रमेश ने कहा कि भाषण का समापन इंदिरा गांधी ने अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त के 35वें श्लोक का उल्लेख करते हुए किया था, जिसका भावार्थ है ‘‘मैं पृथ्वी से जो कुछ निकालूं, वह शीघ्र पुनः उत्पन्न हो जाए; मैं उसके मर्मस्थल या हृदय को आघात न पहुंचाऊं।’’ उन्होंने कहा कि कम लोगों को यह जानकारी है कि सम्मेलन में वितरित इंदिरा गांधी के भाषण में सम्राट अशोक के प्रमुख स्तंभ अभिलेख का पूरा पाठ भी शामिल था, जिसे दुनिया में किसी शासक द्वारा जारी पहली पर्यावरणीय घोषणा माना जा सकता है। रमेश ने बताया कि उस समय वियतनाम युद्ध अपने चरम पर था और ऐसे में इंदिरा गांधी ने अशोक के उस शिलालेख का भी उल्लेख किया था, जिसमें उन्होंने अपने सैन्य विजय अभियानों से हुए नरसंहार पर गहरा पश्चाताप व्यक्त किया था। उन्होंने कहा, ‘‘इंदिरा गांधी ने वियतनाम, लाओस और कंबोडिया में युद्ध के कारण हो रही पर्यावरणीय तबाही की ओर दुनिया का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित किया था।’’ रमेश ने यह भी कहा कि स्टॉकहोम सम्मेलन में वितरित भाषण की प्रति, जिसमें ये अशोक अभिलेख शामिल थे, बाद में प्रकाशित अधिकांश संस्करणों और यहां तक कि प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी के आधिकारिक भाषण-संग्रहों में भी शामिल नहीं की गई। उन्होंने इस भाषण के मूल पाठ का लिंक भी साझा किया।
नई दिल्ली। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने 1972 में मानव पर्यावरण पर आयोजित पहले संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के ‘‘ऐतिहासिक’’ संबोधन को याद करते हुए रविवार को कहा कि इसे पर्यावरण पर वैश्विक विमर्श के चार मील के पत्थरों में से एक माना जाता है। पूर्व पर्यावरण मंत्री रमेश ने कहा कि आज से 54 वर्ष पहले इंदिरा गांधी ने मानव पर्यावरण पर पहले संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में वास्तव में ऐतिहासिक और संभवतः सबसे यादगार भाषण दिया था। यह सम्मेलन पांच जून 1972 को स्टॉकहोम में शुरू हुआ था, जिसे विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। रमेश ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा कि उस अवसर पर भाषण देने वाले केवल दो राष्ट्राध्यक्ष थे - एक इंदिरा गांधी और दूसरे मेजबान देश के प्रधानमंत्री। उन्होंने कहा, ‘‘इंदिरा गांधी का भाषण पर्यावरण पर वैश्विक विमर्श के चार मील के पत्थरों में से एक माना जाता है। अन्य तीन हैं- 1962 में रचेल कार्सन के साइलेंट स्प्रिंग का प्रकाशन, 1968 में एहर्लिच का ‘द पॉपुलेशन बम’ का प्रकाशन और 1972 की शुरुआत में रोम के एमआईटी/क्लब का ‘द लिमिट्स ऑफ ग्रोथ’ का प्रकाशन।’’ उन्होंने कहा कि यह भाषण आज भी दुनिया भर में याद किया जाता है, उद्धृत किया जाता है और प्रकाशित होता है।

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