कभी सत्ता से सवाल पूछने वाली कलम आज खुद कटघरे में खड़ी दिखाई दे रही है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया के सामने आज सबसे बड़ा संकट केवल आर्थिक नहीं, बल्कि अस्तित्व और विश्वसनीयता का है। देशभर में पत्रकारों पर हमले, धमकियां, फर्जी मुकदमे और दबाव की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। गांव-कस्बों में सच लिखने वाला पत्रकार न केवल असुरक्षित है, बल्कि कई बार पूरी व्यवस्था के सामने अकेला पड़ जाता है। दूसरी ओर सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बिना किसी मानक और जवाबदेही के उभरी तथाकथित पत्रकारिता ने इस पेशे की साख को भी गहरी चोट पहुंचाई है। कैमरा और माइक लेकर कोई भी खुद को पत्रकार घोषित कर रहा है, जिससे असली और नकली पत्रकार के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। ऐसे दौर में यह सवाल बेहद गंभीर हो जाता है कि यदि सच लिखने वाला ही भय में जीएगा, तो लोकतंत्र की रक्षा कौन करेगा? अब समय आ गया है कि पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान, सामाजिक अधिकार और पत्रकारिता की गरिमा बचाने के लिए देश में ठोस कानून, पत्रकार आयोग और स्पष्ट संस्थागत व्यवस्था लागू की जाए
पत्रकार पर हमला, मतलब लोकतंत्र पर हमला
पत्रकार किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि समाज का प्रतिनिधि होता है। वह जनता की आंख और कान होता है। जब कोई पत्रकार किसी घोटाले, भ्रष्टाचार, अवैध कारोबार या सत्ता के दुरुपयोग को उजागर करता है, तो वह केवल खबर नहीं लिखता, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करता है। लेकिन आज स्थिति भयावह होती जा रही है। कई राज्यों में पत्रकारों की हत्या तक हो चुकी है। कहीं माफिया का दबाव है, कहीं राजनीतिक प्रतिशोध, तो कहीं प्रशासनिक उत्पीड़न। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकार सबसे अधिक असुरक्षित हैं। उनके पास न बड़े मीडिया संस्थानों का संरक्षण होता है और न ही कानूनी लड़ाई लड़ने की ताकत। ऐसे में पत्रकार सुरक्षा कानून केवल एक मांग नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का संवैधानिक दायित्व बन चुका है। जिस प्रकार डॉक्टरों पर हमला गैरजमानती अपराध माना जाता है, उसी प्रकार पत्रकारों पर हमला भी विशेष श्रेणी का अपराध घोषित होना चाहिए। क्योंकि पत्रकार पर हमला केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि जनता के जानने के अधिकार पर हमला है।
हर जिले में बने ‘पत्रकार सुरक्षा सेल’, तभी मिलेगा त्वरित न्याय
कानून तभी प्रभावी होता है जब उसका मजबूत क्रियान्वयन हो। इसलिए केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं होगा। प्रत्येक जिले में विशेष “पत्रकार सुरक्षा सेल” की स्थापना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। इस सेल में पुलिस, प्रशासन और विधिक अधिकारियों की संयुक्त व्यवस्था हो, जहां पत्रकार अपनी शिकायत तत्काल दर्ज करा सकें। यदि किसी पत्रकार को धमकी मिले, हमला हो या फर्जी मुकदमे में फंसाया जाए, तो तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित हो। हर जिले में एक “नोडल अधिकारी” नियुक्त किया जाना चाहिए, जो पत्रकारों से जुड़े मामलों की निगरानी करे। इसके साथ “पत्रकार हेल्प डेस्क” भी बनाई जाए, जहां पत्रकारों को कानूनी सहायता, प्रशासनिक मार्गदर्शन और आपातकालीन सुरक्षा उपलब्ध कराई जा सके।
अब बने स्वतंत्र ‘पत्रकार आयोग’, तभी बचेगी मीडिया की गरिमा
देश में महिला आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, मानवाधिकार आयोग, व्यापारी आयोग जैसे कई संस्थागत ढांचे मौजूद हैं। फिर पत्रकारों के लिए स्वतंत्र आयोग क्यों नहीं? पत्रकार आयोग केवल सुरक्षा का मंच नहीं होगा, बल्कि यह पत्रकारिता की गरिमा और विश्वसनीयता को भी संरक्षित करेगा। यह आयोग पत्रकारों से जुड़े विवादों, उत्पीड़न, फर्जी मुकदमों और प्रशासनिक दबाव की जांच कर सकेगा। साथ ही यह आयोग पत्रकारिता के नैतिक मानकों और आचार संहिता को मजबूत करने में भी भूमिका निभाएगा। क्योंकि लोकतंत्र में जितनी जरूरी स्वतंत्र पत्रकारिता है, उतनी ही जरूरी जिम्मेदार पत्रकारिता भी है।
