वाराणसी : पत्रकारिता नहीं, बन गया कारोबार: कुछ रुपयों में मिल रहा ‘प्रेस’ का तमगा - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 12 मार्च 2026

वाराणसी : पत्रकारिता नहीं, बन गया कारोबार: कुछ रुपयों में मिल रहा ‘प्रेस’ का तमगा

  • मैदान की तपस्या से कमाई जाने वाली पहचान आज कार्ड और रजिस्ट्रेशन के नाम पर बेची जा रही है
  • यह प्रवृत्ति न केवल पेशे का अपमान है बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता के लिए भी खतरा है।

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वाराणसी (सुरेश गांधी). भारत में पत्रकारिता को लंबे समय से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता रहा है। यह वह शक्ति है जो सत्ता से सवाल करती है, समाज की आवाज़ बनती है और अन्याय के विरुद्ध खड़ी होती है। लेकिन आज इसी पत्रकारिता के नाम पर एक चिंताजनक प्रवृत्ति तेजी से पनप रही हैकृकुछ पैसों में “रजिस्टर्ड पत्रकार” बनाने का कारोबार। आज स्थिति यह है कि जिस पेशे को पाने के लिए कभी वर्षों की मेहनत, अध्ययन, संघर्ष और मैदान में काम करने का अनुभव आवश्यक होता था, उसी पेशे की पहचान अब कुछ लोगों के लिए दो मिनट की मैगी की तरह बनती जा रही है। सोशल मीडिया या कुछ तथाकथित संस्थाओं के जरिए कुछ सौ या हजार रुपये देकर “पत्रकार” बनने के फर्जी प्रमाणपत्र और आईडी कार्ड बांटे जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति केवल हास्यास्पद नहीं है, बल्कि बेहद खतरनाक भी है।


पत्रकारिता : पेशा नहीं, जिम्मेदारी

पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। एक पत्रकार का काम है सत्य को सामने लाना, जनहित के मुद्दों को उठाना और सत्ता को जवाबदेह बनाना। इसके लिए साहस, ईमानदारी और गहरी सामाजिक समझ की आवश्यकता होती है। एक सच्चा पत्रकार वर्षों तक धूप, धूल, संघर्ष और जोखिम के बीच काम करता है। कभी बाढ़ग्रस्त इलाकों में जाकर रिपोर्टिंग करता है, कभी प्रशासनिक भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करता है, तो कभी समाज के हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज बनता है। इस पूरी प्रक्रिया में वह अपनी विश्वसनीयता और पहचान अर्जित करता है। लेकिन आज जब कोई व्यक्ति कुछ रुपये देकर “पत्रकार” का कार्ड प्राप्त कर लेता है, तो यह न केवल उस व्यक्ति की मानसिकता को दर्शाता है बल्कि पूरे पेशे की गरिमा को भी चोट पहुंचाता है।


फर्जी पत्रकारों का बढ़ता नेटवर्क

देश के कई हिस्सों में यह देखने को मिल रहा है कि कुछ संस्थाएं और तथाकथित संगठन पत्रकार बनाने के नाम पर रजिस्ट्रेशन शुल्क लेते हैं और बदले में कार्ड, सर्टिफिकेट या पदवी प्रदान करते हैं। इनका पत्रकारिता से वास्तविक रूप से कोई संबंध नहीं होता, लेकिन यह लोगों को “मीडिया” की पहचान का लालच देकर पैसा कमाते हैं। ऐसे कई मामलों में देखा गया है कि फर्जी कार्ड लेकर कुछ लोग सरकारी कार्यालयों में दबाव बनाने की कोशिश करते हैं, छोटे व्यापारियों को डराते हैं या फिर अपनी निजी स्वार्थ सिद्धि के लिए “पत्रकार” की पहचान का उपयोग करते हैं। इससे दोहरा नुकसान होता हैकृएक तरफ समाज में पत्रकारिता की छवि खराब होती है और दूसरी तरफ असली पत्रकारों की मेहनत पर भी सवाल उठने लगते हैं।


