आलेख : रफ्तार पकड़ता 'क्योटो विजन', बदलती काशी की तकदीर - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 25 जुलाई 2026

आलेख : रफ्तार पकड़ता 'क्योटो विजन', बदलती काशी की तकदीर

  • आस्था से आगे, अब आधुनिक भारत की विकास राजधानी बनती काशी

काशी को लेकर वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो 'क्योटो विजन' रखा था, वह लंबे समय तक राजनीतिक बहस का विषय बना रहा। एक दशक बाद अब यह अवधारणा कागज से निकलकर शहर के भूगोल पर उतरती दिखाई दे रही है। केंद्रीय मंत्रिमंडल से स्वीकृत गंगा और वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर केवल दो सड़क परियोजनाएं नहीं, बल्कि उस व्यापक शहरी दृष्टि का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक नगरी को आधुनिक परिवहन, नियोजित विस्तार और विश्वस्तरीय कनेक्टिविटी से जोड़ना है। करीब 25,446 करोड़ रुपये की इन परियोजनाओं के साथ 2014 के बाद वाराणसी में सड़क अवसंरचना पर स्वीकृत निवेश 50 हजार करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। सवाल अब केवल यह नहीं कि काशी कितनी बदली है, बल्कि यह है कि क्या दुनिया की सबसे प्राचीन जीवंत नगरी विरासत और आधुनिकता के संतुलन का नया वैश्विक मॉडल बनने की ओर बढ़ रही है? यही इस विकास यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण और दूरगामी पहलू है


Kashi-development
गंगा-वरुणा के ऊपर दौड़ती सड़कें केवल कंक्रीट नहीं, बल्कि उस परिकल्पना का विस्तार हैं जिसे 2014 में एक राजनीतिक संकल्प माना गया था। अब सवाल यह नहीं कि काशी बदली या नहीं, बल्कि यह है कि क्या दुनिया का सबसे प्राचीन जीवंत शहर आधुनिक भारत का सबसे बड़ा 'हेरिटेज-अर्बन मॉडल' बनने की ओर बढ़ रहा है? साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ते हुए कहा था कि "काशी को क्योटो की तर्ज पर विकसित किया जाएगा," तब इस कथन की राजनीतिक चर्चा ज्यादा हुई थी और शहरी नियोजन पर विमर्श कम। विरोधियों ने इसे चुनावी भाषण बताया। समर्थकों ने इसे एक बड़े विजन के रूप में देखा। बारह वर्ष बाद जब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गंगा एलिवेटेड कॉरिडोर और वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर जैसी लगभग 25,446 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी, तो यह स्पष्ट हो गया कि यह केवल दो सड़कें नहीं हैं; यह एक लंबी विकास यात्रा का नया पड़ाव हैं। यदि इतिहास की दृष्टि से देखा जाए तो यह केवल वाराणसी की कहानी नहीं है। यह उस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास भी है कि क्या कोई पांच हजार वर्ष पुराना शहर अपनी आत्मा को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक भी बन सकता है? भारत में अक्सर 'क्योटो मॉडल' का अर्थ केवल चौड़ी सड़कें और चमकदार इमारतें समझ लिया जाता है, जबकि जापान का क्योटो अपनी पहचान इसलिए नहीं रखता कि वहां आधुनिक सड़कें हैं। उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहां हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक विरासत और अत्याधुनिक शहरी व्यवस्था साथ-साथ चलती हैं। यही वह अवधारणा थी जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में काशी के संदर्भ में रखा था। बारह वर्षों में काशी विश्वनाथ धाम, नमो घाट, रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर, रिंग रोड, बाबतपुर फोरलेन, रेलवे स्टेशनों का पुनर्विकास, रोपवे, घाटों का सौंदर्यीकरण, स्मार्ट सिटी परियोजनाएं और अब लगभग 89.257 किलोमीटर लंबे दो एलिवेटेड कॉरिडोर उसी विजन की अगली कड़ी बनकर सामने आए हैं। गंगा और वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर का सबसे बड़ा महत्व उनकी लंबाई नहीं है। महत्व इस बात का है कि पहली बार वाराणसी के ऊपर एक दूसरा यातायात स्तर तैयार किया जा रहा है।


