अरब सागर की लहरों के बीच गुजरात के प्रभास तट पर खड़ा सोमनाथ मंदिर केवल पत्थरों से निर्मित कोई धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत की सनातन चेतना, सांस्कृतिक स्वाभिमान और अदम्य आस्था का जीवंत प्रतीक है। सदियों से विदेशी आक्रांताओं की तलवारें इस मंदिर को मिटाने के लिए उठती रहीं, लेकिन हर बार सोमनाथ पहले से अधिक भव्य होकर खड़ा हो गया। यही कारण है कि आज जब सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूर्ण होने पर “सोमनाथ अमृत पर्व:2026” का आयोजन हो रहा है, तब पूरा देश इसे केवल एक उत्सव नहीं बल्कि भारतीय आत्मा के पुनर्जागरण के रूप में देख रहा है। इतिहास गवाह है कि महमूद गजनवी ने 1024 ईस्वी में सोमनाथ पर हमला कर मंदिर को लूटा, हजारों श्रद्धालुओं का कत्लेआम किया और शिवलिंग को खंडित करने का प्रयास किया। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी और औरंगजेब जैसे आक्रांताओं ने भी इस आस्था केंद्र को मिटाने की कोशिश की। लेकिन सनातन की शक्ति हर बार राख से पुनर्जन्म लेती रही। आज का भव्य सोमनाथ स्वतंत्र भारत के उस संकल्प का परिणाम है, जिसे लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने देश की आजादी के बाद लिया था। आज सोमनाथ के शिखर पर लहराता ध्वज मानो पूरी दुनिया से कह रहा है कि भारत की आध्यात्मिक विरासत को तलवारों, आक्रमणों और आतंक से कभी समाप्त नहीं किया जा सकता। यहां समुद्र की हर लहर शिव की आरती करती है, हर घंटा सनातन की विजय का उद्घोष बनता है और हर श्रद्धालु यह महसूस करता है कि सोमनाथ केवल मंदिर नहीं, बल्कि भारत की अमर आत्मा है
जहां चंद्रमा ने पाया था अपना खोया तेज
पुराणों के अनुसार सोमनाथ का इतिहास सृष्टि के आरंभिक काल से जुड़ा है। कहा जाता है कि चंद्रदेव ने दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं से विवाह किया था, लेकिन उनका विशेष स्नेह रोहिणी के प्रति था। इससे क्रोधित होकर दक्ष प्रजापति ने चंद्रमा को क्षीण होने का श्राप दे दिया। तेजहीन होते चंद्रदेव ने प्रभास क्षेत्र में भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें श्राप से मुक्त किया और उनका खोया तेज लौटा दिया। तभी से शिव यहां “सोमनाथ” कहलाए, अर्थात “सोम यानी चंद्रमा के नाथ”। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सबसे पहले चंद्रदेव ने यहां स्वर्ण मंदिर का निर्माण कराया। बाद में रावण ने चांदी का मंदिर बनवाया और भगवान श्रीकृष्ण ने चंदन की लकड़ी से मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। समय के साथ यह मंदिर पत्थरों से बने एक विशाल स्थापत्य में बदल गया, जिसकी ख्याति पूरे विश्व में फैल गई।
सोमनाथ केवल मंदिर नहीं था, भारत की समृद्धि का प्रतीक था
अरब सागर के किनारे स्थित यह मंदिर प्राचीन भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक सम्पन्नता का केंद्र था। यहां दूर-दूर से व्यापारी आते थे। मंदिर के गर्भगृह में रत्नों से जड़ा शिवलिंग और अपार संपत्ति थी। यही समृद्धि विदेशी आक्रमणकारियों की आंखों में चुभने लगी। सोमनाथ पर हुए आक्रमण केवल लूट के लिए नहीं थे। वे भारत की सांस्कृतिक आत्मा को तोड़ने के प्रयास भी थे।
जब गजनवी ने सोमनाथ को रौंदा
1025 ईस्वी। यह वह वर्ष था जब गजनी का शासक महमूद गजनी विशाल सेना लेकर सोमनाथ पहुंचा। इतिहासकारों के अनुसार हजारों श्रद्धालु मंदिर की रक्षा में मारे गए। मंदिर को लूटा गया, शिवलिंग को तोड़ा गया और अपार संपत्ति ऊंटों पर लादकर गजनी ले जाई गई। लेकिन गजनवी शायद यह नहीं जानता था कि मंदिरों को तोड़ा जा सकता है, आस्था को नहीं। सोमनाथ फिर बना।
खिलजी, तुगलक और औरंगजेब... विध्वंस का लंबा दौर
गजनवी के बाद भी सोमनाथ पर हमलों का सिलसिला नहीं रुका। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में मंदिर फिर लूटा गया। बाद में कई इस्लामी आक्रांताओं ने इसे नुकसान पहुंचाया। 17वीं शताब्दी में मुगल शासक औरंगजेब ने मंदिर को पूरी तरह ध्वस्त करने का आदेश दिया। इसके बाद लंबे समय तक प्रभास क्षेत्र खंडहरों में तब्दील रहा। टूटे हुए स्तंभ, बिखरे पत्थर और वीरान गर्भगृह मानो उस सभ्यता की पीड़ा बयान कर रहे थे, जिसे मिटाने की कोशिशें सदियों तक चलती रहीं। कहा जाता है कि सोमनाथ पर 17 बार हमले हुए। लेकिन हर हमले के बाद मंदिर फिर खड़ा हुआ। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है, सोमनाथ हारता नहीं, पुनर्जन्म लेता है।
