विचार : कमजोर मानसून और आपदा प्रबंधन - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

विचार : कमजोर मानसून और आपदा प्रबंधन

Dr-rajendra-sharma
आगामी मानसून को लेकर के पहला पूर्वानुमान जारी करने के साथ ही मौसम विभाग ने आने वाले मानसूनी सत्र में सामान्य से कम बरसात के संकेत दे दिए हैं। हांलाकि अभी मानसून के पूर्वानुमान और भी जारी किये जाएंगे पर यह आरंभिक सूचना आने वाले समय के लिए गंभीर संकेत है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार सामान्य से 8 फीसदी तक कम बरसात की संभावना जताई गई है। देष के कई हिस्सों में कम बरसात होने के संकेत है तो कुछ हिस्सों में सामान्य बरसात भी हो सकती है। माना जा रहा है कि अल नीनो इफेक्ट के चलते मानसून कमजोर रहेगा। यह भी सही है कि हमारे मौसम मंत्रालय द्वारा जारी पूर्वानुमान अब काफी हद तक आसपास रहने लगे हैं। यहां तक कि दो से तीन घंटों में बरसात होने या आंधी तूफान या ओलावृष्टि तक के पूर्वानुमान खरे उतरने लगे हैं। ऐसे में मौसम विभाग के पूर्वानुमानों को गंभीरता से लेते हुए केन्द्र व राज्यों की सरकारों को अभी से पूर्व तैयारियां करने में जुट जाना चाहिए। खासतौर से आपदा प्रबंधन मंत्रालय को अभी से भावी रणनीति तय करनी होगी। देष में मानसून सीजन में 87 सेमी बरसात होती है जिसके अनुमानों के अनुसार 81 सेमी तक रहने की आशंका है। पूर्वानुमानों को माने तो 2018 में 91 प्रतिशत बरसात हुई थी उसके बाद के सालों में मानसून लगभग अच्छा ही रहा है। पिछले आठ सालों में मानसून की स्थिति देखें तो 2023 में मानसून अवश्य कमजोर रहा है अन्यथा देष में मानसूनी वर्षा 100 प्रतिशत के आसापास व इससे अधिक ही रही है।


हमारे देश में मानसूनी बरसात पर निर्भरता अधिक है। जहां खेती में मानसूनी बरसात की निर्भरता बहुत अधिक है तो दूसरी और पेयजल को लेकर भी मानसून पर निर्भरता अधिक है। जलाशयों में पानी के भण्डारण और भूजल स्तर भी बरसाती पानी पर ही निर्भर है। हमारी खेती मुख्यतः मानसून पर निर्भर हैं। सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता कमी के कारण मानसून पर खेती 55 से 64 प्रतिशत निर्भर है। पीने के पानी की समस्या भी कमजोर मानसून से प्रभावित होती है। हमारे यहां मानसून का समय जून से सितंबर तक का रहता है। अब सवाल उठता है कि पिछले सालों में मानसून सामान्य से अच्छा रहने के बावजूद कमजोर मानसून की स्थिति से निपटने में हमारी तैयारी कोई अच्छी नहीं मानी जा सकती। अत्यधिक भूजल दोहन और जल संचयन की दीर्घकालीक नीति के अभाव में ठोस परिणाम प्राप्त नहीं हो पाये हैं। ऐसा नहीं है कि नीति नहीं बनती हो या ऐसा भी नहीं है कि जल संचयन के प्रयास नहीं होते हो पर जो परिणाम देखने में आए हैं वह कोई आशाजनक नहीं माने जा सकते। पानी के विवेकपूर्ण उपयोग की बात करना तो हमारे यहां बेमानी ही रही है। प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण व संधारण में भी हम कुछ अधिक नहीं कर पाये हैं। इसके अलावा हमारे यहां दुर्भाग्यजनक बात यह है कि तात्कालिक प्रयास होते हैं। शहरीकरण की आड़ में प्राकृतिक जल स्रोत या तो नष्ट हो गए हैं या उनमें बरसात के पानी जाने के रास्ते अवरुद्ध या बंद हो गए हैं। नदी नालों के रास्ते या तो बंद हो गए हैं या अवरुद्ध हो गए हैं। बरसात के पानी के जलाशयों में रास्तों में अनधिकृत कब्जें, निर्माण और रिसोर्ट बना दिए है। एक समय ऐसा भी आया कि जब विशेषज्ञों ने बरसात के पानी जाने के रास्तों में जगह जगह एनिकट बनाने की सलाह दे ड़ाली और छोटे छोटे एनिकट बनने से नदियों-जलाशयों में पानी की आवक प्रभावित हो गई। इससे तात्कालीक यानी कि एनिकटों में पहले पानी एकत्र तो हुआ पर बाद में इनका रख रखाव नहीं होने से दोहरा नुकसान हुआ। इसी तरह से वर्षा जल संचयन के लिए वाटर हार्वेंस्टिंग सिस्टम के लिए सरकार ने अरबों रुपये खर्च किये पर उनके निर्माण के आंकड़ें पूरे करने के चक्कर में हम भूल गए कि बरसात के पानी इनमें कितना व कैसे जा पाएगा। फिर बरसात से पहले इनकी देखरेख पर भी ध्यान नहीं देने से जो परिणाम मिलने चाहिए थे वे नहीं मिल सके हैं। एक और हमारे दैनिक उपभोग में भी पानी का उपयोग अधिक बढ़ा है आज पेयजल से कई गुणा अधिक पानी टायलेट और कुलरों में उपयोग होने लगा है। समय रहते टायलेट में कम पानी के उपयोग की कोई राह निकाली जाती तो हालात में सुधार ही होता। इसी तरह से देशभर में वाटर ट्र्टिमेंट सिस्टम लगाने का अभियान चला पर इनके परिणाम भी ज्यादा अच्छे नहीं देखे जा रहे है। रिसाइकिल पानी को लेकर भी कोई स्पष्ट नीति तय हो तो कुछ हद तक समाधान हो सकता है। खैर यह तो हालात की तस्वीर है।


