सुजीत कुमार सिंह कहते हैं कि उनके पिता, ससुर और पत्नी तीनों विधान मंडल के सदस्य रहे हैं। इस कारण जनता की समस्याओं से पहले से जुड़े रहे थे और उनके समाधान का प्रयास भी करते रहे थे। वे कहते हैं कि विधायिका के सदस्य के रूप में कार्य की शैली में कोई अंतर नहीं आया है। पहले भी जनता का सरोकार सर्वोपरि था और आज भी सर्वोपरि है। लेकिन जनता की अपेक्षाओं में थोड़ा बदलाव आया है। जनता अब चाहती है कि उनके परिवार में शादी-विवाद, श्राद्ध या जन्मदिन जैसे आयोजनों में भी विधायक और सांसद शामिल हों। जनप्रतिनिधि के रूप में अधिकतर कार्यक्रमों में शामिल भी होते हैं।
सदन में एक साथ तीन पीढ़ियों की उपस्थिति को लेकर सुजीत कहते हैं कि हाउस पीढियों के अंतर को पाटने वाला पुल है। इसमें युवा ऊर्जा के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं तो अनुभवी सदस्य अपनी विधायी जानकारी और क्षमता से सदन की कार्यवाही को अर्थपूर्ण बनाते हैं। विधान सभा ऊर्जा और अनुभव का संगम है और इसी संगम की धारा से बिहार के विकास की राह निकलती है।
— बीरेंद्र यादव न्यूज —

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