इसी माहौल का लाभ उठाकर राजद और जदयू के साथ सभी समाजवादी धारा की पार्टियों को गंगा में बहा देने का इंतजाम भाजपा ने कर दिया है। राजद और जदयू एक-दूसरे को ताकत प्रदान करते थे। लेकिन 2025 के विधान सभा चुनाव में राजद के कमजोर होते नीतीश कुमार को निपटा दिया गया। जब नीतीश कुमार को राज्यसभा के लिए नामांकन के तैयार किया जा रहा था, तब कहा गया है कि नीतीश पुत्र निशांत उपमुख्यमंत्री बनेंगे। इसका खूब प्रचार हुआ। लेकिन राज्यसभा सदस्य निर्वाचित होने पर उनके इस्तीफे के बाद पूरा प्लान बदल गया। मुख्यमंत्री सम्राट चैधरी के साथ उपमुख्यमंत्री के रूप में विजय चैधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव ने शपथ ली। निशांत का नाम हवा में तैरता रह गया। निशांत के मंत्री बनने को लेकर अनेक तरह की चर्चा हुई और अंत में शपथ की कतार खड़े नजर आये। भाजपा ने ऐसी चाल चली कि जदयू का दम घुंटने लगा। जिस भूमिहार और यादव जाति के नेता को उपमुख्यमंत्री बनाया गया, वह जाति जदयू का कोर वोटर नहीं है। भूमिहार भाजपा के और यादव राजद के कोर वोटर हैं। आखिर भाजपा ने जदयू के किस जातीय समूह के वोटर को संतुष्ट करने के लिए उपमुख्यमंत्री बनाया। फिर जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा खुद आरएसएस के स्वयंसेवक और भाजपा के एमएलसी रह चुके हैं।
भाजपा ने जदयू और उसके वैचारिक सहयोगियों के साथ मिलकर पहले राजद को कमजोर किया। इसके बाद जदयू के आधार वोट को चिढ़ाने और उकसाने के लिए उपमुख्यमंत्री पद पर यादव और भूमिहार को बैठा दिया। कुर्मी श्रवण कुमार को जदयू विधायक दल का नेता बना दिया गया। हालांकि वह मंत्री भी हैं। लेकिन विधायक दल के नेता के रूप में उनकी हैसियत लोजपारा के नेता राजू तिवारी, बसपा के नेता सतीश यादव या एआईएमआईएम के अख्तरूल ईमान के समान रह गयी है। जबकि भाजपा ने अपने विधायक दल के नेता को उपमुख्यमंत्री बनवाती रही थी। बिहार में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा भी समाजवादी धारा की रही है, लेकिन वे समाजवाद के बजाये सत्तावाद के ज्यादा करीब रहे हैं। इसके अलावा हम और लोजपारा का अस्तित्व ही सत्तावाद के कारण बचा हुआ है। दरअसल समाजवादियों के समक्ष संकट सत्ता का नहीं, विचार का है। यही उनकी बर्बादी का कारण है। आज की तारीख में भाजपा सभी समाजवादी धारा की पार्टियों को सत्तालोलुप बना चुकी है। भाजपा के खिलाफ खड़ी पार्टियां भाजपा से लड़ती हुई जरूर दिखती हैं, लेकिन उनके विधायक कब भाजपा की सदस्यता ले लें, इसका कोई भरोसा नहीं।
आज सभी समाजवादी पार्टियां या तो भाजपा में मिलने को तैयार बैठी हैं या मिटने के कगार पर खड़ी हैं। अगले विधाान सभा चुनाव होने तक पार्टियों के अस्तित्व को कोई खतरा नहीं है, लेकिन खतरा टलने वाला भी नहीं है। अगले तीन-चार साल तक पार्टियां भले बची रह जाएंगी, लेकिन उनके आधार वोट को संभाले रखना मुश्किल हो जाएगा। वोटर और कार्यकर्ता भी अपने लिए सुरक्षित पार्टी खोज रहे हैं और भाजपा ने सुरक्षा की गारंटी की दुकान खोल रखी है। अब समय की जरूरत है कि राजद और जदयू पार्टी के रूप में एक साथ आएं। राजद और जदयू एक साथ आते हैं तो जीतन राम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा और चिराग पासवान भी साथ आने को विवश होंगे। क्योंकि इन सभी पार्टियों के आधार वोट की वैचारिक समरूपता है और उनमें सवर्णों के खिलाफ स्वाभाविक गुस्सा है। लेकिन भाजपा ने सवर्णों के खिलाफ गुस्से को यादवों के खिलाफ मोड़ने के लिए नीतीश कुमार का इस्तेमाल किया और आज खुद नीतीश कुमार अतीत हो गये। उपेंद्र कुशवाहा बेटे दीपक प्रकाश को एमएलसी बनाने के लिए अलबला रहे हैं।
बिहार में एक और गलत धारणा बनी है कि सम्राट चैधरी के कारण कोईरी वोटर भाजपा के साथ है। दरअलस लालू यादव के खिलाफ एक बड़ी जातीय गोलबंदी है, इसलिए कोईरी उसी गोलबंदी का हिस्सा है। नीतीश एनडीए से हट जाएंगे तो कुशवाहा भी उनके साथ रास्ता बदल लेगा। अब जदयू और राजद को अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए एक साथ आना समय की जरूरत है। बिहार का राजनीतिक यथार्थ यही है कि जदयू और राजद अस्तित्व में साथ-साथ रहेंगे या एक ही साथ गंगा में बहा दिये जाएंगे। और भाजपा ने दोनों को एक साथ गंगा में बहाने की जमीन तैयार कर ली है। इसकी तारीख भी भाजपा और आरएसएस ही तय करेगा।
— बीरेंद्र यादव न्यूज —

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