किसी भी शहर की पहचान उसकी ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि उनमें रहने और काम करने वाले लोगों की सुरक्षा से होती है। दुर्भाग्य से भारत के अधिकांश शहर आज ऐसे कंक्रीट के जंगलों में बदल चुके हैं, जहां विकास की चमक के पीछे सुरक्षा मानकों की अनदेखी का अंधेरा छिपा हुआ है। लखनऊ का भीषण अग्निकांड इसी कड़वी सच्चाई का भयावह उदाहरण है। यह केवल एक इमारत में लगी आग नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता है, जिसने वर्षों तक नियमों के उल्लंघन को सामान्य मान लिया। हर बड़े हादसे के बाद जांच, निलंबन और मुआवजे की औपचारिकताएं पूरी हो जाती हैं, लेकिन व्यवस्था की कार्यशैली जस की तस बनी रहती है। यदि इस त्रासदी को केवल लखनऊ तक सीमित समझने की भूल की गई, तो देश का कोई भी शहर अगली भयावह खबर बन सकता है। अब समय संवेदना व्यक्त करने का नहीं, बल्कि सुरक्षा को शासन और समाज दोनों की सर्वोच्च प्राथमिकता बनाने का है
यह भी उतना ही आवश्यक है कि समाज स्वयं भी जागरूक हो। माता-पिता अपने बच्चों को जिस कोचिंग या संस्थान में भेजते हैं, वहां की सुरक्षा व्यवस्था देखने का अधिकार और जिम्मेदारी दोनों रखते हैं। कर्मचारियों को भी यह समझना होगा कि आपातकालीन निकास, अग्निशमन उपकरण और सुरक्षा अभ्यास केवल औपचारिक शब्द नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी हैं। सभ्यता का विकास केवल ऊंची इमारतों से नहीं मापा जाता, बल्कि इस बात से मापा जाता है कि उन इमारतों के भीतर रहने और काम करने वाले लोग कितने सुरक्षित हैं। यदि भारत 'विकसित राष्ट्र' बनने का सपना देख रहा है, तो उसे 'सुरक्षित राष्ट्र' बनने की दिशा में भी उतनी ही गंभीरता से कदम बढ़ाने होंगे। लखनऊ की राख से उठता धुआं केवल उत्तर प्रदेश के आसमान में नहीं फैला है। वह पूरे भारत की अंतरात्मा से एक प्रश्न पूछ रहा है—क्या अगली आग भी किसी जांच आयोग का इंतजार करेगी, या इस बार व्यवस्था सचमुच बदलेगी? यदि इस प्रश्न का उत्तर आज नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में किसी दूसरे शहर की कोई दूसरी इमारत फिर यही कहानी दोहराएगी, और हम एक बार फिर शोक, संवेदना और मुआवजे के पुराने चक्र में लौट आएंगे।क्या पूर्वांचल ने सबक लिया या अगली दुर्घटना का इंतजार है?
काशी की गलियां पूछ रही हैं — क्या हम सुरक्षित हैं? कहीं देर न हो जाए...!
लखनऊ के अलीगंज में हुई भीषण अग्निकांड की घटना केवल एक इमारत में लगी आग नहीं थी। उसने पूरे उत्तर प्रदेश की उस व्यवस्था को बेनकाब कर दिया, जो वर्षों से नियमों, मानकों और चेतावनियों को कागजों तक सीमित रखे हुए है। धुएं के गुबार में केवल 15 जिंदगियां नहीं बुझीं, बल्कि यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ कि क्या प्रदेश के दूसरे शहर वास्तव में सुरक्षित हैं? यदि इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए राजधानी से निकलकर पूर्वांचल की ओर बढ़ें तो तस्वीर और भी बेचैन कर देने वाली दिखाई देती है। काशी की प्राचीन गलियां, भदोही के कालीन गोदाम, मिर्जापुर की औद्योगिक इकाइयां, जौनपुर के व्यावसायिक प्रतिष्ठान, गाजीपुर के बाजार, चंदौली के होटल, आजमगढ़ के कोचिंग सेंटर और गोरखपुर के बहुमंजिला कॉम्प्लेक्स—हर शहर विकास की नई कहानी लिख रहा है, लेकिन इस विकास के पीछे सुरक्षा का अध्याय कितना मजबूत है, यह बड़ा प्रश्न है। सुबह होते ही वाराणसी की सड़कें विद्यार्थियों, श्रद्धालुओं और पर्यटकों से भर जाती हैं। लंका, सिगरा, महमूरगंज, भेलूपुर, चेतगंज, गोदौलिया, चौक और कैंट क्षेत्र में हजारों छात्र कोचिंग संस्थानों की ओर निकल