स्थानीय निवासियों का आरोप है कि अस्पताल के कारण क्षेत्र में लगातार ट्रैफिक जाम, सड़क किनारे अवैध पार्किंग और आपातकालीन वाहनों की आवाजाही में बाधा जैसी समस्याएं पैदा हो रही हैं। शिकायत में कहा गया है कि इससे आम नागरिकों का जीवन प्रभावित हो रहा है और क्षेत्र की यातायात व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई है। आरडब्ल्यूए ने यह भी आरोप लगाया है कि अस्पताल परिसर के आसपास बिना अनुमति पेड़ों की कटाई और छंटाई की गई है, जिससे हरित क्षेत्र को नुकसान पहुंचा है। इसके साथ ही अस्पताल की गतिविधियों से ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण और पर्यावरणीय क्षति होने की भी बात कही गई है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि इन गतिविधियों के कारण क्षेत्र की पर्यावरणीय गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। शिकायत में यह आशंका भी व्यक्त की गई है कि अस्पताल आवश्यक स्वीकृत भवन मानचित्र, अधिभोग प्रमाणपत्र, पार्किंग अनुपालन, पर्यावरणीय स्वीकृतियों और अग्नि सुरक्षा संबंधी अनुमतियों के पूर्ण अनुपालन के बिना संचालित हो सकता है। इसी आधार पर आरडब्ल्यूए ने दिल्ली नगर निगम, दिल्ली अग्निशमन सेवा, वन विभाग, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति, ट्रैफिक पुलिस और पुलिस प्रशासन से संयुक्त निरीक्षण कर पूरे मामले की जांच कराने तथा दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। इस बीच दिल्ली नगर निगम पश्चिमी जोन वार्ड समिति के उपाध्यक्ष साहिल गंगवाल ने इस पूरे मामले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि किसी प्रभावशाली संस्थान को नियमों से ऊपर समझकर अधिकारियों द्वारा संरक्षण दिया गया है, तो यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं बल्कि नागरिकों की सुरक्षा के साथ गंभीर खिलवाड़ है। उन्होंने कहा कि सी.के. बिरला अस्पताल के संचालन, कथित अवैध निर्माण, बेसमेंट के दुरुपयोग, अवैध पार्किंग, पेड़ों की कटाई और संबंधित अधिकारियों की भूमिका का मुद्दा वह आगामी निगम सदन में मजबूती से उठाएंगे।
साहिल गंगवाल ने कहा कि दिल्ली में मालवीय नगर और सदुलाजब जैसे हादसे यह साबित कर चुके हैं कि जब अवैध निर्माण और नियमों के उल्लंघन पर समय रहते कार्रवाई नहीं होती, तब उसकी कीमत आम लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी जोन में किसी भी कीमत पर ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होने दी जाएगी। चाहे संबंधित संस्था कितनी भी बड़ी, प्रतिष्ठित या प्रभावशाली क्यों न हो, कानून से ऊपर कोई नहीं है। उन्होंने निगम प्रशासन से सवाल किया कि यदि शिकायतें पहले से मौजूद थीं तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई ? यदि अवैध निर्माणों को संरक्षण दिया गया, यदि फायर सेफ्टी, भवन उपविधियों, पर्यावरणीय नियमों और पार्किंग मानकों का उल्लंघन हुआ है, तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। गंगवाल ने मांग की कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और यदि किसी प्रकार की मिलीभगत सामने आती है तो दोषियों के खिलाफ कठोर विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि निगम प्रशासन को यह बताना होगा कि आखिर शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई और किसके संरक्षण में ऐसे निर्माण फलते-फूलते रहे। नागरिकों की सुरक्षा, कानून का शासन और पारदर्शिता किसी भी अस्पताल, बिल्डर या प्रभावशाली संस्था से बड़ी है। जनता की जान से खिलवाड़ करने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाना चाहिए। अब यह मामला केवल एक अस्पताल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि राजधानी में अवैध निर्माण, प्रशासनिक जवाबदेही और संभावित भ्रष्टाचार पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। स्थानीय लोगों की निगाहें अब संबंधित विभागों की कार्रवाई और निगम सदन में होने वाली बहस पर टिकी हुई हैं। यदि शिकायतों में लगाए गए आरोपों की पुष्टि होती है तो यह मामला दिल्ली के प्रशासनिक तंत्र और नियामक एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर सकता है।

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