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सोमवार, 8 जून 2026

विशेष : छह साल में 114 काले हिरणों का शिकार, संरक्षण के बावजूद शिकार की चुनौती बरकरार

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भारत की जैव विविधता में काला हिरण एक विशिष्ट स्थान रखता है। अपनी आकर्षक काया, घुमावदार सींगों और अद्भुत गति के कारण यह देश के सबसे सुंदर वन्यजीवों में गिना जाता है। कभी भारतीय उपमहाद्वीप के विशाल घास के मैदानों में बड़ी संख्या में पाए जाने वाले काले हिरणों की आबादी बीसवीं शताब्दी के दौरान तेजी से घटने लगी थी। इसका प्रमुख कारण अंधाधुंध शिकार, कृषि विस्तार, घासभूमियों का विनाश और मानव गतिविधियों का बढ़ता दबाव था। हालांकि स्वतंत्र भारत में बनाए गए कठोर वन्यजीव कानूनों और समाज की बढ़ती जागरूकता ने इस प्रजाति को नया जीवन दिया है, लेकिन आज भी इसका अस्तित्व पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। हाल में सामाजिक कार्यकर्ता एवं आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. रंजन तोमर द्वारा प्राप्त सूचना ने एक बार फिर काले हिरणों की सुरक्षा को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (डब्ल्यूसीसीबी) से प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2020 से अप्रैल 2026 के बीच देश में काले हिरणों की मृत्यु अथवा शिकार से संबंधित 114 घटनाएं दर्ज की गईं। यह आंकड़ा बताता है कि कानूनी संरक्षण के बावजूद वन्यजीव अपराधों पर पूरी तरह अंकुश नहीं लगाया जा सका है।


कहां-कहां पाए जाते हैं काले हिरण

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काला हिरण मुख्य रूप से भारत के खुले घास के मैदानों और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाया जाता है। राजस्थान आज भी इसका सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है, जहां इनकी संख्या 25 हजार से अधिक आंकी गई है। इसके अतिरिक्त ओडिशा के गंजाम क्षेत्र में लगभग 9 हजार, पंजाब और हरियाणा में हजारों की संख्या में तथा गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी इनकी महत्वपूर्ण आबादी पाई जाती है। गुजरात का वेलावदर राष्ट्रीय उद्यान और राजस्थान का ताल छापर अभयारण्य काले हिरणों के प्रमुख संरक्षण केंद्र हैं।


क्यों खास है यह वन्यजीव

काले हिरण का वैज्ञानिक नाम एंटीलोप सर्विकापर है। नर काले हिरण अपने काले-भूरे रंग और सर्पिलाकार सींगों के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि मादाएं हल्के भूरे रंग की होती हैं। यह दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वाले खुरदार जीवों में शामिल है और लगभग 80 किलोमीटर प्रति घंटे की गति तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि इसे भारतीय घासभूमियों का धावक भी कहा जाता है।


कानून देता है सर्वोच्च सुरक्षा

भारत सरकार ने काले हिरण को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में शामिल किया है। यह श्रेणी देश के सबसे अधिक संरक्षित वन्यजीवों के लिए आरक्षित है। काले हिरण का शिकार, उसे घायल करना, पकड़ना या उसका अवैध व्यापार करना गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर तीन से सात वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।


शिकार की घटनाएं क्यों नहीं रुक रहीं

विशेषज्ञों के अनुसार अवैध शिकार के पीछे कई कारण हैं। कुछ क्षेत्रों में मांस के लिए, कुछ स्थानों पर मनोरंजन अथवा ट्रॉफी शिकार के लिए और कहीं-कहीं स्थानीय संघर्षों के कारण काले हिरणों को निशाना बनाया जाता है। इसके अलावा सड़क दुर्घटनाएं, आवारा कुत्तों के हमले, कृषि विस्तार और प्राकृतिक आवासों का सिकुड़ना भी इनके अस्तित्व के लिए खतरा बने हुए हैं।


