दिल्ली में 21 लोग आग से नहीं मरे, वे उस व्यवस्था के शिकार हुए जो हादसों के बाद जागती है और समय बीतते ही फिर सो जाती है। मालवीय नगर के एक भवन में लगी आग ने केवल 21 जिंदगियां नहीं छीनीं, बल्कि देश के धार्मिक और पर्यटन नगरों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जिस इमारत को छह कमरों की अनुमति थी, वहां 25 कमरे चल रहे थे। फायर एनओसी नहीं थी, आपातकालीन निकास नहीं था और जिम्मेदार एजेंसियां वर्षों तक अनजान बनी रहीं। यह कहानी सिर्फ दिल्ली की नहीं है। आज वाराणसी की गलियों से लेकर अयोध्या के नए होटल कॉरिडोर और प्रयागराज के तीर्थ क्षेत्रों तक, हजारों होटल, धर्मशालाएं, होम-स्टे और पेइंग गेस्ट हाउस श्रद्धालुओं से भरे रहते हैं। पर्यटन और आस्था के बढ़ते दबाव के बीच कमरों की संख्या तो बढ़ी, लेकिन क्या सुरक्षा भी उतनी ही बढ़ी? क्या संकरी गलियों, पुराने भवनों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में किसी संभावित आपदा से निपटने की तैयारी है? या फिर हम एक और त्रासदी का इंतजार कर रहे हैं? दिल्ली की आग ने एक बार फिर याद दिलाया है कि जब नियम कागजों तक सीमित हो जाएं, तब हादसे नहीं होते, व्यवस्थाएं लोगों की जान लेती हैं. मतलब साफ है दिल्ली की आग ने जो सवाल उठाए हैं, उनका जवाब वाराणसी, अयोध्या और प्रयागराज को देना होगा
विकास की चमक के पीछे छिपा खतरा
पिछले कुछ वर्षों में देश के धार्मिक पर्यटन का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या में राम मंदिर, प्रयागराज महाकुंभ और मथुरा-वृंदावन के विस्तार ने करोड़ों श्रद्धालुओं को आकर्षित किया है। यह बदलाव आर्थिक दृष्टि से स्वागतयोग्य है। स्थानीय लोगों को रोजगार मिला है, होटल उद्योग बढ़ा है, व्यापार में तेजी आई है। लेकिन इसी विकास ने एक नया संकट भी पैदा किया है। कम समय में अधिक से अधिक पर्यटकों को ठहराने की होड़ ने अनेक शहरों में आवासीय भवनों को व्यावसायिक उपयोग में बदल दिया। पुराने मकान गेस्ट हाउस बन गए, घर होम-स्टे बन गए और पेइंग गेस्ट हाउसों की संख्या तेजी से बढ़ गई। यह स्वाभाविक भी था क्योंकि मांग बढ़ रही थी। लेकिन क्या इसके साथ सुरक्षा मानकों की भी उतनी ही गंभीरता से समीक्षा हुई? यही वह प्रश्न है जो दिल्ली की त्रासदी के बाद सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
काशी की गलियां और सुरक्षा की चुनौती
वाराणसी की पहचान उसकी प्राचीनता, संस्कृति और गलियों से है। लेकिन यही गलियां किसी बड़े हादसे के समय सबसे बड़ी चुनौती भी बन सकती हैं। गोदौलिया, दशाश्वमेध, चौक, विश्वनाथ गली, सोनारपुरा, शिवाला और अस्सी जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में होटल, धर्मशालाएं और पेइंग गेस्ट हाउस संचालित हो रहे हैं। इनमें से कई भवन दशकों पुराने हैं। अनेक स्थानों पर पहुंच मार्ग इतने संकरे हैं कि दमकल वाहन पहुंचना कठिन हो जाता है। यदि किसी बहुमंजिला भवन में रात के समय आग लग जाए तो बचाव कार्य कितना आसान होगा, इसकी कल्पना ही भयावह है। आज जरूरत यह पूछने की है कि कितने प्रतिष्ठानों का नियमित फायर ऑडिट होता है? कितनों में कार्यशील अग्निशमन यंत्र हैं? कितनों के पास वैकल्पिक निकास मार्ग है? और कितने भवन स्वीकृत मानचित्र के अनुरूप हैं?
