इस योजना की शुरुआत बिहार सरकार ने वर्ष 2018 में की थी। इसका मुख्य उद्देश्य बालिका जन्म को प्रोत्साहन देना, बाल विवाह को रोकना, किशोरियों की शिक्षा को बढ़ावा देना तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनने के अवसर प्रदान करना है। योजना के अंतर्गत जन्म से लेकर स्नातक तक विभिन्न चरणों में आर्थिक सहायता दी जाती है। वहीं किशोरियों को माहवारी के दौरान स्वच्छता के प्रति जागरूक बनाने के लिए सैनिटरी नैपकिन खरीदने हेतु 300 रुपये की सहायता राशि भी प्रदान की जाती है। इसके अतिरिक्त इंटरमीडिएट उत्तीर्ण करने वाली छात्राओं को प्रोत्साहन राशि और स्नातक उत्तीर्ण करने वाली अविवाहित छात्राओं को एकमुश्त आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है। समय-समय पर सरकार द्वारा इन प्रोत्साहन राशियों में वृद्धि भी की गई है ताकि अधिक से अधिक किशोरियां उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें। मुजफ्फरपुर जिले की सामाजिक स्थिति को देखें तो वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जिले की कुल आबादी लगभग 48 लाख है। जिले का लिंगानुपात 900 महिलाएं प्रति 1000 पुरुष दर्ज किया गया था। वहीं बिहार का लिंगानुपात 918 और राष्ट्रीय औसत 943 था। ये आंकड़े बताते हैं कि लैंगिक समानता के क्षेत्र में अभी भी काफी काम किया जाना बाकी है। ऐसे में किशोरियों की शिक्षा और सशक्तिकरण से जुड़ी योजनाएं इस जिले के सामाजिक बदलाव का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है।
हालांकि योजना के सकारात्मक प्रभावों के बीच कुछ चुनौतियां भी मौजूद हैं। इसी गांव की 16 वर्षीय नीतू जानकारी के अभाव में इस योजना का लाभ नहीं उठा सकी। वह बताती है कि उसका परिवार आर्थिक कठिनाइयों से जूझता है, फिर भी उसके माता-पिता ने शिक्षा को महत्व दिया और उसे 12वीं तक पढ़ाया। नीतू कहती है, “यदि मुझे समय पर इस योजना की जानकारी मिल जाती तो मैं भी इसका लाभ उठा सकती थी। इससे परिवार पर आर्थिक बोझ कुछ कम हो जाता।” वह मानती है कि सरकार को योजना के प्रचार-प्रसार पर और अधिक ध्यान देना चाहिए। उसके अनुसार स्कूलों, पंचायत भवनों और सार्वजनिक स्थानों पर बड़े-बड़े पोस्टर और होर्डिंग लगाए जाने चाहिए ताकि कोई भी पात्र किशोरी जानकारी के अभाव में योजना से वंचित न रहे। बिहार में किशोरियों की शिक्षा को बढ़ावा देने की आवश्यकता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य लंबे समय तक लैंगिक असमानताओं की चुनौती से जूझता रहा है। विभिन्न सरकारी रिपोर्टों के अनुसार हाल के वर्षों में राज्य में लड़कियों के स्कूल और कॉलेजों में नामांकन में वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि साइकिल योजना, पोशाक योजना और मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना जैसी पहलों ने इस बदलाव में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हालांकि केवल किसी एक योजना के कारण शिक्षा स्तर में हुई वृद्धि का सटीक प्रतिशत निर्धारित करना कठिन है, लेकिन यह स्पष्ट है कि आर्थिक सहायता ने बड़ी संख्या में किशोरियों को स्कूल और कॉलेज से जुड़े रहने में मदद की है।
वास्तव में, जब किसी परिवार को यह भरोसा मिलता है कि किशोरी की शिक्षा में सरकार सहयोग कर रही है, तो परिवार उसकी पढ़ाई जारी रखने के लिए अधिक प्रेरित होता है। इससे न केवल स्कूल छोड़ने वाली किशोरियों की संख्या कम होती है, बल्कि बाल विवाह जैसी सामाजिक समस्याओं को रोकने में भी मदद मिलती है। शिक्षित किशोरियां आगे चलकर अपने परिवार, समाज और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना ने बिहार के अनेक ग्रामीण परिवारों को यह विश्वास दिया है कि आर्थिक तंगी अब किशोरियों के सपनों के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा नहीं है। हालांकि योजना का वास्तविक लाभ तभी सुनिश्चित होगा जब इसकी जानकारी हर पात्र किशोरी और उसके परिवार तक समय पर पहुंचे। इसके लिए स्कूलों में नियमित जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए, पंचायत स्तर पर विशेष शिविर आयोजित किए जाने चाहिए और आंगनबाड़ी, आशा कार्यकर्ताओं तथा जीविका समूहों को योजना के प्रचार में सक्रिय भूमिका दी जानी चाहिए। साथ ही आवेदन प्रक्रिया को और सरल बनाया जाना चाहिए ताकि ग्रामीण क्षेत्रों की किशोरियां बिना किसी कठिनाई के इसका लाभ प्राप्त कर सकें।
विद्या भारती
मुजफ्फरपुर, बिहार
टीम, गाँव की आवाज़
(यह लेखिका की निजी राय है)



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