देश का सबसे चर्चित शिकार मामला

काले हिरण शिकार की चर्चा जब भी होती है तो 1998 का जोधपुर प्रकरण सबसे पहले याद किया जाता है। फिल्म ‘हम साथ-साथ हैं’ की शूटिंग के दौरान दो काले हिरणों के शिकार के आरोप में अभिनेता सलमान खान और अन्य कलाकारों के विरुद्ध मामला दर्ज हुआ था। यह मुकदमा दो दशक से अधिक समय तक देश की सबसे चर्चित वन्यजीव कानूनी लड़ाइयों में शामिल रहा और इसने वन्यजीव संरक्षण कानूनों को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया।


विशेषज्ञ क्या कहते हैं

वन्यजीव जीवविज्ञानी अमित गोस्वामी का मानना है कि काले हिरणों के संरक्षण में स्थानीय समुदायों, विशेषकर बिश्नोई समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उनके अनुसार राजस्थान के अनेक क्षेत्रों में अभयारण्यों के बाहर भी काले हिरण सुरक्षित दिखाई देते हैं। वन अधिकारी और शोधकर्ता गीतांजलि मेरियासेल्वम का कहना है कि संरक्षण को केवल सामाजिक आस्था पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए समुदाय आधारित संरक्षण योजनाओं और सरकारी सहयोग की आवश्यकता है। संरक्षण विशेषज्ञ टी. मुरुगावेल के अनुसार भारत में घासभूमियों के संरक्षण पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है। यदि घासभूमियां सिकुड़ती रहीं तो काले हिरणों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।


संरक्षण की असली कुंजी

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं हैं। वन्यजीव अपराधों की निगरानी, त्वरित न्यायिक प्रक्रिया, आधुनिक तकनीक का उपयोग और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ही दीर्घकालिक समाधान प्रदान कर सकती है। साथ ही घासभूमियों को भी उतना ही महत्व देना होगा जितना जंगलों को दिया जाता है।


साझा जिम्मेदारी

काला हिरण केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि भारत की प्राकृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। इसकी बढ़ती आबादी संरक्षण की सफलता का संकेत देती है, वहीं शिकार और आवास विनाश की घटनाएं हमें सावधान भी करती हैं। यदि सरकार, वैज्ञानिक संस्थान, वन विभाग और समाज मिलकर प्रयास करें तो आने वाली पीढ़ियां भी भारतीय घासभूमियों में दौड़ते हुए इस सुंदर जीव को देख सकेंगी। प्रकृति की इस अनमोल धरोहर की रक्षा करना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।


 काला हिरण एक नजर में

► सामान्य नाम-काला हिरण

► वैज्ञानिक नाम-एंटीलोप सर्विकापर

► प्राकृतिक आवास-घासभूमियां, अर्द्ध-शुष्क मैदान, खुले वन क्षेत्र

► अधिकतम गति- 70-80 किलोमीटर प्रति घंटा

► विशेष पहचान-नर के लंबे सर्पिलाकार सींग और गहरा काला-भूरा रंग

► भारत में कहां पाये जाते हैं-राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश

► सबसे बड़ी आबादी-राजस्थान

► संरक्षण दर्जा-वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में शामिल

► शिकार पर सजा-3 से 7 वर्ष तक का कारावास एवं जुर्माना

► प्रमुख खतरे-अवैध शिकार, घासभूमियों का विनाश, सड़क दुर्घटनाएं, आवारा कुत्तों के हमले और मानव-वन्यजीव संघर्ष

► विशेष समुदाय-बिश्नोई समाज, जिसने सदियों से काले हिरणों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है

► प्रमुख संरक्षित क्षेत्र-ताल छापर अभयारण्य (राजस्थान), वेलावदर राष्ट्रीय उद्यान (गुजरात), अबोहर क्षेत्र (पंजाब), रानीबेन्नूर ब्लैकबक अभयारण्य (कर्नाटक)

► सबसे चर्चित मामला-1998 का जोधपुर काला हिरण शिकार प्रकरण

► हालिया चिंता-आरटीआई के अनुसार वर्ष 2020 से अप्रैल 2026 के बीच देश में काले हिरणों की मृत्यु-शिकार से जुड़ी 114 घटनाएं दर्ज होने का दावा।




 

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डॉ. चेतन आनंद

(कवि और पत्रकार)

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