उन्होंने किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने की सलाह देते हुए कहा कि इससे उत्पादन लागत में कमी आती है, मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है तथा पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है. आईसीएआर पटना से आए वैज्ञानिक डॉ रोहन कुमार रमन ने कृषक पुरुष एवं महिलाओं को संबोधित करते हुए । फसल विविधीकरण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि किसान केवल एक ही फसल पर निर्भर न रहें, बल्कि दलहनी, तिलहनी एवं अन्य लाभकारी फसलों को भी अपनी खेती में शामिल करें.इससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होने के साथ-साथ किसानों की आय में भी वृद्धि होती है. बताया कि मूंग जैसी दलहनी फसलों को हरी खाद के रूप में प्रयोग करने से मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है तथा भूमि की उर्वरता में सुधार होता है. यूरिया एवं डीएपी के असंतुलित प्रयोग से होने वाले दुष्प्रभावों के बारे में बताते हुए कहा कि इन उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग मिट्टी के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है, सूक्ष्म पोषकतत्वों की कमी उत्पन्न करता है तथा लंबे समय में फसल उत्पादन को प्रभावित करता है. उन्होंने किसानों को मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग करने की सलाह दी.मौके पर किसानों ने प्राकृतिक खेती, जैव उर्वरक, मृदा स्वास्थ्य एवं कृषि से संबंधित विभिन्न प्रश्न पूछे, जिनका वैज्ञानिकों ने विस्तार से समाधान किया.
पटना । कृषि विज्ञान केंद्र पूर्णिया जलालगढ़ एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी क्षेत्र के अनुसंधान परिषद के संयुक्त तत्वाधान में आज दिनांक 5 जून 2026 को खेत बचाओ अभियान के तहत ग्राम दनसार में किसान जागरूकता कार्यक्रम किया गया l कार्यक्रम में किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, प्राकृतिक खेती तथा संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन के प्रति जागरूक किया गया. मौके पर कृषि विज्ञान के वैज्ञानिक डॉ गोविंद कुमार, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद पूर्वी पटना से मौजूद वैज्ञानिक डॉ रोहन कुमार रमन, भोला पासवान शास्त्री महाविद्यालय से वैज्ञानिक डॉ जनार्दन प्रसाद, कीट वैज्ञानिक अनामिका कुमारी, प्रखंड कृषि पदाधिकारी कमलेश कुमार मिश्रा, सहायक तकनीक प्रबंधन श्री प्रणव कुमार, किसान सलाहकार श्री रवि सुमन भारती, सरपंच लूसी देवी, मुखिया शकुन्तला देवी सहित किसानों ने भाग लिया. मौके पर केवीके के वैज्ञानिक ने किसानों को जैव उर्वरकों के महत्व के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इनके उपयोग से मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है, जिससे फसलों को आवश्यक पोषक तत्व आसानी से उपलब्ध होते हैं तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है.

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