अयोध्या की नई चुनौती
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद पर्यटन और तीर्थाटन का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। हजारों नए कमरे तैयार किए गए हैं। नए होटल, धर्मशालाएं और गेस्ट हाउस खुले हैं। लेकिन विकास की यह रफ्तार अपने साथ नई जिम्मेदारियां भी लेकर आई है। यदि भवन निर्माण, अग्निशमन सुरक्षा, विद्युत व्यवस्था और आपदा प्रबंधन पर कठोर निगरानी नहीं होगी तो भीड़ और निर्माण का यह दबाव किसी भी दिन संकट का कारण बन सकता है। दिल्ली की घटना ने यही चेतावनी दी है कि केवल भवन बना देने से सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती।
पेइंग गेस्ट हाउस मॉडल की समीक्षा जरूरी
कॉमनवेल्थ गेम्स के समय शुरू हुई बेड एंड ब्रेकफास्ट नीति का उद्देश्य अच्छा था। इससे पर्यटन को बढ़ावा मिला और स्थानीय लोगों को आय का स्रोत मिला। लेकिन जब निगरानी कमजोर होती है तो अच्छी नीतियां भी दुरुपयोग का शिकार हो जाती हैं। आज वाराणसी, अयोध्या और प्रयागराज जैसे शहरों में बड़ी संख्या में पेइंग गेस्ट हाउस संचालित हो रहे हैं। यह व्यवस्था पर्यटन के लिए उपयोगी है, लेकिन इसकी नियमित जांच और सुरक्षा मूल्यांकन उतना ही आवश्यक है। यदि कोई भवन कागजों में छह कमरों का है और व्यवहार में बीस कमरों का संचालन कर रहा है तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि संभावित खतरे को आमंत्रण देना है।
हर हादसे के बाद वही कहानी
देश का दुर्भाग्य यह है कि हर बड़े हादसे के बाद हमारी प्रतिक्रिया लगभग एक जैसी होती है। जांच समिति बनती है। एफआईआर दर्ज होती है। कुछ अधिकारियों का निलंबन होता है। मुआवजे की घोषणा होती है। मीडिया में चर्चा होती है। फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है। उपहार सिनेमा अग्निकांड से लेकर करोलबाग होटल, अनाज मंडी, मुंडका और अब दिल्ली के ताजा हादसे तक हर बार जांच रिपोर्टों ने सुरक्षा में गंभीर खामियां उजागर की हैं। लेकिन क्या हमने उनसे स्थायी सबक सीखा? दुर्भाग्य से जवाब उत्साहजनक नहीं है। धार्मिक नगरों में खतरा अधिक क्यों? धार्मिक शहरों की प्रकृति उन्हें विशेष रूप से संवेदनशील बनाती है। पहला, यहां भीड़ अत्यधिक होती है। सावन, देव दीपावली, रामनवमी, कुंभ, कार्तिक पूर्णिमा और अन्य पर्वों पर लाखों लोग एक साथ पहुंचते हैं। दूसरा, अधिकांश धार्मिक नगरों के पुराने हिस्से घनी आबादी और संकरी गलियों वाले हैं। तीसरा, आवासीय भवनों का व्यावसायिक उपयोग तेजी से बढ़ा है। इन तीनों कारणों का संयोजन किसी भी आपदा को और गंभीर बना सकता है।
अब कार्रवाई का समय है, प्रतीक्षा का नहीं
दिल्ली की आग को केवल एक स्थानीय घटना मानना बड़ी भूल होगी। यह एक राष्ट्रीय चेतावनी है। विशेष रूप से उन शहरों के लिए जहां हर दिन लाखों लोग आस्था के साथ पहुंचते हैं। वाराणसी, अयोध्या और प्रयागराज में होटल, धर्मशाला, होम-स्टे और पेइंग गेस्ट हाउसों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट होना चाहिए। फायर सुरक्षा, विद्युत सुरक्षा, भवन मानचित्र, निकास व्यवस्था और वास्तविक क्षमता की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। यह कार्रवाई किसी हादसे के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले होनी चाहिए। क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान यह नहीं है कि वह हादसे के बाद कितनी तेजी से जांच करता है। उसकी पहचान यह है कि वह हादसों को होने से पहले रोकने के लिए कितना सजग है। दिल्ली की आग में 21 लोग मारे गए। उनके लिए अब कोई सुधार, कोई जांच और कोई आदेश मायने नहीं रखता। लेकिन यदि इस त्रासदी से भी हम नहीं चेते, तो अगली आग केवल किसी इमारत को नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक लापरवाही को फिर बेनकाब करेगी। और तब शायद फिर वही प्रश्न गूंजेगा—क्या सिस्टम को अगली लाशों का इंतजार था?