अभी तक बनारस का पूरा यातायात एक ही सतह पर चलता था। वही सड़क श्रद्धालु भी इस्तेमाल करता था, स्थानीय नागरिक भी, ट्रक भी और पर्यटक भी। नई परियोजनाओं के बाद पहली बार लंबी दूरी का यातायात एलिवेटेड कॉरिडोर पर चलेगा, जबकि शहर का स्थानीय जीवन नीचे अपनी स्वाभाविक गति से चलता रहेगा। यही आधुनिक शहरी नियोजन का मूल सिद्धांत है। दुनिया में कई शहरों के पास शानदार सड़कें हैं। दुबई के पास बहुस्तरीय एक्सप्रेसवे हैं। सिंगापुर के पास स्मार्ट ट्रांसपोर्ट सिस्टम है। टोक्यो के पास विशाल एलिवेटेड नेटवर्क है। मुंबई के पास कोस्टल रोड और अटल सेतु है। दिल्ली के पास एक्सप्रेसवे का जाल है। लेकिन विश्व के सबसे प्राचीन जीवंत धार्मिक नगरों में से एक के भीतर, दो नदियों के समानांतर लगभग 90 किलोमीटर का एलिवेटेड नेटवर्क विकसित करने का उदाहरण अत्यंत दुर्लभ है। यही कारण है कि यह परियोजना केवल सड़क निर्माण नहीं, बल्कि हेरिटेज इंजीनियरिंग का उदाहरण बन सकती है। वाराणसी की सबसे बड़ी समस्या कभी सड़क की चौड़ाई नहीं थी। समस्या यह थी कि हजारों वर्ष पुराने शहर में आधुनिक यातायात की मांग लगातार बढ़ती गई। आज हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालु आते हैं। हवाई यात्रियों की संख्या बढ़ रही है। पर्यटन लगातार बढ़ रहा है। पूर्वांचल का व्यापार भी तेजी से बढ़ रहा है। यदि इसी गति से विकास होता रहा और सड़कें पुरानी ही रहतीं, तो अगले दस वर्षों में बनारस का यातायात लगभग ठहर सकता था। यही वह बिंदु है, जहां गंगा और वरुणा कॉरिडोर भविष्य की जरूरतों का उत्तर बनकर सामने आते हैं। 2014 के बाद यदि केवल सड़क अवसंरचना को देखें तो वाराणसी को रिंग रोड, बाबतपुर फोरलेन, राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार, फ्लाईओवर, रेलवे ओवरब्रिज, शहर के प्रमुख मार्गों का चौड़ीकरण, और अब गंगा एवं वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर, मिलाकर 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाएं मिल चुकी हैं। किसी एक संसदीय क्षेत्र में सड़क अवसंरचना पर इतना निवेश अपने आप में अध्ययन का विषय है।


