रिपोर्ट के मुताबिक, सदी के अंत तक 41 करोड़ लोग ऐसे इलाकों में रह सकते हैं जो हाई टाइड के स्तर से नीचे होंगे। यानी हर ज्वार के साथ खतरा उनके दरवाजे तक आएगा। कमीशन की सह-अध्यक्ष Christiana Figueres इसे बहुत साफ शब्दों में कहती हैं, “समुद्र का बढ़ना अब दूर की बात नहीं है। यह आज लोगों की जिंदगी, सेहत और रोज़गार को प्रभावित कर रहा है, खासकर उन लोगों को जिन्होंने इस संकट में सबसे कम योगदान दिया है।” यानी यह सिर्फ क्लाइमेट की कहानी नहीं है। यह न्याय की कहानी भी है। तटीय इलाकों में रहने वाले लोग, छोटे द्वीप, गरीब समुदाय, ये सबसे पहले और सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। जबकि कार्बन एमिशन का बड़ा हिस्सा कहीं और से आता है। Kathryn Bowen एक और अहम बात जोड़ती हैं, “हर सेंटीमीटर समुद्र का बढ़ना सिर्फ पानी का बढ़ना नहीं है। यह असमानता का माप है, जो सबसे ज्यादा उन लोगों को चोट पहुंचाता है जो सबसे कम जिम्मेदार हैं।” इसका असर सिर्फ शरीर पर नहीं, दिमाग पर भी है। विस्थापन, रोज़गार का नुकसान, अनिश्चितता, यह सब मिलकर मानसिक स्वास्थ्य पर भी दबाव बनाते हैं। WHO Asia-Pacific Centre for Environment and Health के डायरेक्टर डॉ सैंड्रो डेमायो इसे और स्पष्ट करते हैं, “समुद्र का बढ़ना अब एक पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी है। और कुछ न करना भी एक फैसला है, जिसका मतलब है लोगों की जिंदगी को खतरे में डालना।”
यानी यह सिर्फ डेटा नहीं है, यह चेतावनी है।
यह कमीशन इसीलिए सिर्फ समस्या नहीं गिनाता। यह समाधान की दिशा भी सुझाता है। इसका फोकस है कि कैसे देशों को ऐसे कदम उठाने चाहिए जो विज्ञान पर आधारित हों, लेकिन साथ ही न्यायपूर्ण भी हों। कैसे हम ऐसे सिस्टम बना सकते हैं जो सिर्फ मजबूत नहीं, बल्कि बराबरी वाले भी हों। इस पूरी कहानी में एक और बात बार-बार सामने आती है। समुद्र का पानी धीरे-धीरे बढ़ता है, लेकिन उसका असर अचानक दिखता है। कहीं एक दिन पानी घर के अंदर आ जाता है। कहीं एक मौसम में फसल खत्म हो जाती है। कहीं एक तूफान पूरी बस्ती को हिला देता है। और शायद यही सबसे बड़ा खतरा है। कि हम इसे धीरे-धीरे होता हुआ मानकर टालते रहते हैं। लेकिन सच यह है। पानी बढ़ रहा है। और उसके साथ जोखिम भी। अब सवाल यह नहीं है कि समुद्र कितना बढ़ेगा। सवाल यह है कि हम कब तक इसे सिर्फ किनारे की कहानी मानते रहेंगे, जबकि यह अब हमारे शरीर, हमारे खाने, और हमारी जिंदगी के बीच आ चुका है।

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