ये हादसे नहीं, व्यवस्था की हत्याएं हैं
दिल्ली का अग्निकांड कोई पहला मामला नहीं है। 1997 में उपहार सिनेमा अग्निकांड में 59 लोगों की मौत। 2011 में कोलकाता के एएमआरआई अस्पताल में 90 से अधिक लोगों की मौत। 2019 में करोलबाग होटल अग्निकांड में 17 लोगों की मौत। 2019 में अनाज मंडी फैक्ट्री अग्निकांड में 43 लोगों की मौत। 2022 में मुंडका फैक्ट्री हादसे में दर्जनों लोगों की मौत। 2026 में दिल्ली के फ्लूरिश स्टे में 21 लोगों की मौत। हर जांच रिपोर्ट में लगभग एक जैसी बातें सामने आईं—अवैध निर्माण, बंद निकास, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और प्रशासनिक ढिलाई।
कागजों में जांच, जमीन पर धंधा
हर बड़े हादसे के बाद वही क्रम दोहराया जाता है— मजिस्ट्रेटी जांच. एफआईआर. निलंबन. मुआवजे की घोषणा. विशेष जांच अभियान. लेकिन कुछ महीनों बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। नियम फिर टूटते हैं, निरीक्षण फिर कमजोर पड़ जाते हैं और अगली त्रासदी की जमीन तैयार होने लगती है। यही कारण है कि दिल्ली की आग के बाद सबसे बड़ा सवाल किसी एक होटल का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम का है।
धार्मिक शहरों में खतरा अधिक क्यों?
धार्मिक नगरों में जोखिम कई गुना बढ़ जाता है क्योंकि— त्योहारों और विशेष आयोजनों में क्षमता से कई गुना अधिक भीड़ उमड़ती है। पुराने शहरों की गलियां संकरी और घनी आबादी वाली हैं। बड़ी संख्या में आवासीय भवनों का व्यावसायिक उपयोग हो रहा है। आपदा की स्थिति में निकासी और बचाव अभियान जटिल हो जाता है।
पड़ताल
दिल्ली में 21 लोग केवल आग से नहीं मरे। वे नियमों की अनदेखी, कमजोर निगरानी, बंद निकास, सुरक्षा मानकों की अवहेलना और प्रशासनिक उदासीनता के शिकार हुए। यदि वाराणसी, अयोध्या, प्रयागराज और अन्य तीर्थनगरियों में होटल, धर्मशालाओं, होम-स्टे और पेइंग गेस्ट हाउसों का स्वतंत्र और व्यापक सुरक्षा ऑडिट आज नहीं हुआ, तो अगली बड़ी खबर किसी और शहर से आ सकती है। सवाल यह नहीं कि अगला हादसा होगा या नहीं। सवाल यह है कि क्या सिस्टम उसके होने का इंतजार कर रहा है?
चेतावनी देते आंकड़े : 29 साल में बड़े अग्निकांड, सैकड़ों मौतें
वर्ष घटना मृतक
1997 उपहार सिनेमा, दिल्ली 59
2011 एएमआरआई अस्पताल, कोलकाता 90+
2019 होटल अर्पित पैलेस, दिल्ली 17
2019 अनाज मंडी फैक्ट्री, दिल्ली 43
2022 मुंडका फैक्ट्री दर्जनों
2026 फ्लूरिश स्टे, दिल्ली 21
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी


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