अगर हम पूरे उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों की बात करें, तो सरकार की नल जल योजना के तहत हर घर तक पानी पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, राज्य के लगभग 75 से 80 प्रतिशत ग्रामीण घरों तक नल कनेक्शन पहुंच चुका है, लेकिन पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में यह व्यवस्था पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाई है। पोलिंग गांव इसका एक उदाहरण है, जहां कनेक्शन तो हैं, लेकिन नियमित जल आपूर्ति अभी भी सुनिश्चित नहीं हो पाई है। वहीं प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना के तहत उत्तराखंड में ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की गई है। वर्ष 2023–2024 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राज्य में इस योजना के अंतर्गत लगभग 2.5 लाख से अधिक घरों को बिजली कनेक्शन प्रदान किया जा चुका है। इसके साथ ही उत्तराखंड ने लगभग पूर्ण घरेलू विद्युतीकरण का लक्ष्य हासिल कर लिया है, जिसका अर्थ है कि कागज़ों पर अब लगभग हर घर तक बिजली का कनेक्शन मौजूद है। यह उपलब्धि निश्चित रूप से एक बड़ी प्रशासनिक सफलता के रूप में देखी जाती है, क्योंकि इससे दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों को भी बिजली नेटवर्क से जोड़ा जा सका है।
हालांकि, यदि बागेश्वर जैसे पहाड़ी जिलों की वास्तविक स्थिति पर नज़र डाली जाए, तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। यहां अधिकांश घरों तक बिजली के कनेक्शन तो पहुंच चुके हैं, लेकिन बिजली की आपूर्ति अब भी अनियमित बनी हुई है। विशेषकर बारिश और बर्फबारी के दौरान बिजली की लाइनें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, जिससे कई गांवों में घंटों नहीं बल्कि दिनों और कभी-कभी हफ्तों तक बिजली नहीं रहती। इस तरह, कनेक्शन होने के बावजूद लगातार और भरोसेमंद बिजली आपूर्ति का अभाव ग्रामीण जीवन को प्रभावित करता है। यह स्थिति इस बात को स्पष्ट करती है कि केवल बिजली पहुंचाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां भौगोलिक परिस्थितियां पहले से ही चुनौतीपूर्ण हैं। दरअसल विकास केवल योजनाओं और आंकड़ों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसका असर जमीनी स्तर पर लोगों के जीवन में दिखाई देना चाहिए। जब तक हर घर में साफ पानी और हर कमरे में रोशनी नहीं पहुंचेगी, तब तक प्रगति अधूरी रहेगी। इन पहाड़ों के बीच रहने वाली लड़कियां और महिलाएं हर दिन अपने संघर्ष से एक नई उम्मीद को जन्म दे रही हैं। अब समय है कि उनकी इस आवाज को सुना जाए और उनके जीवन में वास्तविक बदलाव लाया जाए, ताकि पहाड़ों का यह संघर्ष एक दिन खुशियों की गूंज में बदल सके और विकास की वास्तविक परिभाषा जमीन पर उतरती नजर आए।
दीक्षा
पोलिंग, उत्तराखंड
टीम, गाँव की आवाज़
(यह लेखिका का निजी विचार है)



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