संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत यह काम विधायिका का है कि वह सुधार के लिए कानून बनाए।” मेहता ने कहा कि संसद या राज्य विधानसभाएं किसी प्रथा को अंधविश्वास मानकर उसके खिलाफ कानून बना सकती हैं, जैसे काला जादू रोकने से जुड़े कानून। इस पर न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्ला ने कहा कि यह दलील बहुत सरल है, क्योंकि अदालत के पास यह तय करने का अधिकार है कि कोई प्रथा अंधविश्वास पर आधारित है या नहीं। उन्होंने कहा, “इसके बाद क्या कदम उठाना है, यह विधायिका देख सकती है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि जो विधायिका तय करे वही अंतिम होगा।” इसके बाद मेहता ने कहा कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत किसी धार्मिक प्रथा को अंधविश्वास नहीं कह सकती, क्योंकि उसके पास धार्मिक मामलों में विशेषज्ञता नहीं होती। उन्होंने कहा, “माननीय न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं।” मेहता ने कहा कि भारत जैसे विविध समाज में, एक प्रथा जो चीज धार्मिक है, वह दूसरी जगह अंधविश्वास मानी जा सकती है। इस दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने सवाल उठाया कि अगर जादू-टोना किसी धर्म का हिस्सा बताया जाए, तो क्या उसे अंधविश्वास नहीं माना जाएगा?
उन्होंने सवाल किया कि अगर इस मामले पर विधायिका चुप है, तो क्या अदालत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर हस्तक्षेप नहीं कर सकती? इस पर मेहता ने जवाब दिया कि अदालत समीक्षा कर सकती है, लेकिन यह ‘अंधविश्वास’ के आधार पर नहीं, बल्कि ‘स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था’ के आधार पर। वहीं न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने कहा कि किसी धार्मिक प्रथा को समझने के लिए उसी धर्म के दर्शन के नजरिए से देखना चाहिए। उन्होंने कहा, “किसी दूसरे धर्म के नजरिए से यह नहीं कहा जा सकता कि यह जरूरी धार्मिक प्रथा नहीं है। अदालत को उसी धर्म के सिद्धांतों के आधार पर फैसला करना चाहिए, लेकिन यह सब स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन होना चाहिए।” मामले पर सुनवाई जारी है। सितंबर 2018 में, पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटाते हुए इसे अवैध और असंवैधानिक करार दिया था। बाद में 14 नवंबर 2019 को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की दूसरी पीठ ने महिलाओं से भेदभाव के मुद्दे को 3:2 के बहुमत से बड़ी पीठ को भेज दिया था।

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