पड़ते हैं। अनेक संस्थान बहुमंजिला भवनों में संचालित हैं। कहीं एक ही सीढ़ी है, कहीं आपातकालीन निकास नहीं, कहीं बेसमेंट तक विद्यार्थियों से भरे रहते हैं। यदि किसी मंजिल पर आग लग जाए तो बाहर निकलने के लिए अफरा-तफरी ही सबसे बड़ा रास्ता बन जाती है। शहर के निजी अस्पतालों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। अनेक अस्पताल घनी आबादी के बीच संचालित हैं। ऑक्सीजन, बिजली आधारित जीवनरक्षक उपकरण और सीमित निकास वाले भवन किसी भी आपात स्थिति में चुनौती बन सकते हैं। होटल और गेस्ट हाउस भी तेजी से बढ़े हैं। खासकर घाटों और पुराने शहर के आसपास बने अनेक छोटे होटल वर्षों पुराने भवनों में संचालित हैं। पर्यटक शायद ही कभी यह सोचते हों कि जिस कमरे में वे ठहरे हैं, वहां किसी दुर्घटना की स्थिति में सुरक्षित बाहर निकलने का रास्ता कितना आसान है। काशी की पहचान उसकी गलियां हैं। लेकिन यही गलियां किसी बड़े अग्निकांड की स्थिति में सबसे बड़ी बाधा बन सकती हैं। चौक, गोदौलिया, विश्वनाथ गली, दशाश्वमेध, सोनारपुरा और मदनपुरा जैसे इलाकों में दमकल वाहन का पहुंचना आसान नहीं है। मतलब साफ है शहर का बड़ा हिस्सा ऐसी इमारतों से भरा पड़ा है, जहां प्रतिदिन हजारों लोग आते-जाते हैं, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे है। सबसे अधिक चिंता उन व्यावसायिक भवनों को लेकर है जहां एक ही इमारत में कोचिंग सेंटर, लाइब्रेरी, हॉस्टल, पीजी, कैफे और कार्यालय एक साथ संचालित हो रहे हैं। कई स्थानों पर एक ही संकरी सीढ़ी आवागमन का एकमात्र रास्ता है। कहीं आपातकालीन निकास नहीं है तो कहीं अग्निशमन यंत्र वर्षों से केवल दीवार की शोभा बढ़ा रहे हैं। कई स्थानों पर फायर ब्रिगेड को मुख्य सड़क पर वाहन रोककर सैकड़ों मीटर पाइप बिछाकर अंदर जाना पड़ सकता है। आग यदि ऊपरी मंजिलों तक फैल जाए तो राहत और बचाव अभियान और कठिन हो जाएगा। गंगा घाटों की तस्वीर भी अलग नहीं है। दशाश्वमेध, अस्सी, राजेंद्र प्रसाद, मणिकर्णिका और अन्य घाटों पर प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। घाटों के ऊपर बने अनेक होटल, धर्मशालाएं, गेस्ट हाउस और रेस्टोरेंट पुराने भवनों में संचालित हो रहे हैं। कई भवनों का विस्तार वर्षों में बिना समुचित सुरक्षा व्यवस्था के हुआ है। ऐसे भवनों में आग लगने पर लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा।
कोचिंग और लाइब्रेरी कल्चर नई चिंता
शहर में तेजी से बढ़े कोचिंग और लाइब्रेरी कल्चर ने भी नई चिंता पैदा कर दी है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले हजारों छात्र सुबह से देर रात तक इन संस्थानों में रहते हैं। कई लाइब्रेरी बेसमेंट या ऊपरी मंजिलों में संचालित हैं। कहीं पर्याप्त वेंटिलेशन नहीं, कहीं केवल एक सीढ़ी और कहीं अग्निशमन उपकरणों की नियमित जांच तक नहीं होती। निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम की स्थिति भी चिंता का विषय है। कई छोटे अस्पताल घनी आबादी के बीच संचालित हैं, जहां पार्किंग की जगह भी नहीं है। मरीजों, ऑक्सीजन सिलेंडरों और बिजली पर निर्भर उपकरणों के बीच यदि आग लग जाए तो राहत कार्य और अधिक कठिन हो सकता है।
भदोही में भी कई गोदाम मानकों के अनुरूप नहीं