फर्जी पत्रकारिता : लोकतंत्र के भीतर पनपता सबसे बड़ा संकट
डिजिटल क्रांति ने सूचना को आसान बना दिया, लेकिन इसी के साथ पत्रकारिता के नाम पर अराजकता भी बढ़ी है। आज सोशल मीडिया पर कोई भी व्यक्ति माइक और कैमरा लेकर खुद को पत्रकार घोषित कर देता है। यूट्यूब चैनलों, फेसबुक लाइव और अपंजीकृत पोर्टलों की बाढ़ में असली और नकली पत्रकार के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। कई लोग पत्रकारिता की आड़ में ब्लैकमेलिंग, दबाव और निजी स्वार्थ का कारोबार चला रहे हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान उन ईमानदार पत्रकारों को हो रहा है जो वर्षों से जमीन पर संघर्ष कर रहे हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि डिजिटल मीडिया के लिए भी स्पष्ट पंजीकरण व्यवस्था लागू हो। जिस प्रकार प्रिंट मीडिया आरएनआई और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के दायरे में आता है, उसी प्रकार डिजिटल मीडिया को भी वैधानिक ढांचे में लाया जाए। इससे न केवल फर्जी पत्रकारिता पर रोक लगेगी, बल्कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता भी मजबूत होगी।
पत्रकारिता के लिए न्यूनतम योग्यता और प्रशिक्षण जरूरी
पत्रकारिता केवल कैमरा पकड़ लेने या माइक थाम लेने का नाम नहीं है। यह लोकतंत्र, संविधान, कानून, समाज और नैतिकता की गहरी समझ का पेशा है। डॉक्टर बनने के लिए मेडिकल शिक्षा आवश्यक है, वकील बनने के लिए विधि की पढ़ाई जरूरी है, लेकिन पत्रकार बनने के लिए आज तक कोई स्पष्ट शैक्षिक मानक नहीं तय किए गए। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि पत्रकारिता में गंभीरता और पेशेवर दक्षता दोनों प्रभावित हुई हैं। अब समय आ गया है कि पत्रकारिता के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता और अनिवार्य प्रशिक्षण व्यवस्था तय की जाए। इससे इस पेशे की गुणवत्ता और विश्वसनीयता दोनों बढ़ेंगी।
एक देश, एक पहचान पत्र: असली-नकली पत्रकार की पहचान जरूरी
आज पत्रकारों के पास अलग-अलग संस्थानों और संगठनों द्वारा जारी पहचान पत्र होते हैं। इसी का फायदा उठाकर कई फर्जी पत्रकार भी सक्रिय हो जाते हैं। सरकार या किसी अधिकृत संस्था द्वारा एक समान प्रमाणित पत्रकार पहचान पत्र जारी किया जाना चाहिए। इससे असली पत्रकारों को सुरक्षा मिलेगी और नकली पत्रकारों पर लगाम लगेगी।
पत्रकारों को भी मिले स्वास्थ्य सुरक्षा और पेंशन का अधिकार
पत्रकार दिन-रात समाज के लिए काम करते हैं। दंगे हों, महामारी हो, बाढ़ हो या चुनाव—सबसे पहले घटनास्थल पर पत्रकार ही पहुंचता है। लेकिन विडंबना यह है कि उनकी अपनी सामाजिक सुरक्षा बेहद कमजोर है। पत्रकारों और उनके परिवारों को आयुष्मान भारत योजना से जोड़ना चाहिए। यदि यह संभव न हो तो राज्य सरकारों को अलग “पत्रकार स्वास्थ्य सुरक्षा कार्ड” योजना लागू करनी चाहिए। इसके साथ वरिष्ठ और सेवानिवृत्त पत्रकारों के लिए सम्मानजनक पेंशन योजना भी लागू होनी चाहिए। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में ऐसी योजनाएं मौजूद हैं। उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में यह व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।
पत्रकारिता बची रहेगी, तभी लोकतंत्र जिंदा रहेगा
आज पत्रकारिता दोहरी चुनौती से जूझ रही है। एक ओर सुरक्षा का संकट है, दूसरी ओर विश्वसनीयता का संकट। यदि समय रहते पत्रकारों के लिए स्पष्ट नियम, कानूनी सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण की व्यवस्था नहीं की गई, तो आने वाले समय में लोकतंत्र की आवाज कमजोर पड़ सकती है। यह केवल पत्रकारों का मुद्दा नहीं है। यह जनता के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की आत्मा का प्रश्न है। क्योंकि जब पत्रकार सुरक्षित होंगे, तभी सच सुरक्षित रहेगा। और जब सच सुरक्षित रहेगा, तभी लोकतंत्र मजबूत रहेगा। अब फैसला सरकार, समाज और मीडिया संस्थानों को करना है कि वे पत्रकारिता को केवल एक पेशा मानते हैं, या लोकतंत्र की वह आवाज, जिसे हर हाल में बचाना जरूरी है।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी


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