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बुधवार, 17 जून 2026

विचार : विकास की दौड़ में ढांचों की दरारें, डेढ़ दशक में रिकॉर्ड निर्माण, फिर क्यों टूट रहे हैं पुल, सड़कें और बांध?

Development-and-corruption
भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। नई सड़कें, एक्सप्रेसवे, पुल, सुरंगें, मेट्रो रेल और बांध विकास के प्रतीक बन चुके हैं। पिछले डेढ़ दशक में देश ने बुनियादी ढांचे के निर्माण में जो छलांग लगाई है, वह स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभूतपूर्व मानी जा रही है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। पुलों के ढहने, सड़कों के धंसने और पुराने बांधों की सुरक्षा को लेकर उठते सवाल बता रहे हैं कि विकास की रफ्तार के साथ सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।


रिकॉर्ड निर्माण का दशक

वर्ष 2014 में भारत का राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क लगभग 91 हजार किलोमीटर था, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 1.46 लाख किलोमीटर हो गया। यानी करीब 61 प्रतिशत की वृद्धि। इसी अवधि में एक्सप्रेसवे नेटवर्क 93 किलोमीटर से बढ़कर 3 हजार किलोमीटर से अधिक हो गया। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे, द्वारका एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे और समृद्धि महामार्ग जैसी परियोजनाएं आधुनिक भारत की पहचान बन गई हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के अनुसार राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण की गति 2013-14 में लगभग 12 किलोमीटर प्रतिदिन थी, जो बाद के वर्षों में बढ़कर 30 किलोमीटर प्रतिदिन से अधिक तक पहुंच गई। यह वृद्धि केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, व्यापार और रोजगार से भी सीधे जुड़ी हुई है।


पुलों का नया भारत

गंगा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा और अन्य बड़ी नदियों पर अनेक विशाल पुल बने। बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पूर्वाेत्तर राज्यों में पुल निर्माण ने दूरस्थ क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ा। कई राज्यों में रेलवे ओवरब्रिज और फ्लाईओवरों के निर्माण ने यातायात दबाव कम किया। लेकिन जितनी तेजी से नए पुल बने, उतनी ही तेजी से पुराने पुलों की जर्जरता सामने आने लगी। पिछले कुछ वर्षों में पुलों के ढहने की घटनाओं ने विकास मॉडल पर सवाल खड़े किए हैं। वर्ष 2022 में गुजरात के मोरबी में मच्छु नदी पर बना झूला पुल टूट गया। इस हादसे में 141 लोगों की जान चली गई। मरम्मत के बाद कुछ ही दिनों में पुल का टूटना देश के लिए बड़ा झटका था।वर्ष 2018 में वाराणसी में निर्माणाधीन फ्लाईओवर गिरने से 18 लोगों की मौत हुई। उसी वर्ष कोलकाता का माजेरहाट पुल भी ढह गया। वर्ष 2025 में गुजरात के गम्भीरा पुल हादसे में 22 लोगों की मृत्यु हुई। इसके बाद राज्य सरकार ने 1,800 से अधिक पुलों का विशेष निरीक्षण कराया। विशेषज्ञों के अनुसार केवल दुर्घटनाएं ही समस्या नहीं हैं। असली समस्या यह है कि देश में हजारों पुल अपनी निर्धारित आयु के अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं।


सड़कें बन रही हैं, टूट भी रही हैं

भारत में हर मानसून के दौरान सड़कों के धंसने और गड्ढों की खबरें सामान्य हो चुकी हैं। दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु, पटना, जयपुर और लखनऊ जैसे बड़े शहर भी इससे अछूते नहीं हैं। भारतीय सड़क कांग्रेस से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क क्षति के प्रमुख कारण हैं-खराब ड्रेनेज व्यवस्था, निम्न गुणवत्ता की निर्माण सामग्री, भारी वाहनों का दबाव, रखरखाव में लापरवाही, जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती अतिवृष्टि। सड़क बनाना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन उसे वर्षों तक सुरक्षित और उपयोगी बनाए रखना कहीं अधिक कठिन कार्य है।


