विशेष रूप से किशोरियों की स्थिति और भी चिंताजनक है। शिक्षा के अभाव और सामाजिक दबाव के कारण इनकी कम उम्र में ही शादी कर दी जाती है। जल्द ही वे मातृत्व की जिम्मेदारी उठा लेती हैं, लेकिन पर्याप्त पोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में वे कुपोषण का शिकार हो जाती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार भारत में 15-19 वर्ष की लगभग 23 प्रतिशत किशोरियाँ कुपोषण से ग्रस्त हैं, और स्लम क्षेत्रों में यह प्रतिशत और भी अधिक है। स्लम बस्तियों में महिलाओं की स्थिति भी बेहद असुरक्षित होती है। घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न और शोषण के मामले यहाँ अधिक देखने को मिलते हैं। तंग गलियाँ, असुरक्षित वातावरण और सामाजिक जागरूकता की कमी महिलाओं के लिए भय का कारण बनती है। कई महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होतीं, जिससे वे हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने में भी असमर्थ रहती हैं। यह स्थिति न केवल महिलाओं के अधिकारों का हनन है, बल्कि समाज के समग्र विकास में भी बाधा उत्पन्न करती है। बाबा रामदेव स्लम बस्ती में रहने वाली एक किशोरी की कहानी इस स्थिति को और स्पष्ट करती है। वह बताती है कि कैसे उसके माता-पिता के पास कोई दस्तावेज नहीं होने के कारण वह स्कूल नहीं जा पाई। कुछ समय बाद उसकी शादी कर दी गई और अब वह कम उम्र में ही माँ बन चुकी है। पोषण की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता के कारण उसका बच्चा भी कमजोर है। यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि हजारों ऐसी लड़कियों की सच्चाई है जो अपने सपनों को जीने से पहले ही जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाती हैं।
इन समस्याओं के समाधान के लिए केवल सरकारी योजनाएँ बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी आवश्यक है। सबसे पहले, स्लम बस्तियों में रहने वाले लोगों के लिए दस्तावेज़ बनाने की प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाना होगा, ताकि उनके बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिल सके। मोबाइल स्कूल, सामुदायिक शिक्षा केंद्र और गैर-सरकारी संगठनों की भागीदारी से बच्चों को शिक्षा से जोड़ा जा सकता है। साथ ही, स्वच्छ पेयजल और सफाई व्यवस्था को प्राथमिकता देनी होगी। स्थानीय प्रशासन को इन बस्तियों में नियमित सफाई, कचरा प्रबंधन और जल आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए। किशोरियों और महिलाओं के लिए विशेष स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता है, ताकि वे कुपोषण और स्वास्थ्य समस्याओं से बच सकें। महिला सुरक्षा के लिए जागरूकता अभियान और कानूनी सहायता केंद्र भी स्थापित किए जाने चाहिए। अंततः, यह समझना होगा कि स्लम बस्तियों में रहने वाले लोग समाज के हाशिए पर खड़े वे नागरिक हैं, जिनकी मेहनत से शहर चलता है। उन्हें केवल दया नहीं, बल्कि अधिकार और सम्मान की आवश्यकता है। यदि हम वास्तव में एक समावेशी और विकसित भारत का सपना देख रहे हैं, तो इन बस्तियों की स्थिति में सुधार लाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। जब तक शहर के हर कोने में रहने वाले लोगों को समान अवसर और सुविधाएँ नहीं मिलेंगी, तब तक सपनों के शहर में संघर्ष करती बस्तियां नजर आती रहेंगी।
चंचल
जयपुर, राजस्थान
टीम, गाँव की आवाज़
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)



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