नई दिल्ली (रजनीश के झा)। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने रविवार को कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और डिजिटल उपकरणों का उपयोग केवल सहायक उपकरणों के रूप में किया जाना चाहिए और उन्हें न्यायिक तर्क को दरकिनार करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उच्चतम न्यायालय की ई-समिति द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, न्यायमूर्ति बिंदल ने ओपन-सोर्स प्लेटफॉर्म के उपयोग और डेटा की गोपनीयता के संभावित जोखिमों के संबंध में भी चिंता व्यक्त की। ये टिप्पणियां भारत सरकार के न्याय विभाग के सहयोग से सर्वोच्च न्यायालय की ई-समिति द्वारा 11-12 अप्रैल को आयोजित ‘न्यायिक प्रक्रिया पुनर्गठन और डिजिटल परिवर्तन’ पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान एक कार्य सत्र की अध्यक्षता करते हुए की गईं। विज्ञप्ति में कहा गया है कि सम्मेलन को दो दिनों में पांच कार्य सत्रों में विभाजित किया गया था, जिनमें से प्रत्येक में तकनीकी एकीकरण और न्यायिक प्रक्रियाओं के पुनर्गठन के महत्वपूर्ण आयामों पर चर्चा की गई। इसमें कहा गया कि सम्मेलन के दूसरे दिन चौथे कार्यकारी संस्करण की अध्यक्षता करते हुए, न्यायमूर्ति बिंदल ने प्रौद्योगिकी की भूमिका को न्यायिक विकल्प के बजाय सहायक उपकरण के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल उपकरणों का उपयोग सहायक साधनों के रूप में किया जाना चाहिए और इन्हें न्यायिक तर्क को दरकिनार करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
रविवार, 12 अप्रैल 2026
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दिल्ली : एआई, डिजिटल उपकरणों को न्यायिक तर्क को दरकिनार करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए : न्यायाधीश
दिल्ली : एआई, डिजिटल उपकरणों को न्यायिक तर्क को दरकिनार करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए : न्यायाधीश
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