काकरोच जनता पार्टी वजूद में नहीं आती अगर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने उन लोगों के लिए काकरोच और परजीवी जैसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल न किया होता जो सोशल मीडिया मंचों और आरटीआई को हथियार बना पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग उठाते हैं. और यह तूफान शायद इतना तेज न होता अगर हमने कुछ ही दिन पहले एक और पर्चा लीक की घटना न देखी होती जिसने 22 लाख से ज्यादा नीट परीक्षार्थियों और उनके परिवारों के भविष्य को दांव पर लगा दिया. हमने देखा है कि यह डिजिटल बग़ावत कैसे चंद घंटों और दिनों में एक अकेले इंसान के ख्याल से निकलकर लाखों नेटिज़न्स की आवाज से बुलंद एक साझे डिजिटल अभियान में बदल गया. तुरंत उभरने वाले कारणों से परे, हमें उस बड़े माहौल को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए जिसकी वजह से सीजेपी के आंदोलन की भारत की जेन-जेड के साथ इतनी गहरी पैठ बन गई. मोदी सरकार के "अच्छे दिन" लाने और भारत को वैश्विक ताकत बनाने के वायदों का गुब्बारा फूटना, एक के बाद एक चुनावों में सुनियोजित धांधली, देश की संस्थाओं का कमजोर पड़ते जाना, खासकर मुख्यधारा मीडिया और न्यायपालिका का, और आम आदमी पार्टी के तजुर्बे से पैदा निराशा, ये सब मिलकर वो जमीन बने जिस पर यह तूफान खड़ा हुआ.
यह भी साफ दिखता है कि बौखलाई हुई मोदी सरकार और संघ परिवार इस डिजिटल बगावत से निपटने के लिए सीजेपी का एक्स हैंडल बंद करने, इसे विदेशी तत्वों की भारत को अस्थिर करने की साजिश बताकर बदनाम करने और काले-लाल "हिट" कॉकरोच रिपेलेंट स्प्रे का रूपक इस्तेमााल करके इसे मिटाने की धमकी देने जैसे हथकंडे अपना रही है. सीजेपी का पांच सूत्री घोषणापत्र हमारे वक्त की पांच सबसे गहरी तकलीफों और उनके निदान पर केंद्रित है: सभी योग्य वोटरों के वोट देने के बुनियादी अधिकार की हिफाजत, प्रेस की आजादी और संस्थाओं, खासकर न्यायपालिका की स्वायत्तता की रक्षा, विधानमंडलों और कैबिनेटों में महिलाओं के लिए 50 फीसद आरक्षण, और दलबदल रोकने तथा भाजपा की वाशिंग मशीन बंद करने के लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों की 20 साल की अयोग्यता. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की तात्कालिक मांग उस आवाज को और बुलंद करती है जो छात्र पूरे भारत में उठा रहे हैं, और इसके साथ ये और बुनियादी सवाल भी जुड़े हैं जैसे एनटीए को खत्म करना और केंद्रीकृत नीट परीक्षा व्यवस्था को रद्द करना.
सवाल यह है कि यह डिजिटल गुस्सा और यह डिजिटल कार्रवाई असल सामूहिक दबाव और बदलाव में तब्दील होगी या नहीं, और अगर होगी तो कैसे. हमने हाल के वक्त में डिजिटल और जमीनी संघर्षों को एक-दूसरे को मजबूत करते देखा है. मिसाल के तौर पर, 'समान नागरिकता आंदोलन' ने संविधान की प्रस्तावना को एक मैनिफेस्टो के तौर पर पढ़ने और "हम देखेंगे" या "कागज नहीं दिखाएंगे" को राष्ट्रीय तराने की तरह अपनाया. ऐतिहासिक किसान आंदोलन ने ट्रैक्टर और तिरंगा मार्च और तरह-तरह के संघर्षों के एकजुटता के मेल को जन्म दिया. क्या सीजेपी की शक्ल में सामने आ रहा यह डिजिटल गुस्सा गुज़ारे लायक मज़दूरी और आठ घंटे काम के लिए मजदूरों के संघर्षों से, जबरन खर्च-कटौती की मार झेल रहे आम लोगों की तकलीफ से, सभी ज़मीर के कैदियों की रिहाई की मांग से, घर और दुकान गिराकर जिंदगियां तबाह करने वाले बुलडोजरों को रोकने की मांग से, और करोड़ों भारतीय मुसलमानों को निशाना बनाने वाले नफ़रती अभियान से जुड़ पाएगा? यह उन कार्यकर्ताओं पर निर्भर करता है जो पहले से इन संघर्षों से जुड़े हैं कि वे इन बिंदुओं को आपस में जोड़ें और उन कड़ियों को मजबूत करें जिनसे डिजिटल गुस्सा और इरादा सामूहिक उम्मीद, भरोसे और एकजुटता में बदल सके.

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें