रिपोर्ट एक दिलचस्प ट्रेंड भी दिखाती है। फाइनेंशियल मार्केट खुद फैसला लेने लगा है कि भविष्य किसका है। रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों को ज्यादा भरोसेमंद माना जा रहा है। उनके पास फ्यूल का खर्च नहीं है, मुनाफा ज्यादा स्थिर है, और उन्हें पूंजी भी आसानी से मिल रही है। दूसरी तरफ, कोयले पर आधारित थर्मल कंपनियों के लिए पैसा जुटाना मुश्किल होता जा रहा है। यह सिर्फ ट्रेंड नहीं है, यह स्ट्रक्चरल बदलाव है। और यही बदलाव आने वाले वर्षों में तय करेगा कि कौन सी कंपनियां टिकेंगी और कौन पीछे छूट जाएंगी। लेकिन भारत के सामने एक अपनी चुनौती भी है। देश का कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट अभी भी कमजोर है। ज्यादातर कंपनियां कर्ज के लिए बैंकों पर निर्भर हैं। इसका मतलब है कि लंबी अवधि के सस्ते फाइनेंस के विकल्प सीमित हैं। ऊपर से, विदेशी निवेश पर ज्यादा निर्भरता भी जोखिम बढ़ाती है। जैसे ही वैश्विक हालात बिगड़ते हैं, पैसा तेजी से बाहर निकल सकता है।
रिपोर्ट इसीलिए एक अहम बात कहती है। भारत को अपने घरेलू निवेशकों को मजबूत करना होगा। पेंशन फंड, इंश्योरेंस कंपनियां और प्रोविडेंट फंड जैसे लंबे समय के निवेशक इस ट्रांजिशन को स्थिर बना सकते हैं। इस पूरी तस्वीर में एक बड़ा किरदार है, NTPC। देश की सबसे बड़ी पावर कंपनी, जिसके पास भारी निवेश योजना है। करीब 7 लाख करोड़ रुपये का कैपेक्स प्लान इसे इस स्थिति में लाता है कि यह पूरे सेक्टर के लिए फाइनेंस का रास्ता खोल सकती है। अगर NTPC साफ तौर पर ग्रीन ट्रांजिशन की दिशा पकड़ती है, तो बाकी कंपनियों के लिए भी रास्ता आसान हो सकता है। और यह सब सिर्फ क्लाइमेट की कहानी नहीं है। भारत अभी भी तेल और गैस के आयात पर निर्भर है। हर वैश्विक संकट, हर युद्ध, हर सप्लाई शॉक सीधे हमारी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। ऐसे में साफ ऊर्जा की तरफ बढ़ना अब सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा का भी सवाल बन गया है। रात गहरी हो चुकी है। शहर में रोशनी है। लेकिन इस बार फर्क यह है कि रोशनी का भविष्य तय हो चुका है। अब असली सवाल है, उस भविष्य को फंड कौन करेगा।

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