनातन परंपरा के वैश्विक प्रभाव से जुड़े नए अध्याय खोल सकती है।

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