यह परियोजना केवल इंजीनियरिंग नहीं है। यह राजनीति भी है। मोदी ने लगातार यह संदेश दिया है कि उनके लिए वाराणसी केवल संसदीय क्षेत्र नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक राजधानी है। इसी कारण यहां विकास परियोजनाओं को प्रतीकात्मक महत्व भी मिलता है। विश्वनाथ धाम इसका उदाहरण था। अब गंगा और वरुणा कॉरिडोर उसी श्रृंखला का अगला अध्याय हैं। इतनी बड़ी परियोजनाओं के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय संतुलन, गंगा और वरुणा के पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा, निर्माण के दौरान यातायात प्रबंधन, और निर्धारित समय में कार्य पूरा करना—ये सभी कसौटियां होंगी। इतिहास गवाह है कि बड़ी परियोजनाओं का मूल्यांकन उनकी घोषणा से नहीं, बल्कि समय पर गुणवत्तापूर्ण निर्माण से होता है। यदि निर्धारित समयसीमा के भीतर दोनों परियोजनाएं पूरी हो जाती हैं, तो वर्ष 2030 तक वाराणसी की तस्वीर आज से बिल्कुल अलग होगी। हवाई अड्डे से आने वाला यात्री बिना भीड़भाड़ में फंसे शहर के प्रमुख हिस्सों तक पहुंचेगा। श्रद्धालु धाम तक कम समय में पहुंचेंगे। लॉजिस्टिक्स तेज होगी। नए शहरी क्षेत्र विकसित होंगे। और सबसे महत्वपूर्ण—पुरानी काशी की गलियां अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ जीवित रह सकेंगी। काशी की सबसे बड़ी ताकत उसका अतीत है। लेकिन केवल अतीत के सहारे कोई शहर भविष्य नहीं बनाता। भविष्य तब बनता है जब विरासत और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी बन जाएं। गंगा और वरुणा के ऊपर बनने वाले एलिवेटेड कॉरिडोरों को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। शायद इसलिए 2014 में बोया गया 'क्योटो विजन' का बीज अब केवल एक राजनीतिक नारा नहीं रह गया है। वह धीरे-धीरे कंक्रीट, स्टील, पुलों, इंटरचेंजों और आधुनिक शहरी नियोजन के रूप में आकार ले रहा है। और यदि यह प्रयोग सफल हुआ, तो आने वाले वर्षों में काशी केवल भारत की आध्यात्मिक राजधानी नहीं रहेगी; वह दुनिया के सामने यह उदाहरण भी पेश करेगी कि विरासत को बचाते हुए विकास की रफ्तार कैसे पकड़ी जाती है।


जाम से मुक्ति का सपना, लेकिन समय पर पूरा होना सबसे बड़ी कसौटी

केंद्रीय मंत्रिमंडल से गंगा और वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर को मंजूरी मिलने के बाद बनारस की चाय की दुकानों, घाटों, बाजारों और व्यापारिक संगठनों में दिनभर इसी की चर्चा रही। गोदौलिया से लेकर पांडेयपुर, चौकाघाट, लहुराबीर, भोजूबीर, कैंट और रिंग रोड तक लोगों की पहली प्रतिक्रिया थी - अगर यह परियोजना समय पर पूरी हो गई तो काशी की तस्वीर सचमुच बदल जाएगी। हर रोज जाम झेलने वाले ऑटो चालक रामजी यादव कहते हैं, "बनारस में सबसे ज्यादा समय सड़क पर ही निकल जाता है। एयरपोर्ट से शहर आने में कई बार डेढ़-दो घंटे लग जाते हैं। अगर एलिवेटेड कॉरिडोर बन गया तो रोज की परेशानी खत्म होगी। गोदौलिया के व्यापारी संजय अग्रवाल का कहना है कि विश्वनाथ धाम बनने के बाद श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ी है, लेकिन सड़कें वही पुरानी हैं। उनका मानना है कि अब परिवहन व्यवस्था भी उसी स्तर की होनी चाहिए। बीएचयू के एक शोधार्थी का कहना है कि किसी भी विश्वस्तरीय शहर की पहचान केवल उसकी विरासत नहीं, बल्कि उसकी कनेक्टिविटी भी होती है। काशी अब उस दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है। हालांकि कुछ लोग सावधानी की भी सलाह देते हैं। चौक क्षेत्र के एक वरिष्ठ नागरिक कहते हैं कि घोषणाएं पहले भी हुई हैं। असली खुशी तब होगी जब काम समय पर पूरा होगा और निर्माण के दौरान शहर की जिंदगी बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं होगी। व्यापारिक संगठनों का मानना है कि इन परियोजनाओं से पर्यटन, होटल, परिवहन, हैंडलूम, सिल्क और हस्तशिल्प कारोबार को भी नई गति मिलेगी। पूर्वांचल से आने वाले वाहनों को शहर के भीतर घंटों फंसना नहीं पड़ेगा। शहर के युवाओं में इस परियोजना को लेकर अलग उत्साह है। सोशल मीडिया पर इसे "न्यू काशी", "फ्यूचर वाराणसी" और "क्योटो विजन" जैसे नामों से चर्चा मिल रही है। वहीं कई लोग यह भी याद दिला रहे हैं कि 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्योटो मॉडल की बात की थी, तब इसे लेकर खूब राजनीतिक बहस हुई थी।


