- मंदिरों से घाटों तक उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब, कांवड़ियों के जयघोष से गूंजी नगरी
- बिछड़ी महिला श्रद्धालु को मंदिर प्रशासन ने परिजनों से मिलवाया
अस्सी से दशाश्वमेध तक चलते हुए लगा कि शहर चल नहीं रहा, श्रद्धा बह रही है। गीले पत्थरों पर नंगे पांव उतरते श्रद्धालु, हाथों में कलश लिए महिलाएं, कंधों पर केसरिया कांवड़ उठाए युवक और उनके पीछे-पीछे चलते बुजुर्ग—हर चेहरा अलग था, पर आंखों में एक ही दिशा थी, बाबा विश्वनाथ की ओर। अस्सी से राजघाट तक गंगा किनारे हर दृश्य आस्था का जीवंत चित्र था। हल्की फुहारों के बीच भी श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। कई परिवार बच्चों और बुजुर्गों के साथ स्नान कर सीधे विश्वनाथ धाम की ओर बढ़ते दिखे। नाविकों का कहना था कि सुबह से ही घाटों पर सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक भीड़ रही। श्री काशी विश्वनाथ धाम के बाहर लंबी कतारें सुबह से ही लग गई थीं। बैरिकेडिंग के बीच धीरे-धीरे आगे बढ़ते श्रद्धालुओं के चेहरों पर थकान से अधिक प्रतीक्षा का तेज था। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही घंटों, शंखों और वैदिक मंत्रों की ध्वनि वातावरण को अलौकिक बना रही थी। शिवलिंग पर जलाभिषेक का क्रम लगातार चलता रहा। बेलपत्र, धतूरा, आक और गंगाजल अर्पित करते श्रद्धालुओं की आंखों में गहरी श्रद्धा झलक रही थी। इसी भीड़ के बीच काशी की संवेदनशीलता का एक मार्मिक दृश्य भी सामने आया। राजस्थान के झुंझुनू जनपद से दर्शन के लिए आई श्रद्धालु श्रीमती संजना गोयल अपने सहयोगी दल से बिछुड़ गईं। भीड़ में अकेली रह गई महिला की सूचना मिलते ही श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास सक्रिय हो गया। मंदिर प्रशासन ने उपलब्ध विवरण के आधार पर उनके सुपुत्र से दूरभाष पर संपर्क स्थापित किया, परिजनों को स्थिति की जानकारी दी और तत्परता से उन्हें सुरक्षित उनके परिवार तक पहुंचाने की व्यवस्था की। भीड़ के बीच यह घटना केवल प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि तीर्थ की मानवीय आत्मा का परिचय बन गई।
धाम में सक्रिय हेल्पडेस्क, सूचना केंद्र और खोया-पाया केंद्र लगातार श्रद्धालुओं की सहायता करते रहे। मंदिर न्यास के कर्मियों को कई स्थानों पर बुजुर्गों और महिलाओं को मार्गदर्शन देते देखा गया। श्रावण मास के दौरान 24 घंटे सहायता व्यवस्था बनाए रखने का दावा गुरुवार को जमीन पर दिखाई भी दिया। विश्वनाथ गली में सावन का अलग ही रंग था। फूलों की दुकानों पर भीड़, बेलपत्र के गट्ठर, रुद्राक्ष मालाएं, भस्म और पूजा सामग्री खरीदते श्रद्धालु, गर्म जलेबी और मालपुए की खुशबू—हर मोड़ पर उत्सव का विस्तार दिखाई देता था। दुकानदारों के अनुसार सुबह से ही बिक्री में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। कांवड़ियों का प्रवाह दोपहर बाद और तेज हो गया। पूर्वांचल और बिहार से आए जत्थे बारिश की बूंदों के बीच भी निर्बाध आगे बढ़ते रहे। कई स्थानों पर स्थानीय लोगों ने शरबत, फल और चिकित्सा सहायता के शिविर लगाए। सड़क किनारे बैठकर पैर धोते कांवड़ियों के चेहरे पर यात्रा की थकान कम और बाबा तक पहुंचने का संतोष अधिक दिखाई देता था। शाम ढलते-ढलते दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती ने सावन की पहली तारीख को पूर्णता दी। बादलों से ढका आकाश, गंगा पर तैरती रोशनी और आरती की लौ के बीच हजारों श्रद्धालु मंत्रमुग्ध खड़े रहे। उस क्षण काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि साझा आस्था की धड़कन बन गई थी। सावन का पहला दिन यह बता गया कि काशी में पर्व कैलेंडर से नहीं उतरते, वे जीवन में उतरते हैं। यहां बारिश भी भक्ति का संकेत बन जाती है, गंगा भी स्मृति बन जाती है और भीड़ भी परिवार का विस्तार। गुरुवार को काशी सचमुच झूम उठी—गंगा की लहरों में, कांवड़ियों के कदमों में और महादेव के नाम से धड़कते हर हृदय में। प्रदेश के आयुष, राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. दयाशंकर मिश्र 'दयालु' ने कार्यकर्ताओं के साथ गुरु पूर्णसिद्ध पीठ श्री जागेश्वर महादेव मंदिर, पतालपूरी मठ, औसनगंज में विधि-विधान से दर्शन-पूजन किया और प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना की। इस अवसर पर मंत्री जी के साथ बाबा का दर्शन किया और प्रसाद ग्रहण किया।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें