मुख्यमंत्री योगी के तीखे तेवर, अखाड़ा परिषद के 9 अगस्त कारसेवा आह्वान, विपक्ष के सवाल और अदालत में लंबित विवाद के बीच गरमाई उत्तर प्रदेश की सियासत. मतलब साफ है आस्था, संविधान और राजनीति - इन तीनों के संगम पर आज श्रीकृष्ण जन्मभूमि का प्रश्न खड़ा दिखाई देता है। अदालत में विचाराधीन विवाद, संत समाज की मुखर होती आवाज़, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लगातार आक्रामक बयान और विपक्ष की राजनीतिक प्रतिक्रिया ने मथुरा को अचानक राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या श्रीकृष्ण जन्मभूमि केवल न्यायिक प्रक्रिया का विषय रहेगी, या फिर 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे प्रभावशाली वैचारिक मुद्दा बनकर उभरेगी?
दूसरी ओर विपक्ष के सामने भी चुनौती कम नहीं है। समाजवादी पार्टी की राजनीति एक ओर अपने परंपरागत मुस्लिम समर्थन आधार पर टिकी है, वहीं यादव समाज की सांस्कृतिक पहचान भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ी मानी जाती है। ऐसे में मथुरा का प्रश्न अखिलेश यादव के लिए केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक चुनौती भी बनता दिखाई देता है। संत समाज लगातार उनसे इस विषय पर स्पष्ट रुख की अपेक्षा जता रहा है। अखाड़ा परिषद का संदेश भी स्पष्ट है। संत समाज इसे सदियों पुरानी आस्था और सांस्कृतिक अस्मिता का अधूरा अध्याय मानते हुए आगे बढ़ाने की बात कर रहा है। वहीं विपक्ष इसे चुनावी ध्रुवीकरण की रणनीति के रूप में देख रहा है। यही भारतीय लोकतंत्र की जटिलता भी है—जहां एक ही विषय किसी के लिए आस्था का प्रश्न होता है, तो किसी के लिए राजनीति का। इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि से जुड़े अनेक मुकदमे अभी न्यायालय में विचाराधीन हैं। विवादित लगभग 13.37 एकड़ परिसर पर अंतिम निर्णय न्यायपालिका को ही करना है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थायी समाधान भी वही होगा, जो संविधान और न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप निकले। मुख्यमंत्री योगी स्वयं भी अनेक अवसरों पर न्यायिक प्रक्रिया के सम्मान की बात दोहरा चुके हैं।
फिर भी राजनीति केवल अदालत के फैसलों की प्रतीक्षा नहीं करती; वह जनभावनाओं की दिशा भी पढ़ती है। इतिहास गवाह है कि अयोध्या का आंदोलन केवल न्यायालय के भीतर नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विमर्श के समानांतर भी आगे बढ़ा था। यही कारण है कि अब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठने लगा है कि क्या मथुरा भी उसी तरह व्यापक जनचर्चा का केंद्र बनेगी, या यह केवल वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों का अस्थायी उभार है। इतिहास, आस्था और राजनीति—तीनों की अपनी-अपनी गति होती है। मथुरा भारतीय सभ्यता की स्मृति है, करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केंद्र है और साथ ही एक संवेदनशील न्यायिक विषय भी। ऐसे में किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले यह स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र में आस्था और संविधान दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि का प्रश्न न्यायालय की सीमाओं में ही रहेगा या उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे प्रभावशाली विमर्श के रूप में स्थापित होगा। फिलहाल इतना तय है कि मथुरा ने दस्तक दे दी है। अब निगाहें इस पर हैं कि यह दस्तक इतिहास का नया अध्याय लिखेगी या केवल राजनीति के वर्तमान अध्याय का सबसे मुखर प्रतीक बनकर रह जाएगी।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति अब टाली नहीं जा सकती
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुद्दे पर अपने रुख को और स्पष्ट करते हुए 9 अगस्त को कारसेवा का आह्वान किया है। परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी ने कहा कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि करोड़ों सनातन श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है और इस विषय का समाधान शीघ्र होना चाहिए। उन्होंने कहा कि संत समाज लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करता आया है, लेकिन आस्था के इस प्रश्न पर जनजागरण भी आवश्यक है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि केवल भूमि का प्रश्न नहीं, करोड़ों हिंदुओं की आस्था का विषय है। संत समाज संविधान और न्यायालय का सम्मान करता है, लेकिन समाज को जागृत करना भी हमारा दायित्व है। परिषद की ओर से कहा गया है कि प्रस्तावित कारसेवा का उद्देश्य श्रद्धालुओं को संगठित करना और श्रीकृष्ण जन्मभूमि से जुड़े विषय पर जनजागरण करना है। हालांकि इस पूरे विवाद से जुड़े विभिन्न मुकदमे अभी न्यायालय में लंबित हैं और अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी


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