उन्होंने कहा, ‘‘हम ओआईसी की ओर से जम्मू-कश्मीर के बारे में की गई बातों को भी पूरी तरह से खारिज करते हैं... साफ तौर पर कहें तो, जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा। एकमात्र अनसुलझा मुद्दा भारतीय क्षेत्रों पर पाकिस्तान का अवैध कब्ज़ा और उनका वापस किया जाना है।’’ सिंह ने यह भी कहा कि पाकिस्तान एक ऐसा देश है जिसके मौजूदा रक्षा मंत्री ‘‘सरकारी नीति के तौर पर आतंकवादियों को पनाह देने, उन्हें प्रशिक्षण देने और तैनात करने का दावा करते हैं’’। उन्होंने कहा, ‘‘इससे किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। किसी गैर-कानूनी और अवैध कब्जे को सिर्फ ताकत के दम पर ही बनाए रखा जा सकता है। यह वह देश है जिसके मौजूदा रक्षा मंत्री आतंकवादियों को पनाह देने, उन्हें प्रशिक्षण देने और तैनात करने की बात गर्व से कहते हैं तथा इसे अपनी सरकारी नीति बताते हैं, फिर भी पाकिस्तान खुद को आतंकवाद का शिकार बताता है।’’ भारतीय राजनयिक ने कहा, ‘‘सचमुच, यह एक ऐसा विरोधाभास है जिसे केवल पाकिस्तान ही बनाए रख सकता है। यह ‘भस्मासुर देश’ का एक जीता-जागता उदाहरण है, जो तब हैरान रह जाता है जब उसका अपना ही बनाया राक्षस उसे डसता है।’’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘मौलिक स्वतंत्रता से वंचित रखने की वजह से (पाकिस्तान में) हालात ऐसे हो गए हैं कि अब रोटी, बिजली, अधिकारों और सम्मान की मांग करने पर भी (लोगों को) गोलियों तथा बर्बरता का सामना करना पड़ता है।’’
सिंह ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौते का भी ज़िक्र किया और इसे ‘‘अप्रांसगिक’’ बताया। उन्होंने कहा, ‘‘सिंधु जल संधि पर हमारा रुख पूरी तरह स्पष्ट है। यह अतार्किक है कि जो देश नीति के रूप में आतंकवाद का की मदद लेता है, वह सद्भावना और मित्रता पर टिके सहयोग के विशेषाधिकारों की मांग जारी रखे।’’ अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद दशकों पुरानी इस संधि को निलंबित कर दिया गया था। हमले में 26 लोग मारे गए थे। राजनयिक ने कहा, ‘‘इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि यह संधि अब अप्रासंगिक हो चुकी है। कोई भी तकनीकी व्यवस्था समय के साथ स्थिर नहीं रह सकती, जब उसके आस-पास की दुनिया बदल रही हो।’’ सिंह ने यह भी कहा कि 1960 में हुई किसी संधि को ऐसा स्थायी अधिकार नहीं माना जा सकता, ‘‘जो जवाबदेही से परे हो, वर्तमान समय की वास्तविकता से अलग हो और पिछले छह दशकों में आए बड़े बदलावों से अछूता हो।’’ विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई सिंधु जल संधि, 1960 से ही भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी और इसकी सहायक नदियों के जल बंटवारे और इस्तेमाल को नियंत्रित करती आ रही थी। सिंह ने कहा, ‘‘भारतीय क्षेत्रों पर बुरी नज़र रखने के बजाय, पाकिस्तान के लिए बेहतर यही होगा कि वह अपने घर को ठीक करे, जिससे उसका और उसके लोगों का भला हो सके।’’

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