- एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने किए पवित्र अवशेषों के दर्शन, बच्चों ने ‘विश्व शांति’ पर रची सृजनात्मक अभिव्यक्ति, धम्म, ध्यान और संवाद से गूंजा सारनाथ
महोत्सव के दौरान धम्म देशना, विपश्यना और विचार-विमर्श सत्रों ने वातावरण को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की। विद्वानों और भिक्षुओं ने बुद्ध के उपदेशों को केवल शास्त्रों तक सीमित न रखकर उन्हें जीवन में उतारने की आवश्यकता पर बल दिया। यह संवाद केवल धर्म का नहीं, बल्कि मानवता के भविष्य का विमर्श बन गया। इस अवसर पर महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया, अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ और अन्य संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी ने आयोजन को वैश्विक आयाम प्रदान किया। विशिष्ट अतिथियों और विद्वानों की उपस्थिति ने इसे ज्ञान-संवाद का मंच बना दिया, जहां परंपरा और आधुनिकता का संतुलित संगम देखने को मिला। उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि बुद्ध पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानवता को दिशा देने वाला दिवस है। उन्होंने बुद्ध के जीवन की तीन प्रमुख घटनाओं—जन्म, ज्ञान और महापरिनिर्वाण—का उल्लेख करते हुए कहा कि यह दिन हमें आत्मबोध और वैश्विक शांति की ओर प्रेरित करता है। उनके अनुसार, ऐसे आयोजन समाज में सहिष्णुता और जागरूकता को सशक्त करते हैं। कार्यक्रम के एक अन्य आयाम में केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के शान्तरक्षित ग्रंथालय परिसर में आयोजित संगोष्ठी और शोध पत्रिका “धी” के 66वें अंक का विमोचन भी शामिल रहा। यहां विद्वानों ने बौद्ध दर्शन की समकालीन प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे, जो इस आयोजन को केवल उत्सव नहीं, बल्कि बौद्धिक चेतना का केंद्र बना गया। सारनाथ में बुद्ध पूर्णिमा का यह महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उस शाश्वत संदेश की पुनर्पुष्टि है—जहां हिंसा के शोर के बीच शांति की धीमी परंतु स्थायी आवाज ही मानवता का सच्चा मार्ग बनती है।

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