लोगों की अपेक्षाएं अब इससे आगे हैं

काशीवासियों का कहना है कि अब जब विश्वनाथ धाम, नमो घाट, रिंग रोड, रोपवे और एलिवेटेड कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं आकार ले रही हैं, तो अगला कदम सार्वजनिक परिवहन, पार्किंग, ट्रैफिक अनुशासन, पैदल यात्रियों और साइकिल नेटवर्क पर भी होना चाहिए। उनका मानना है कि केवल चौड़ी सड़कें पर्याप्त नहीं होंगी; उनका बेहतर प्रबंधन भी उतना ही जरूरी होगा।


जमीन की आवाज

काशी में इस समय उत्साह है, लेकिन उसके साथ एक अपेक्षा भी जुड़ी है। लोग मानते हैं कि यदि करीब 25 हजार करोड़ रुपये की ये दोनों परियोजनाएं तय समय और गुणवत्ता के साथ पूरी होती हैं, तो यह केवल जाम से राहत की कहानी नहीं होगी, बल्कि उस विकास मॉडल का आधार बनेगी जिसकी चर्चा 2014 में "क्योटो विजन" के रूप में शुरू हुई थी। अब बनारस इंतजार नहीं, बल्कि उस दिन की कल्पना कर रहा है जब गंगा और वरुणा के ऊपर दौड़ती सड़कें उसकी नई पहचान बनेंगी।


बदलेगी शहर की दिशा और दशा

मंडलायुक्त एस. राजलिंगम ने विस्तृत प्रस्तुतीकरण के साथ दोनों परियोजनाओं की रूपरेखा सार्वजनिक की। उन्होंने कहा कि यह केवल सड़क निर्माण नहीं, बल्कि अगले 40-50 वर्षों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया वाराणसी का नया शहरी मास्टर प्लान है। दोनों परियोजनाओं पर 25,445.96 करोड़ रुपये खर्च होंगे और लगभग 89.257 किमी का एलिवेटेड नेटवर्क तैयार होगा, जो वाराणसी को जाम से स्थायी राहत देने के साथ-साथ पर्यटन, व्यापार और भविष्य के शहरी विस्तार का आधार बनेगा। मंडलायुक्त ने कहा कि वाराणसी विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक नगरी है। हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालु, पर्यटक और तीर्थयात्री यहां पहुंचते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सतत प्रयासों से काशी विश्वनाथ धाम के निर्माण के बाद अब शहर के परिवहन ढांचे में भी ऐतिहासिक परिवर्तन होने जा रहा है। बढ़ती आबादी, वाहनों की संख्या और धार्मिक आयोजनों के दबाव को देखते हुए आने वाले दशकों की जरूरतों के अनुरूप यह परियोजना तैयार की गई है।


