वाराणसी : भारत–न्यूज़ीलैंड एफटीए से कालीन निर्यात को नई उड़ान, उच्च-मूल्य बाजार के खुलेंगे द्वार - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 29 अप्रैल 2026

वाराणसी : भारत–न्यूज़ीलैंड एफटीए से कालीन निर्यात को नई उड़ान, उच्च-मूल्य बाजार के खुलेंगे द्वार

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वाराणसी (सुरेश गांधी). भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) ने भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग के लिए संभावनाओं के नए क्षितिज खोल दिए हैं। कालीन निर्यात संवर्धन परिषद (सीईपीसी) ने 27 अप्रैल को नई दिल्ली में इस समझौते पर हस्ताक्षर का स्वागत करते हुए इसे निर्यात क्षेत्र के लिए “गेम चेंजर” बताया। इस अवसर पर केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पियूष गोयल भी उपस्थित रहे। यह समझौता अब औपचारिक अनुमोदन प्रक्रियाओं से गुजरते हुए आगामी महीनों में प्रभावी होने की संभावना है। एफटीए के तहत वस्त्र और संबंधित उत्पादों पर शुल्क समाप्त करने का प्रावधान किया गया है, जिससे न्यूज़ीलैंड के बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। करीब 53 लाख की आबादी और लगभग 52,000 अमेरिकी डॉलर प्रति व्यक्ति आय वाला न्यूज़ीलैंड एक उच्च-क्रय क्षमता वाला बाजार है, जहाँ प्रीमियम और सतत (सस्टेनेबल) गृह सज्जा उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। वर्तमान में वहाँ का कुल कालीन आयात लगभग 112 मिलियन अमेरिकी डॉलर है, जबकि भारत का निर्यात करीब 10 मिलियन डॉलर के आसपास है—जो भविष्य में तेज वृद्धि की संभावनाओं को रेखांकित करता है।


यह समझौता विशेष रूप से एमएसएमई क्षेत्र, कारीगरों और बुनकरों के लिए लाभकारी सिद्ध होगा। हस्तनिर्मित कालीन उद्योग ग्रामीण भारत में रोजगार का एक प्रमुख आधार है और पर्यावरण-अनुकूल, प्राकृतिक रेशों से बने उत्पादों की वैश्विक मांग भारत की पारंपरिक शिल्पकला के अनुकूल है। एफटीए के तहत उच्च गुणवत्ता वाली न्यूज़ीलैंड ऊन तक बेहतर पहुँच मिलने से भारतीय निर्माता बेहतर गुणवत्ता के ऊनी कालीन तैयार कर सकेंगे। इससे न केवल उत्पादों का मूल्य संवर्धन होगा, बल्कि पश्चिम एशिया सहित अन्य उच्च-मूल्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी भारतीय कालीनों की मांग को बल मिलेगा। सीईपीसी के अध्यक्ष कैप्टन मुकेश कुमार गोम्बर ने कहा कि यह समझौता ऐसे समय में आया है जब वैश्विक बाजार गुणवत्ता और शिल्पकला को प्राथमिकता दे रहा है। शुल्क बाधाओं में कमी से विशेषकर छोटे और मध्यम निर्यातकों को निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का अवसर मिलेगा। वहीं, उपाध्यक्ष असलम महबूब ने इसे गुणवत्ता सुधार और मूल्यवर्धन का बड़ा अवसर बताते हुए कहा कि प्रीमियम न्यूज़ीलैंड ऊन की उपलब्धता से भारतीय उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता और मजबूत होगी। सीईपीसी की कार्यकारी निदेशक (प्रभारी) डॉ. स्मिता नागरकोटी ने कहा कि अब परिषद का फोकस इस समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन पर रहेगा। न्यूज़ीलैंड में लक्षित प्रचार-प्रसार, खरीदार–विक्रेता बैठकें और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से भारतीय कालीनों की ब्रांडिंग को गति दी जाएगी, ताकि इस बाजार में भारतीय उत्पादों की स्पष्ट पहचान और प्राथमिकता सुनिश्चित हो सके। सीईपीसी द्वारा व्यापार मेलों, बिजनेस नेटवर्किंग और प्रचार अभियानों के जरिए निर्यातकों को हर संभव सहयोग प्रदान किया जाएगा। कुल मिलाकर, भारत–न्यूज़ीलैंड एफटीए से द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को मजबूती मिलने, निर्यात विविधीकरण को बढ़ावा मिलने और भारत की दीर्घकालिक व्यापार वृद्धि को नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

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