- संत समागम के अंतिम दिवस महामंडलेश्वर महंत रामभूषण दास ने कहा कथाओं के कारण ही हमारी सनातनी संस्कृति आज तक जीवित

सीहोर। इंटरनेट के कारण अश्लील सामग्रियों की बाढ़ सी आ गई है। जिससे हमारी मानसिकता दूषित हो रही है और कुछ षडयंत्रकारी लोग यही चाह रहे है कि हमारी मानसिकता दूषित हो और हम और हमारी संस्कृति पिछड जाए। लेकिन कथाओं और सत्संग के कारण ही हमारी सनातनी संस्कृति आज तक जीवित है इसलिए जहां भी कथा हो श्रवण अवश्य करना चाहिए, जहां पर भी धार्मिक कार्य हो वहां पर अपना योगदान देना चाहिए। नई पीढ़ी में अच्छे संस्कार डालने और भारत की गौरवशाली परंपरा से वाकिफ करवाने के लिए शिक्षा पद्धति में कुछ बदलाव की आवश्यकता है। उक्त विचार शहर के प्राचीन सिद्ध पीठ श्री नृसिंह लक्ष्मी मंदिर कोलीपुरा में आयोजित संत समागम के अंतिम दिवस श्री-श्री 1008 महामंडलेश्वर महंत रामभूषण दास महाराज ने कहे। शहर के कोलीपुरा में आर्यावत षट्दर्शन साधु मंडल भारत के तत्वाधान में दो दिवसीय संत समागम का आयोजन किया गया था। रविवार को अंतिम दिवस यहां पर आए संत समागम और महाकुंभ कलश यात्रा में शामिल साधु-संतों का महामंडलेश्वर महंत रामभूषण दास महाराज, संत माधव दास महाराज, मुख्य यजमान श्रीमती नमिता अखिलेश राय, यात्रा प्रभारी सन्नी सरदार, यज्ञाचार्य पंडित कुणाल व्यास, बजरंग दल के अध्यक्ष जगदीश कुशवाहा, सह प्रभारी रजत मुंदडा आदि ने यहां पर आए नागा साधुओं और संतों का सम्मान कर विदाई दी। वहीं सुबह यहां पर पंचाग पूजन, मंडल प्रवेश, देवता आह्वान और अग्रि स्थापना का आयोजन यज्ञशाला में किया गया। वहीं भव्य पंच कुण्डात्मक श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ के दूसरे दिवस सुबह आठ बजे प्रथम सत्र में नित्य पूजन, अभिषेक, अर्चन और हवन का आयोजन किया जाएगा।
सनातन धर्म में सत्य का सबसे ज्यादा महत्व
संस्कार मंच के प्रभारी मनोज दीक्षित मामा ने बताया कि सनातन धर्म में सत्य का सबसे ज्यादा महत्व है। सत्य का अर्थ केवल सही बोलना नहीं, बल्कि सत्य के मार्ग पर अडिग रहना है। सत्य ही सनातन धर्म का मूल है। प्रभु श्रीराम के पूर्वज राजा हरिशचंद्र ने सत्य की रक्षार्थ अपना सबकुछ त्याग दिया था। उसी प्रकार से प्रभु श्रीराम ने भी सत्य पर कायम रहकर सबकुछ त्याग दिया। श्रीराम ने पिता के वचन को निभाने के लिए राजपाट त्याग दिया, वहीं श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में सत्य के मार्ग पर चलने के महत्व को बताया। उन्होंने कहा कि सत्य ही धर्म है और धर्म की रक्षा करना ही कर्तव्य है। श्रीकृष्ण ने तो यहां तक कहा की सत्य ही ईश्वर है। सत्य को समझने के लिए एक तार्किक बुद्धि की आवश्यकता होती है। तार्किक बुद्धि आती है भ्रम और द्वंद्व के मिटने से। भ्रम और द्वंद्व मिटता है मन, वचन और कर्म से एक समान रहने से। इससे जीवन का लक्ष्य साधने में आसानी होती है।
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