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मंगलवार, 31 मार्च 2026

विशेष : क्लाइमेट के मोर्चे पर स्टील सेक्टर फेल. स्कोरकार्ड ने खोली पोल

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दुनिया की ऊंची-ऊंची इमारतें, पुल, रेल और फैक्ट्रियां जिस स्टील पर खड़ी हैं, उसी स्टील सेक्टर की क्लाइमेट तैयारी अब सवालों के घेरे में है। क्लाइमेट वाच द्वारा जारी नए “कॉरपोरेट स्कोरकार्ड” ने एक साफ और असहज तस्वीर सामने रखी है, जिसमें दुनिया की 18 बड़ी स्टील कंपनियों में से एक भी ऐसी नहीं है जो खुद को कम-एमिशन भविष्य के लिए तैयार कह सके। यह आकलन ब्राजील, चीन, जर्मनी, स्वीडन, जापान, भारत, दक्षिण कोरिया, अमेरिका और अन्य देशों की प्रमुख कंपनियों पर आधारित है, जिनमें Tata Steel, ArcelorMittal, Nippon Steel और POSCO जैसी दिग्गज कंपनियां शामिल हैं। इन सभी कंपनियों का उत्पादन अभी भी बड़े पैमाने पर कोयले पर आधारित ब्लास्ट फर्नेस तकनीक पर टिका है, जो इस सेक्टर के कुल एमिशन का लगभग 90% तक जिम्मेदार मानी जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, 100 में से किसी भी कंपनी का स्कोर 50 तक नहीं पहुंच पाया। ज्यादातर कंपनियां 20 से 30 के बीच सिमटी हुई हैं और औसत स्कोर 27 है। इसका मतलब साफ है, नेट जीरो 2050 जैसे लक्ष्य घोषित करना काफी नहीं है, जब तक उसके पीछे ठोस निवेश और तकनीकी बदलाव नहीं दिखते।


Caroline Ashley इस स्थिति को सीधे शब्दों में “शर्मनाक” बताती हैं। उनके मुताबिक, “कोई भी स्टील कंपनी 50 अंक तक नहीं पहुंच पाई है, और जो सबसे आगे हैं, उनके पास भी लंबा रास्ता बाकी है। कंपनियों की मौजूदा तैयारी और क्लाइमेट की जरूरतों के बीच बड़ा अंतर साफ दिख रहा है।” स्टील सेक्टर वैश्विक CO2 एमिशन का लगभग 10% हिस्सा है, इसलिए यहां बदलाव सिर्फ उद्योग की जरूरत नहीं, बल्कि क्लाइमेट लक्ष्य हासिल करने की शर्त बन चुका है। लेकिन स्कोरकार्ड दिखाता है कि कंपनियां अभी भी छोटे-छोटे कदमों में उलझी हुई हैं, जबकि जरूरत बड़े और संरचनात्मक बदलाव की है। इस आकलन में कंपनियों की “ट्रांजिशन रेडीनेस” को कई आधारों पर परखा गया है, जैसे कोयले पर निर्भरता, ग्रीन आयरन का इस्तेमाल, नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी, पारदर्शिता और भविष्य की निवेश योजनाएं। इन सभी में सबसे बड़ी कमजोरी दो जगह साफ दिखती है, कोयले से बाहर निकलने की ठोस योजना का अभाव और ग्रीन आयरन जैसे विकल्पों का लगभग न के बराबर इस्तेमाल।


ग्रीन आयरन और रिन्यूएबल एनर्जी के इस्तेमाल के मामले में औसत स्कोर 25 में से सिर्फ 0.6 है। हर एक कंपनी का ग्रीन आयरन खपत पर स्कोर शून्य है। इसका मतलब है कि जिस तकनीक को भविष्य माना जा रहा है, वह अभी तक जमीन पर उतरी ही नहीं है। कोयले पर निर्भरता इस ट्रांजिशन की सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई है। 18 में से ज्यादातर कंपनियों ने हाल के वर्षों में कोयला आधारित परिसंपत्तियों में निवेश किया है या नए निवेश की घोषणा की है। जिन कंपनियों का प्रदर्शन थोड़ा बेहतर है, वे वही हैं जिन्होंने ब्लास्ट फर्नेस को बंद करने की समयबद्ध योजना बनाई है और ग्रीन तकनीकों में निवेश शुरू किया है। इनमें SSAB और thyssenkrupp आगे दिखती हैं, जिनके स्कोर क्रमशः 46.2 और 41.9 हैं। हालांकि ये भी अभी लक्ष्य से काफी दूर हैं, लेकिन इन्होंने ग्रीन आयरन और ब्लास्ट फर्नेस से बाहर निकलने की दिशा में कुछ ठोस कदम उठाए हैं। इसके उलट, Hyundai Steel, Nippon Steel और HBIS सबसे पीछे हैं। इन कंपनियों में कोयले पर भारी निर्भरता, रिन्यूएबल ऊर्जा का बेहद कम उपयोग और ग्रीन आयरन पर ठोस प्रगति का अभाव देखा गया है।


रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि समस्या सिर्फ तकनीक की नहीं है, बल्कि फैसलों की है। स्टील सेक्टर में एक बार लगाया गया निवेश दशकों तक चलता है, इसलिए आज लिए गए फैसले आने वाले कई वर्षों के एमिशन तय करते हैं। अगर अभी भी कोयले पर आधारित ढांचे में निवेश जारी रहा, तो भविष्य में बदलाव और मुश्किल हो जाएगा। फिर भी, कुछ छोटे संकेत उम्मीद के भी हैं। कई कंपनियों ने नए ब्लास्ट फर्नेस बनाने की योजना फिलहाल रोक दी है। कुछ के पास डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI) क्षमता है, जिसे भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन के जरिए कम-उत्सर्जन उत्पादन में बदला जा सकता है। लेकिन रिपोर्ट साफ कहती है कि घोषणाएं काफी नहीं हैं, असली बदलाव तभी माना जाएगा जब जमीन पर बड़े पैमाने पर ग्रीन तकनीक लागू हो। कुल मिलाकर, यह स्कोरकार्ड एक साफ संदेश देता है। स्टील सेक्टर अभी उस बदलाव के लिए तैयार नहीं है, जिसकी क्लाइमेट संकट मांग करता है। वादे और लक्ष्य अपनी जगह हैं, लेकिन जब तक कोयले से बाहर निकलने और ग्रीन उत्पादन को तेजी से बढ़ाने के ठोस कदम नहीं उठते, तब तक यह “ट्रांजिशन” कागजों से आगे नहीं बढ़ेगा।

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