बांधों पर बढ़ती उम्र का दबाव

भारत में 5,700 से अधिक बड़े बांध हैं। इनमें से लगभग 250 बांध 100 वर्ष से अधिक पुराने हो चुके हैं। अगले दो दशकों में एक हजार से अधिक बांध ‘एजिंग इंफ्रास्ट्रक्चर’ की श्रेणी में पहुंच जाएंगे। बांध विशेषज्ञों का कहना है कि बांधों का टूटना दुर्लभ घटना है, लेकिन उनकी उम्र बढ़ने के साथ जोखिम भी बढ़ता है। इसलिए समय-समय पर संरचनात्मक जांच और सुरक्षा ऑडिट आवश्यक हैं। भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु की प्रसिद्ध भू-तकनीकी विशेषज्ञ जी माधवी लता का मानना है कि भारत में नई परियोजनाओं के निर्माण पर अधिक ध्यान दिया जाता है, जबकि रखरखाव को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिलती। कई सिविल इंजीनियरों का मत है कि पुलों की नियमित हेल्थ मॉनिटरिंग अनिवार्य की जानी चाहिए। जिस प्रकार मनुष्य का स्वास्थ्य परीक्षण होता है, उसी प्रकार पुलों और बांधों का भी समय-समय पर तकनीकी परीक्षण होना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार पहले जहां 50 वर्षों में एक बार आने वाली बाढ़ अब 10-15 वर्षों में देखने को मिल रही है। इससे पुलों की नींव और सड़कों की स्थिरता पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।


सरकार ने क्या कदम उठाए?

1.इंडियन ब्रिज मैनेजमेंट सिस्टम-देश के लाखों पुलों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया गया है। इससे पुलों की आयु, स्थिति और जोखिम का आकलन किया जा सकता है।

2.ड्रोन निगरानी-राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अब ड्रोन आधारित निरीक्षण प्रणाली का उपयोग कर रहा है। इससे छोटी-छोटी दरारों और क्षतियों का भी समय रहते पता लगाया जा सकता है।

3.डैम सेफ्टी एक्ट 2021-इस कानून के तहत राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर बांध सुरक्षा संस्थाओं का गठन किया गया है। नियमित निरीक्षण और आपदा प्रबंधन योजना को अनिवार्य बनाया गया है।

4.स्ट्रक्चरल ऑडिट-कई राज्यों में 15 से 20 वर्ष से अधिक पुराने पुलों का विशेष ऑडिट कराया जा रहा है। जोखिम वाले पुलों पर भार सीमा निर्धारित की जा रही है।


दुनिया से क्या सीखें?

जापान, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में बड़ी संरचनाओं की डिजिटल निगरानी की जाती है। पुलों में सेंसर लगाए जाते हैं जो कंपन, झुकाव और दरारों की जानकारी तुरंत नियंत्रण केंद्र तक पहुंचाते हैं। भारत में भी अब स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की दिशा में कदम बढ़ रहे हैं, लेकिन इसे व्यापक स्तर पर लागू करने की आवश्यकता है।


डेढ़ दशक की तस्वीर

✔ राष्ट्रीय राजमार्ग: 91,000 किमी से बढ़कर 1.46 लाख किमी

✔ एक्सप्रेसवे नेटवर्क: 93 किमी से बढ़कर 3,000 किमी से अधिक

✔ बड़े बांध: 5,700 से अधिक

✔ 100 वर्ष से अधिक पुराने बांध: लगभग 250

✔ 2021-25 के बीच पुल दुर्घटनाएं: लगभग 170

✔ मोरबी हादसे में मृतक: 141

✔ गम्भीरा पुल हादसे में मृतक: 22


भारत विकास के उस दौर से गुजर रहा है जहां सड़कें, पुल और बांध केवल निर्माण परियोजनाएं नहीं, बल्कि आर्थिक प्रगति की जीवनरेखा हैं। लेकिन यदि रखरखाव, निरीक्षण और जवाबदेही को समान महत्व नहीं दिया गया तो विकास की यही संरचनाएं भविष्य में बड़ी चुनौतियां पैदा कर सकती हैं। देश को अब केवल कितना बनाया? से आगे बढ़कर कितना सुरक्षित रखा? का जवाब भी तलाशना होगा। क्योंकि मजबूत राष्ट्र केवल ऊंचे पुलों से नहीं, बल्कि सुरक्षित पुलों से बनता है।





 

Dr-chetan-anand

डॉ. चेतन आनंद

(कवि एवं पत्रकार)

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