उन्होंने कहा कि इन प्रयासों के माध्यम से बिहार एवं झारखंड के किसानों, महिलाओं और युवाओं को सशक्त बनाने के साथ-साथ कृषि क्षेत्र में रोजगार एवं आय के नए अवसर सृजित किए जा सकते हैं। उन्होंने कृषि विज्ञान केन्द्रों द्वारा किए जा रहे कार्यों के प्रभाव का नियमित आकलन एवं मूल्यांकन करने पर भी जोर दिया, ताकि किसानों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप तकनीकों का प्रभावी हस्तांतरण सुनिश्चित किया जा सके और राज्य सरकार को भी उपयुक्त तकनीकी सुझाव उपलब्ध कराए जा सकें। डॉ. बिकास दास, निदेशक, भा.कृ.अनु.प.-राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केन्द्र, मुजफ्फरपुर ने बिहार में लीची की खेती की व्यापक संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भविष्य में राज्य में लीची की खेती के क्षेत्रफल में लगभग 20 लाख हेक्टेयर तक विस्तार की संभावना है। उन्होंने लीची उत्पादन से संबंधित नवीन तकनीकों को सही समय पर किसानों तक पहुँचाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने सभी कृषि विज्ञान केन्द्रों से अनुरोध किया कि वे अपने प्रक्षेत्रों पर कम से कम 10–12 लीची के पौधे लगाएँ, ताकि विभिन्न जिलों में लीची की खेती की संभावनाओं का व्यवहारिक आकलन किया जा सके तथा राज्य में लीची के उत्पादन और क्षेत्र विस्तार की संभावनाओं को और अधिक सुदृढ़ किया जा सके। डॉ. अनूप दास, निदेशक, भा.कृ.अनु.प.-पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना ने बिहार एवं झारखंड के छोटे और सीमांत किसानों की आय बढ़ाने के लिए समेकित कृषि प्रणाली को व्यापक स्तर पर अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कृषि के साथ पशुपालन, बागवानी, मत्स्यपालन एवं अन्य कृषि-आधारित गतिविधियों को जोड़कर किसानों के लिए अधिक टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि मॉडल विकसित किए जा सकते हैं।
डॉ. निर्मल सिंह दहिया, प्रसार शिक्षा निदेशक, बिहार पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय, पटना ने कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से पशुपालन एवं पशुधन आधारित गतिविधियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कृषि विज्ञान केन्द्रों को तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराने के लिए बिहार पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय की ओर से हरसंभव सहयोग प्रदान करने का आश्वासन दिया। ऑनलाइन माध्यम से जुड़े डॉ. आर. आर. बर्मन, सहायक उप-महानिदेशक (कृषि विस्तार), नई दिल्ली ने तकनीकी हस्तांतरण, नवीन प्रौद्योगिकियों को अपनाने तथा बाजारोन्मुखी कृषि प्रसार को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए केवल तकनीक का प्रसार पर्याप्त नहीं है, बल्कि उत्पादन को बाजार की मांग से जोड़ना भी आवश्यक है। डॉ. सुजय रक्षित, निदेशक, भा.कृ.अनु.प.-भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान, राँची ने बिहार एवं झारखंड में कृषि को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने के लिए कृषि विज्ञान केन्द्रों, भा.कृ.अनु.प. के विभिन्न संस्थानों तथा कृषि विश्वविद्यालयों के बीच बेहतर समन्वय एवं सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के वर्तमान परिदृश्य में किसानों तक सही समय पर सटीक एवं उपयोगी कृषि संबंधी जानकारी पहुँचाना अत्यंत आवश्यक है, ताकि बदलती जलवायु से उत्पन्न जोखिमों को कम किया जा सके और किसानों को संभावित नुकसान से बचाया जा सके।
इस अवसर पर भा.कृ.अनु.प.-अटारी, पटना की वार्षिक रिपोर्ट-2025 का भी विमोचन किया गया, जिसमें संस्थान एवं इसके अधीन कृषि विज्ञान केन्द्रों द्वारा किए गए प्रमुख कार्यों, उपलब्धियों एवं विभिन्न कृषि विस्तार पहलों का संकलन प्रस्तुत किया गया है। साथ ही, संस्थान की हिंदी पत्रिका ‘पूर्वी किरण’ का भी विमोचन किया गया, जिसमें पूर्वी भारत के किसानों एवं ग्रामीण समुदायों के लिए उपयोगी कृषि तकनीकों, प्रसार गतिविधियों, क्षेत्रीय अनुभवों तथा कृषक सफलता की कहानियों को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है। समारोह में भा.कृ.अनु.प.-अटारी, पटना के डॉ. मोनबरुल्लाह, डॉ. अमरेन्द्र कुमार, डॉ. डी. वी. सिंह, डॉ. प्रज्ञा भदौरिया, डॉ. तेजस्विनी कपिल सहित संस्थान के समस्त वैज्ञानिकों एवं कर्मचारियों ने सक्रिय रूप से सहभागिता की। सभी ने समारोह में उपस्थित होकर कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना योगदान दिया तथा कृषि विस्तार, तकनीकी हस्तांतरण एवं कृषि विज्ञान केन्द्रों की प्रभावी कार्यप्रणाली को और सुदृढ़ करने के संकल्प को साझा किया। समारोह में कृषि विस्तार, नवीन तकनीकों के प्रसार, बाजारोन्मुखी कृषि, कृषि उद्यमिता, जलवायु अनुकूल कृषि तथा कृषि विज्ञान केन्द्रों की भविष्य की भूमिका से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर सार्थक चर्चा हुई। समारोह ने बिहार एवं झारखंड में कृषि अनुसंधान को किसानों की आवश्यकताओं से जोड़ने तथा तकनीकी नवाचारों को खेत तक पहुँचाने के लिए सामूहिक प्रयासों को और मजबूत करने का संदेश दिया।

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