सौ टके का सवाल यह है कि कमजोर मानसून के हालात से निपटने की कार्ययोजना हमें अभी से बनानी होगी। मौसम विभाग ने अप्रेल में यह चेतावनी दे दी है। मानसून जून में आएगा। ऐसे में अभी मई का महीना हमारे पास है। अभी से सरकार को कमर कसनी होगी। कमजोर मानसून के हालात में हमें कम पानी से अधिक बेहतर हालात बनाने के प्रयास करने होंगे। इसके लिए जहां पानी की एक एक बूंद को सहेजने की रणनीति तैयार करनी होगी वहीं कृषि मंत्रालय को खरीफ के लिए इस तरह की रणनीति बनानी होगी जिसमें कम पानी के उपयोग से बेहतर फसल तैयार होने वाली फसलों और किस्मों के लिए किसानों को प्रेरित हो सके। खेती किसानी भी प्रभावित ना हो और पैदावार भी अच्छी हो इसकी रणनीति बनानी होगी। अधिक पानी की आवश्यकता वाली फसलों की खेती ना करने के लिए किसानों को उत्साहित करना होगा। इसी तरह से जलाशयों, बांधों में उपलब्ध पानी का प्रबंधन योजनाबद्ध तरीके से करना होगा। अभी से आमजन को पानी के अपव्यय को रोकने के लिए प्रेरित करना होगा। कहने का अर्थ है कि जब आने वाले हालात की तस्वीर हमारे सामने कमोबेस आ चुकी है तो फिर समय रहते इस तरह की रणनीति बनानी होगी ताकि कमजोर मानसून में भी हमारी जल प्रबंधन क्षमता बेहतर रह सके। आपदा प्रबंधन मंत्रालय को अभी से संबंधित मंत्रालयों खासतौर से कृषि, जल आपूर्ति करने वाले विभागों, बांधों एवं जलाशयों का प्रबंधन करने वाले विभागों, जल संसाधन विभागों से समन्वय बनाकर रणनीति तैयार करनी होगी। इसके साथ ही आमजन को भी पानी के उपयोग को लेकर अधिक सजग और जिम्मेदार नागरिक के रुप में भूमिका निभानी होगी।






डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

स्तंभकार

कोई टिप्पणी नहीं: