बिहार विशेष : गांव के युवाओं में हुनर है, मगर बाज़ार नहीं - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

बिहार विशेष : गांव के युवाओं में हुनर है, मगर बाज़ार नहीं

Bihar-villege-market
देश के ग्रामीण इलाकों में हुनर की कमी नहीं है, बात अगर बिहार की करें तो यहां हर गांव एक चलता-फिरता कारीगर विद्यालय लगता है। कहीं मिट्टी को आकार देकर सुंदर बर्तन बनाए जाते हैं, तो कहीं सुई-धागे और रंगों से दीवारों और कपड़ों पर ऐसी कलाकारी की जाती है, जिसे देखकर शहरों की महंगी गैलरियां भी फीकी पड़ जाएं। लेकिन विडंबना यह है कि इतना हुनर होने के बावजूद नौजवानों के लिए रोजगार और बाजार की कमी आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यही कारण है कि या तो वे बेरोजगार हैं या फिर अपने गांव और परिवार को छोड़कर दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं। इसका असर केवल परिवारों पर ही नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही पारंपरिक हस्तकलाओं पर भी पड़ रहा है, जो अब धीरे-धीरे मिटने की कगार पर पहुँच रही हैं।


भारत जैसे विशाल देश में बेरोजगारी की समस्या लंबे समय से चिंता का विषय रही है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 में देश की बेरोजगारी दर वर्ष 2023-24 में लगभग 3.2% दर्ज की गई, जबकि युवाओं के बीच बेरोजगारी की दर इससे कहीं अधिक है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच रोजगार के अवसरों में बड़ा अंतर भी देखने को मिलता है, जिससे ग्रामीण युवाओं को अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यदि बिहार की बात करें, तो यहां बेरोजगारी का संकट विशेष रूप से युवाओं के बीच गहराता जा रहा है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, राज्य में बेरोजगारी दर लगभग 11.4% के आसपास बताई गई है, जो कई अन्य राज्यों की तुलना में अधिक है। इसके साथ ही यह भी देखा गया है कि नियमित और स्थायी नौकरियों की भारी कमी है, जिसके कारण बहुत से लोग अस्थायी या अनियमित काम करने को मजबूर हैं। हाल के वर्षों में युवाओं में बेरोजगारी की दर फिर से बढ़कर लगभग 16% तक पहुँचने की खबरें सामने आई हैं, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाती हैं।


यहां बेरोजगारी की समस्या का सबसे बड़ा कारण रोजगार के सीमित अवसर और कौशल के अनुसार काम का अभाव है। बिहार की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है, जहां लगभग 54% से अधिक लोग कृषि से जुड़े हुए हैं। लेकिन कृषि कार्य मौसमी होने के कारण पूरे वर्ष रोजगार उपलब्ध नहीं रहता। इसके परिणामस्वरूप ग्रामीण युवाओं को वर्ष के कई महीनों में खाली बैठना पड़ता है या फिर उन्हें दूसरे राज्यों जैसे दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र की ओर पलायन करना पड़ता है। बिहार के उत्तरी भाग, विशेषकर सीतामढ़ी और मिथिला क्षेत्र, अपनी पारंपरिक हस्तकलाओं के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध रहे हैं। मिथिला क्षेत्र की मधुबनी पेंटिंग जहां भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों तक अपनी पहचान बना चुकी है। वहीं सीतामढ़ी और उसके आसपास के क्षेत्र की हस्तकलाएं जैसे सिक्की घास से बनी टोकरियाँ, बाँस से बनी हस्तशिल्प, लकड़ी के खिलौने और मिट्टी के बर्तन जैसी कई पारंपरिक कलाएं भी पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी पहचान बनाई हुई है। इन कलाओं में स्थानीय संसाधनों का उपयोग किया जाता है, जिससे पर्यावरण को भी नुकसान नहीं होता। लेकिन आज इन पारंपरिक हस्तकलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती है बाज़ार की कमी और उचित मूल्य का अभाव। कई बार कारीगरों को महीनों की मेहनत के बाद भी इतना पैसा नहीं मिलता कि वे अपने परिवार का खर्च आसानी से चला सकें।


इसकी वजह से आज की नई पीढ़ी अब इन कलाओं से दूरी बनाने लगी है क्योंकि उन्हें इनमें भविष्य सुरक्षित नहीं दिखता है। जब उन्हें यह महसूस होता है कि शहर में मजदूरी या किसी छोटे-मोटे काम से भी अधिक पैसा मिल सकता है, तो वे पारंपरिक हुनर को छोड़कर दूसरे रोजगार की ओर मुड़ जाते हैं। इससे एक ओर तो पारंपरिक हस्तकलाएँ समाप्त होने लगती हैं, वहीं दूसरी ओर गांव की सांस्कृतिक पहचान भी कमजोर होती जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ाने के लिए सबसे आवश्यक है कि स्थानीय हुनर को बाजार से जोड़ा जाए। इसके लिए सरकार और निजी संस्थानों को मिलकर काम करना होगा। निवेशकों को आकर्षित करने के लिए जिला और राज्य स्तर पर हस्तशिल्प मेलों का आयोजन, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से बिक्री, प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना और आधुनिक डिज़ाइन की जानकारी देना ऐसे कदम हैं, जो कारीगरों की आय बढ़ा सकते हैं। यदि कारीगरों को उनके हुनर का उचित मूल्य मिलने लगे, तो वे न केवल अपने गांव में रहकर सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे, बल्कि पारंपरिक कलाओं को भी जीवित रख सकेंगे।


इसके साथ ही कौशल विकास कार्यक्रमों का विस्तार भी अत्यंत आवश्यक है। यदि युवाओं को पारंपरिक हुनर के साथ-साथ आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण दिया जाए, तो वे अपने हुनर को नए रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, मधुबनी पेंटिंग को केवल दीवारों तक सीमित न रखकर कपड़ों, बैग, सजावटी वस्तुओं और डिजिटल माध्यमों में उपयोग किया जा सकता है। इससे न केवल इस कला की पहचान बढ़ेगी, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी उत्पन्न होंगे। अंततः यह कहा जा सकता है कि बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर और हर हाथ में हुनर है, लेकिन बाजार के अवसरों की कमी ने इस हुनर को संकट में डाल दिया है। यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां इन पारंपरिक कलाओं को केवल किताबों और संग्रहालयों में ही देख पाएँगी। इसलिए आवश्यक है कि सरकार, समाज और बाजार मिलकर ऐसे प्रयास करें, जिससे गांव का हुनर गांव में ही सम्मान और रोजगार का स्रोत बन सके। जब हुनर को सही मंच मिलेगा, तब न केवल बेरोजगारी कम होगी, बल्कि बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत भी सुरक्षित रह सकेगी।







Sarita-kumari-ganv-ki-awaz

सरिता कुमारी

सीतामढ़ी, बिहार

टीम, गाँव की आवाज़

(यह लेखिका की निजी राय है)

कोई टिप्पणी नहीं: