ज्ञानवापी : पहली ही बैठक में स्पष्ट हो गए दोनों पक्षों के रुख
ज्ञानवापी-श्रृंगार गौरी विवाद में मंगलवार को जिला एवं सत्र न्यायालय, वाराणसी के मध्यस्थता केंद्र (मनोरंजन कक्ष) में हुई बैठक में चारों वादों (पत्रावलियों) के पक्षकार और अधिवक्ता उपस्थित हुए। प्रारंभिक वार्ता के दौरान ही हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने स्पष्ट कर दिया कि वे समझौते के बजाय अदालत के अंतिम निर्णय को ही स्वीकार करेंगे।
मंदिर पक्ष : "यह मंदिर है, समझौते का प्रश्न ही नहीं"
मंदिर पक्ष की ओर से मूल वाद भगवान आदि विश्वेश्वर विराजमान एवं अन्य वादों से जुड़े पक्षकार और अधिवक्ता उपस्थित रहे। वरिष्ठ अधिवक्ता सुभाष नंदन चतुर्वेदी, अधिवक्ता मदन मोहन यादव, शैलेंद्र पाठक, रेखा पाठक सहित अन्य अधिवक्ताओं ने मध्यस्थता केंद्र में अपना पक्ष रखा। वरिष्ठ अधिवक्ता सुभाष नंदन चतुर्वेदी ने कहा कि उन्हें पहले से ही उम्मीद नहीं थी कि इस प्रकार के ऐतिहासिक, धार्मिक और विधिक विवाद का समाधान मध्यस्थता से निकल पाएगा। उनके अनुसार अब मध्यस्थता की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को भेजी जाएगी और आगे की कार्रवाई वहीं तय होगी। अधिवक्ता मदन मोहन यादव ने कहा कि हिंदू पक्ष का स्पष्ट मत है कि ज्ञानवापी परिसर मूल काशी विश्वनाथ मंदिर का हिस्सा है और वहां किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने एएसआई सर्वे रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि सर्वे में मंदिर से जुड़े अवशेष मिले हैं। अधिवक्ता एवं दीपक सिंह व शैलेंद्र पाठक ने कहा कि परिसर के तलगृह में वर्तमान में भी पूजा-अर्चना हो रही है और हिंदू पक्ष केवल अपने धार्मिक अधिकारों की पूर्ण बहाली चाहता है।
मुस्लिम पक्ष : "स्वामित्व विवाद का समाधान केवल अदालत करेगी"
अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी की ओर से सचिव एस. एम. यासीन तथा अधिवक्ताओं मुमताज अहमद और तौहीद खान ने मध्यस्थता में भाग लिया, लेकिन स्पष्ट कर दिया कि स्वामित्व और संवैधानिक प्रश्नों से जुड़े विवाद का समाधान लोक अदालत या मध्यस्थता से संभव नहीं है। अधिवक्ता मुमताज अहमद ने कहा कि एक पक्ष इसे मस्जिद और दूसरा पक्ष मंदिर बता रहा है। ऐसे में केवल सक्षम न्यायालय ही साक्ष्यों और कानून के आधार पर अंतिम निर्णय दे सकता है। अधिवक्ता तौहीद खान ने कहा कि पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 की वैधता से जुड़ी याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। जब तक उन पर निर्णय नहीं हो जाता, तब तक इस विवाद में मेरिट के आधार पर आगे बढ़ना उचित नहीं होगा।
सरकारी पक्ष ने भी दी जानकारी
प्रदेश सरकार की ओर से अधिवक्ता राजेश मिश्र ने बताया कि दोनों पक्ष मध्यस्थता केंद्र में उपस्थित हुए, लेकिन किसी प्रकार की सहमति नहीं बन सकी। सभी पक्ष अपने-अपने दावों पर दृढ़ रहे और अदालत से निर्णय चाहने की बात कही।
क्या है ज्ञानवापी विवाद
ज्ञानवापी परिसर को लेकर हिंदू पक्ष का दावा है कि यह मूल आदि विश्वेश्वर (काशी विश्वनाथ) मंदिर का स्थल है, जिसे 1669 में मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में ध्वस्त कर मस्जिद का निर्माण कराया गया। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह वैध वक्फ संपत्ति है और पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 के तहत इसकी धार्मिक प्रकृति बदली नहीं जा सकती। जिला न्यायालय के आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा कराए गए सर्वे की रिपोर्ट भी न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा है। रिपोर्ट की व्याख्या को लेकर दोनों पक्षों के अलग-अलग दावे हैं और इस पर अंतिम निर्णय न्यायालय को करना है।
मथुरा और संभल में भी यही रुख
मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद में भी पक्षकारों ने स्पष्ट किया है कि विवाद का समाधान केवल न्यायिक प्रक्रिया से होना चाहिए। हिंदू पक्ष 1968 के समझौते की वैधता को चुनौती दे रहा है, जबकि मस्जिद प्रबंधन उसी समझौते और प्रचलित कानूनों का हवाला दे रहा है। इसी प्रकार संभल की शाही जामा मस्जिद विवाद में भी मध्यस्थता को स्वीकार नहीं किया गया। हिंदू पक्ष वहां प्राचीन हरिहर मंदिर होने का दावा करता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे ऐतिहासिक मस्जिद और वैध इबादतगाह बताता है।
अब आगे क्या
मध्यस्थता की प्रक्रिया पूरी तरह स्वैच्छिक होती है और किसी भी पक्ष को समझौते के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। चूंकि तीनों मामलों में सहमति नहीं बन सकी, इसलिए अब मध्यस्थता की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी। इसके बाद संबंधित अदालतों और सर्वोच्च न्यायालय में नियमित सुनवाई आगे बढ़ेगी। इन मामलों में आने वाला अंतिम न्यायिक निर्णय केवल ज्ञानवापी, मथुरा और संभल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देशभर में धार्मिक स्थलों से जुड़े अन्य लंबित और संभावित विवादों के लिए भी महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत (Judicial Precedent) साबित हो सकता है।
तीन विवाद, एक पहल... अब अदालत का फैसला ही अंतिम रास्ता
क्या थी सुप्रीम कोर्ट की पहल?
'समाधान समारोह-2026' के तहत लंबित संवेदनशील मामलों में आपसी सहमति की संभावना तलाशने का प्रयास। 21 से 23 अगस्त को प्रस्तावित विशेष लोक अदालत से पहले पक्षकारों को मध्यस्थता केंद्र बुलाया गया। उद्देश्य था कि यदि सहमति बने तो वर्षों पुराने विवादों का शांतिपूर्ण समाधान निकल सके।
ज्ञानवापी : मध्यस्थता से इनकार
मुख्य वाद: भगवान आदि विश्वेश्वर विराजमान एवं अन्य बनाम अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी व अन्य।
हिंदू पक्ष ने कहा— "यह मूल मंदिर है, समझौते का सवाल नहीं।"
मुस्लिम पक्ष ने कहा— "यह स्वामित्व और संवैधानिक प्रश्न है, फैसला अदालत ही करेगी।"
चारों पत्रावलियों के पक्षकार और अधिवक्ता मध्यस्थता केंद्र पहुंचे, लेकिन सहमति नहीं बनी।
मथुरा : कानूनी लड़ाई जारी रहेगी
विवाद: श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह परिसर।
हिंदू पक्ष 1968 के समझौते को चुनौती दे रहा है।
मुस्लिम पक्ष समझौते और प्रचलित कानूनों के आधार पर अपना दावा कायम रखे हुए है।
दोनों पक्षों ने न्यायिक निर्णय को ही अंतिम रास्ता बताया।
संभल : समझौते पर नहीं बनी बात
विवाद: शाही जामा मस्जिद परिसर।
हिंदू पक्ष का दावा— यहां प्राचीन हरिहर (श्रीहरि) मंदिर था।
मुस्लिम पक्ष का कहना— यह ऐतिहासिक मस्जिद और वैध इबादतगाह है।
मध्यस्थता के बजाय न्यायालय के फैसले पर सहमति।
अब आगे क्या?
तीनों मामलों की मध्यस्थता रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को भेजी जाएगी।
अब नियमित न्यायिक प्रक्रिया के तहत सुनवाई आगे बढ़ेगी।
सुप्रीम कोर्ट और संबंधित अदालतों के अंतिम निर्णय पर पूरे देश की नजर रहेगी।
इन मामलों का फैसला भविष्य में धार्मिक स्थलों से जुड़े अन्य मुकदमों की दिशा भी तय कर सकता है।

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