असली पत्रकारों के लिए चुनौती

जो पत्रकार वर्षों से ईमानदारी से काम कर रहे हैं, उनके लिए यह स्थिति बेहद पीड़ादायक है। वे जानते हैं कि पत्रकारिता केवल खबर लिखने का काम नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाने का संकल्प है। जब कोई व्यक्ति बिना किसी अनुभव, प्रशिक्षण या नैतिक जिम्मेदारी के “पत्रकार” बन जाता है, तो वह इस पेशे की गरिमा को कमजोर करता है। कई बार ऐसे लोग गलत सूचनाएं फैलाते हैं, अफवाहों को खबर बनाकर प्रस्तुत करते हैं या फिर निजी लाभ के लिए मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि आम जनता के बीच मीडिया की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगने लगता है।


सोशल मीडिया ने बढ़ाई समस्या

डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने सूचना के प्रसार को आसान बना दिया है। यह लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक अवसर भी है, लेकिन इसी माध्यम का उपयोग करके कई लोग खुद को “मीडिया” या “पत्रकार” घोषित कर देते हैं। कुछ फेसबुक पेज, यूट्यूब चैनल या व्हाट्सऐप समूह बनाकर लोग स्वयं को पत्रकार बताने लगते हैं। यह अलग बात है कि इनमें से अधिकांश के पास पत्रकारिता का कोई प्रशिक्षण, नैतिक मानदंड या पेशेवर जिम्मेदारी नहीं होती। जब ऐसे लोग “प्रेस” का टैग लगाकर समाज में सक्रिय होते हैं, तो यह न केवल भ्रम पैदा करता है बल्कि पत्रकारिता की साख को भी कमजोर करता है।


सख्त कार्रवाई की आवश्यकता

इस स्थिति से निपटने के लिए जरूरी है कि संबंधित संस्थाएं और सरकारी एजेंसियां गंभीरता से कदम उठाएं। पत्रकारिता के नाम पर चल रहे ऐसे फर्जी कारोबार की जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। इस दिशा में च्तमे ब्वनदबपस वि प्दकपं जैसी संस्थाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके अलावा राज्य सरकारों के सूचना विभाग, पत्रकार संगठनों और मीडिया संस्थानों को भी मिलकर इस समस्या का समाधान निकालना होगा। जरूरी है कि पत्रकारिता की पहचान को केवल पंजीकरण या कार्ड तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे पेशेवर मानकों और नैतिकता से जोड़ा जाए।


समाज की भी जिम्मेदारी

इस समस्या का समाधान केवल संस्थागत कार्रवाई से ही नहीं होगा, बल्कि समाज को भी जागरूक होना होगा। आम नागरिकों को यह समझना चाहिए कि हर “प्रेस” लिखी गाड़ी या कार्डधारी व्यक्ति असली पत्रकार नहीं होता। लोगों को मीडिया की विश्वसनीय संस्थाओं और अनुभवी पत्रकारों की पहचान करनी चाहिए और अफवाह फैलाने वाले तथाकथित “दो मिनट के पत्रकारों” से सावधान रहना चाहिए।


पत्रकारिता न सिर्फ समाज को दिशा दी है, बल्कि लोकतंत्र की मजबूत कड़ी है 

मेरा मानना है कि पत्रकारिता का इतिहास संघर्ष, साहस और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता से भरा हुआ है। इस पेशे ने समाज को दिशा दी है और लोकतंत्र को मजबूत बनाया है। लेकिन यदि पत्रकारिता की पहचान कुछ रुपयों में मिलने वाले कार्ड तक सीमित हो जाएगी, तो यह न केवल इस पेशे के लिए बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरा बन जाएगी। इसलिए समय की मांग है कि फर्जी पत्रकार बनाने के कारोबार पर तुरंत रोक लगे, दोषियों पर कार्रवाई हो और पत्रकारिता की गरिमा को बचाने के लिए सभी जिम्मेदार संस्थाएं और समाज मिलकर आगे आएं। क्योंकि सच यही है पत्रकार बनने के लिए पैसे नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, ईमानदारी और सत्य के प्रति अटूट प्रतिबद्धता चाहिए। और यही वह कसौटी है जो असली पत्रकार को “दो मिनट के पत्रकार” से अलग करती है।

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