वाराणसी से लगभग 45 किमी दूर भदोही का कालीन उद्योग देश की पहचान है। यहां हजारों छोटे-बड़े गोदामों में ऊन, धागा, कपड़ा, पैकिंग सामग्री और अन्य ज्वलनशील वस्तुएं रखी जाती हैं। कई गोदाम औद्योगिक मानकों के अनुरूप हैं, लेकिन अनेक छोटे स्टोरेज और कार्यस्थलों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। यदि किसी ऐसे गोदाम में आग लगती है तो नुकसान केवल आर्थिक नहीं होगा, बल्कि सैकड़ों परिवारों की आजीविका भी प्रभावित होगी। यही तस्वीर मिर्जापुर, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, आजमगढ़, बलिया और गोरखपुर के कई व्यावसायिक क्षेत्रों में भी दिखाई देती है। कहीं होटल हैं, कहीं मैरिज लॉन, कहीं निजी अस्पताल, कहीं कोचिंग सेंटर और कहीं बड़े गोदाम। सवाल किसी एक शहर का नहीं, बल्कि पूरे पूर्वांचल के शहरी ढांचे का है।
पहले भी हो चुके है अग्निकांड के हादसे
देश पहले भी ऐसी त्रासदियों से सबक लेने की कोशिश कर चुका है। 2019 में सूरत के कोचिंग सेंटर में आग लगी तो दर्जनों छात्रों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया। दिल्ली के अनाज मंडी अग्निकांड ने संकरी गलियों और अवैध निर्माण की भयावह तस्वीर दिखाई। कोलकाता के अस्पताल और होटल अग्निकांड ने यह साबित किया कि अग्नि सुरक्षा में छोटी-सी लापरवाही भी सामूहिक त्रासदी में बदल सकती है। हर घटना के बाद जांच बैठी, नियम बने, अभियान चले, लेकिन समय बीतते ही अधिकांश व्यवस्थाएं फिर पुराने ढर्रे पर लौट गईं। इस पूरी व्यवस्था में नागरिकों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। भवन मालिक अधिक किराया कमाने के लिए क्षमता से अधिक लोगों को एक ही भवन में ठहराते हैं। कई संस्थान सुरक्षा पर खर्च को अतिरिक्त बोझ मानते हैं। दूसरी ओर लोग भी किसी होटल, हॉस्टल, अस्पताल या कोचिंग में प्रवेश करते समय यह देखने की जरूरत नहीं समझते कि आपातकालीन निकास कहां है और आग लगने पर बाहर निकलने का रास्ता क्या होगा। लखनऊ की आग अब बुझ चुकी है, लेकिन उसके धुएं ने पूरे प्रदेश को एक आईना दिखा दिया है। यह आईना बता रहा है कि यदि आज भी सुरक्षा मानकों को गंभीरता से नहीं लिया गया, यदि अवैध निर्माण, बंद निकास मार्ग, खराब अग्निशमन व्यवस्था और कागजी अनुपालन की संस्कृति नहीं बदली गई, तो अगली त्रासदी का शहर कोई भी हो सकता है—वाराणसी, भदोही, मिर्जापुर, गोरखपुर या पूर्वांचल का कोई और नगर।
कागजी एनओसी पर्याप्त नहीं
फायर विभाग समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाता है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल कागजी एनओसी पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सुरक्षा तभी संभव है जब उपकरण चालू हालत में हों, कर्मचारियों को प्रशिक्षण मिला हो, मॉक ड्रिल नियमित हो और आपातकालीन निकास हमेशा खुला रखा जाए। स्थानीय लोगों का भी कहना है कि शहर में अनेक भवन आवासीय नक्शे पर बने, लेकिन बाद में उन्हें व्यावसायिक उपयोग में बदल दिया गया। कहीं हॉस्टल खुल गए, कहीं कोचिंग, कहीं होटल और कहीं रेस्टोरेंट। इससे भवनों पर भार भी बढ़ा और जोखिम भी।
कार्रवाई केवल छोटे प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए
व्यापारिक संगठनों का कहना है कि कार्रवाई केवल छोटे प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि सुरक्षा मानकों की जांच हो रही है तो सभी संस्थानों पर समान रूप से लागू हो। वहीं नागरिकों का मानना है कि हादसे के बाद कुछ दिनों तक अभियान चलता है, फिर व्यवस्था पुराने ढर्रे पर लौट आती है। काशी हर दिन लाखों श्रद्धालुओं, पर्यटकों, विद्यार्थियों और मरीजों की मेजबानी करती है। ऐसे में आवश्यकता केवल अभियान चलाने की नहीं, बल्कि स्थायी व्यवस्था विकसित करने की है। क्योंकि हादसे के बाद राहत पहुंचाना कठिन होता है, लेकिन हादसे को रोकना कहीं अधिक आसान और प्रभावी।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी




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