आजादी के बाद शुरू हुआ सांस्कृतिक पुनर्जागरण
1947 में भारत स्वतंत्र हुआ। जूनागढ़ रियासत के भारत में विलय के बाद लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल प्रभास पाटन पहुंचे। वहां खंडहर बने सोमनाथ को देखकर उन्होंने एक ऐतिहासिक संकल्प लिया, “सोमनाथ का पुनर्निर्माण होगा।” यह केवल मंदिर निर्माण का निर्णय नहीं था। यह उस गुलाम मानसिकता के खिलाफ उद्घोष था जिसने सदियों तक भारतीय संस्कृति को दबाने की कोशिश की थी। महात्मा गांधी ने सुझाव दिया कि मंदिर का निर्माण जनता के धन से हो। फिर देशभर से लोगों ने सहयोग दिया। गांव-गांव से चंदा आया। यह मंदिर सरकार ने नहीं, जनता की आस्था ने बनाया।
11 मई 1951: जब स्वतंत्र भारत ने अपनी आत्मा को पुनः प्रतिष्ठित किया
11 मई 1951३ यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास का भावनात्मक पुनर्जन्म था। देश के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ राजेन्द्र प्रसाद स्वयं सोमनाथ पहुंचे और पुनर्निर्मित मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की। उस समय उन्होंने कहा था, “सोमनाथ का पुनर्निर्माण यह प्रमाण है कि जो राष्ट्र अपनी संस्कृति को जीवित रखता है, वही इतिहास में अमर रहता है।” यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था। यह स्वतंत्र भारत की सांस्कृतिक स्वतंत्रता की घोषणा थी।
आज का सोमनाथ: भव्यता और अध्यात्म का अद्भुत संगम
आज का सोमनाथ मंदिर चालुक्य स्थापत्य शैली में बना हुआ है। समुद्र किनारे उठता इसका विशाल शिखर मानो भारतीय सभ्यता की अडिगता का प्रतीक बन गया है। मंदिर के सामने लगा “बाण स्तंभ” इस बात का संकेत देता है कि दक्षिण दिशा में समुद्र के पार अंटार्कटिका तक कोई भूभाग नहीं है। संध्या आरती के समय जब समुद्र की लहरें मंदिर की घंटियों से टकराती ध्वनि के साथ गूंजती हैं, तब ऐसा लगता है मानो पूरा इतिहास शिव के चरणों में नतमस्तक हो गया हो।
सोमनाथ की सबसे बड़ी सीख
सोमनाथ हमें केवल धर्म नहीं सिखाता, बल्कि यह बताता है कि सभ्यताएं तलवारों से नहीं मिटतीं। मंदिर टूट सकते हैं, लेकिन संस्कृति नहीं। पत्थर बिखर सकते हैं, लेकिन आस्था नहीं। सोमनाथ की गाथा दरअसल भारत की आत्मा की गाथा है, जिसे जितना दबाया गया, वह उतनी ही प्रखर होकर लौटी। आज जब “सोमनाथ अमृत पर्व 2026” मनाया जा रहा है, तब यह केवल 75 वर्षों का उत्सव नहीं, बल्कि हजार वर्षों की उस अविचल यात्रा का उत्सव है जिसने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया, “सनातन केवल परंपरा नहीं३ वह पुनर्जन्म लेने वाली चेतना है।”
सोमनाथ: जहां से शुरू होती है ज्योतिर्लिंगों की परंपरा
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सोमनाथ का प्रथम स्थान है। “सोमनाथ” शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, “सोम” अर्थात चंद्रमा और “नाथ” अर्थात स्वामी। यानी चंद्रमा के स्वामी भगवान शिव। शिव पुराण के अनुसार दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं का विवाह चंद्रदेव से हुआ था, लेकिन चंद्रमा केवल रोहिणी से प्रेम करते थे। इससे क्रोधित होकर दक्ष ने चंद्रमा को क्षय रोग का श्राप दे दिया। रोगग्रस्त चंद्रदेव ने ब्रह्मा के कहने पर प्रभास क्षेत्र में कठोर तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें रोगमुक्त कर दिया। कृतज्ञता स्वरूप चंद्रदेव ने यहां स्वर्ण मंदिर का निर्माण कराया और शिवलिंग की स्थापना की। तभी से यह स्थान “सोमनाथ” कहलाया। मान्यता है कि इसी स्थान पर चंद्रमा को अपनी खोई हुई कांति पुनः प्राप्त हुई थी, इसलिए इस क्षेत्र का नाम “प्रभास” पड़ा।
सोमनाथ और श्रीकृष्ण का अंतिम अध्याय
सोमनाथ का महत्व केवल शिवभक्ति तक सीमित नहीं है। यह वही पवित्र भूमि है जहां भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी नरलीला समाप्त की थी। लोककथाओं के अनुसार प्रभास क्षेत्र के निकट भालका तीर्थ में भगवान श्रीकृष्ण विश्राम कर रहे थे, तभी ‘जरा’ नामक शिकारी ने उनके चरणों में बने पद्मचिह्न को हिरण की आंख समझकर तीर चला दिया। इसके बाद श्रीकृष्ण ने यहीं से वैकुंठ गमन किया। इसी कारण प्रभास क्षेत्र वैष्णव और शैवकृ दोनों परंपराओं का अद्भुत संगम बन जाता है।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी



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