गंगा एलिवेटेड कॉरिडोर: विश्वस्तरीय इंजीनियरिंग का नमूना

राजलिंगम ने बताया कि राष्ट्रीय राजमार्ग-19 (एनएच-19) से वाराणसी रिंग रोड तक लगभग 46.039 किलोमीटर लंबा छह लेन गंगा एलिवेटेड कॉरिडोर बनाया जाएगा। इसकी अनुमानित लागत 14,447.64 करोड़ रुपये है। परियोजना में कई अत्याधुनिक इंजीनियरिंग संरचनाएं शामिल हैं। इनमें गंगा नदी पर लगभग 910 मीटर लंबा केबल-स्टे सिग्नेचर ब्रिज, करीब 1.32 किलोमीटर लंबा स्टील बॉक्स गर्डर फ्लाईओवर, बहुस्तरीय इंटरचेंज, रैंप, आधुनिक प्रकाश व्यवस्था तथा अत्याधुनिक यातायात प्रबंधन प्रणाली विकसित की जाएगी। उन्होंने बताया कि परियोजना का सबसे बड़ा उद्देश्य काशी विश्वनाथ धाम, नमो घाट, गंगा घाटों, बीएचयू, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, कैंट स्टेशन, बनारस स्टेशन, दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन और लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के बीच निर्बाध संपर्क स्थापित करना है।


60 मिनट का सफर घटकर 20-25 मिनट

मंडलायुक्त के अनुसार वर्तमान में शहर के विभिन्न हिस्सों से काशी विश्वनाथ धाम और गंगा घाट तक पहुंचने में कई बार एक घंटे तक का समय लग जाता है। एलिवेटेड कॉरिडोर बनने के बाद यह समय घटकर 20 से 25 मिनट रह जाएगा। इससे श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों दोनों को बड़ी राहत मिलेगी। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब सावन, देव दीपावली, महाशिवरात्रि या अन्य बड़े आयोजनों में लाखों श्रद्धालु आएंगे तो उन्हें शहर के भीड़भाड़ वाले मार्गों से गुजरने की आवश्यकता नहीं होगी। एलिवेटेड कॉरिडोर से उतरकर सीधे धाम क्षेत्र तक पहुंचने की व्यवस्था विकसित की जाएगी।


वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर से बदलेगी शहर की धड़कन

राजलिंगम ने बताया कि 43.218 किलोमीटर लंबा वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर एनएच-31 को वाराणसी रिंग रोड से जोड़ेगा। इसकी लागत 10,998.32 करोड़ रुपये होगी। यह 6/4 लेन का हाइब्रिड एलिवेटेड कॉरिडोर होगा। उन्होंने कहा कि डिजाइन इस प्रकार तैयार की गई है कि न्यूनतम भूमि अधिग्रहण और न्यूनतम विस्थापन हो। जहां तक संभव हुआ है, मौजूदा संरचनाओं को बचाते हुए मार्ग तय किया गया है। कई स्थानों पर नदी के समानांतर एलिवेटेड मार्ग बनाया जाएगा ताकि आबादी वाले क्षेत्रों पर कम से कम प्रभाव पड़े।


ईंधन की बचत, प्रदूषण में कमी

मंडलायुक्त ने बताया कि दोनों परियोजनाओं के पूरा होने पर वाहनों की औसत गति बढ़ेगी। बार-बार रुकने और जाम में फंसने से होने वाली ईंधन की बर्बादी कम होगी। प्रारंभिक आकलन के अनुसार प्रतिवर्ष एक करोड़ लीटर से अधिक ईंधन की बचत होगी तथा कार्बन उत्सर्जन में भी उल्लेखनीय कमी आएगी।


तीन से पांच वर्ष में पूरा करने की तैयारी

राजलिंगम ने बताया कि दोनों परियोजनाओं को चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जाएगा। वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर को लगभग तीन वर्ष तथा गंगा एलिवेटेड कॉरिडोर को चार से पांच वर्ष में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। निर्माण कार्य के दौरान शहर में यातायात बाधित न हो, इसके लिए भी अलग कार्ययोजना बनाई जाएगी।






Suresh-gandhi


सुरेश गांधी

वरिष्ठ पत्रकार 

वाराणसी

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