हालांकि बिहार सरकार इस स्थिति को बदलने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। मुख्यमंत्री साइकिल योजना इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जिसके तहत लड़कियों को स्कूल जाने के लिए साइकिल दी जाती है। इससे न केवल उनकी उपस्थिति में वृद्धि हुई है, बल्कि दूर-दराज के स्कूलों तक पहुँच भी आसान हुई है। इसी तरह मुख्यमंत्री पोशाक योजना, छात्रवृत्ति योजना और मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना जैसी पहलों ने भी बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन योजनाओं का प्रभाव यह हुआ है कि पिछले कुछ वर्षों में बिहार की महिला साक्षरता दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जहाँ पहले ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों की शिक्षा दर काफी कम थी, वहीं अब इसमें लगभग 8 से 10 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। इन योजनाओं के साथ-साथ डिजिटल शिक्षा और तकनीक का भी बड़ा योगदान रहा है। मोबाइल फोन और इंटरनेट की पहुँच बढ़ने से गांव की लड़कियों को अब ऑनलाइन पढ़ाई का अवसर मिल रहा है। कोविड-19 के बाद डिजिटल शिक्षा का महत्व और भी बढ़ गया, जिससे छात्राओं ने घर बैठे भी पढ़ाई जारी रखी। हालांकि, डिजिटल डिवाइड अभी भी एक चुनौती है, क्योंकि सभी के पास स्मार्टफोन या इंटरनेट की सुविधा नहीं है। फिर भी, चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी स्कूलों की कमी, शिक्षकों की अनुपस्थिति और बुनियादी सुविधाओं का अभाव देखने को मिलता है। लड़कियों की सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिसके कारण कई परिवार उन्हें दूर के स्कूलों में भेजने से हिचकिचाते हैं। इसके अलावा, बाल विवाह की समस्या भी शिक्षा में बड़ी बाधा बनी हुई है। जब तक समाज में इस सोच को नहीं बदला जाएगा कि लड़कियों की जगह केवल घर तक सीमित नहीं है, तब तक शिक्षा का यह संघर्ष जारी रहेगा।
इस स्थिति को सुधारने के लिए आवश्यक है कि सरकार, समाज और परिवार मिलकर एक समन्वित प्रयास करे। सबसे पहले, ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना होगा। हर गाँव के करीब ही गुणवत्तापूर्ण स्कूल और कॉलेज होने चाहिए, जहाँ लड़कियाँ सुरक्षित वातावरण में पढ़ सकें। इसके साथ ही, परिवारों को जागरूक करना जरूरी है कि वे अपनी बेटियों की शिक्षा को भी लड़कों के बराबर प्राथमिकता दें। पंचायत स्तर पर जागरूकता अभियान चलाकर बाल विवाह और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ सख्त कदम उठाने होंगे। इस कड़ी में उन लड़कियों के लिए विशेष प्रयास करने की आवश्यकता है, जिनमें पढ़ने का जुनून है लेकिन संसाधनों की कमी उन्हें पीछे खींच रही है। उनके लिए कस्तूरबा गांधी बालिका स्कूल की तरह सभी वर्गों की लड़कियों के लिए स्कूली शिक्षा की सुविधा, हॉस्टल की सुविधा, सुरक्षित परिवहन और मेंटरशिप प्रोग्राम शुरू किए जा सकते हैं। समाज के सफल लोगों को आगे आकर ऐसी लड़कियों का मार्गदर्शन करना चाहिए, ताकि वे अपने सपनों को साकार कर सकें। बिहार की ग्रामीण किशोरियां आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी हैं, जहां उनके पास सपने भी हैं और उन्हें पूरा करने की क्षमता भी। जरूरत केवल सही अवसर और समर्थन की है। अगर हम मिलकर उनके लिए शिक्षा का रास्ता थोड़ा आसान बना दें, तो वे न केवल अपने जीवन को संवार सकती हैं, बल्कि पूरे समाज को नई दिशा दे सकती हैं। यही वह बदलाव है, जिसकी नींव आज इन परिणामों और प्रयासों के माध्यम से रखी जा रही है।
मुजफ्फरपुर, बिहार
टीम, गाँव की आवाज़
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)


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