कार्यक्रम के रिसोर्स पर्सन एवं समन्वयक डॉ. आई. सी. ठाकुर ने प्रस्तुति के माध्यम से जल संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण पर एक प्रेरणादायक एवं तकनीकी व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि भारत विश्व की लगभग 18 प्रतिशत जनसंख्या का वहन करता है, जबकि वैश्विक फ्रेशवाटर रिसोर्सेज में भारत की हिस्सेदारी लगभग 4 प्रतिशत है। उन्होंने प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता में लगातार हो रही कमी की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए बताया कि 1,700 घन मीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष से कम जल उपलब्धता को जल-तनाव स्थिति माना जाता है। आज हम इसी स्थिति में आ चुके है। प्रकृति के प्रति हम अभी भी जागरूक नहीं हुए तो हम जल-संकटग्रस्त स्थिति में आ जायेंगे । डॉ. ठाकुर ने कहा कि जल संरक्षण का अर्थ केवल पानी की बचत करना नहीं है, बल्कि जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और जल के पुनः उपयोग को एकीकृत रूप से अपनाना आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों को समझाया कि वर्षा के पानी को केवल नालियों में बहाने के बजाय उसका भंडारण एवं भूजल पुनर्भरण किया जा सकता है। व्याख्यान के दौरान रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग की तकनीकी अवधारणा को भी उदाहरण के साथ समझाया गया। विद्यार्थियों को बताया गया कि इस डिजाइन के माध्यम से छत से प्राप्त वर्षा जल का संग्रहण एवं भूजल पुनर्भरण किया जा सकता है। इस दौरान वर्षा जल संचयन की मात्रा निर्धारित करने की तकनीकी गणना को भी सरल उदाहरण के माध्यम से समझाया गया। उन्होंने यह भी बताया कि पेड़ केवल हरियाली बढ़ाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे रनऑफ को नियंत्रित करने, मृदा अपरदन को कम करने तथा स्थानीय तापमान को नियंत्रित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को केवल पौधा लगाने के बजाय उसके संरक्षण, विकास एवं जीवित रहने की दर पर विशेष ध्यान देने के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण संकल्प समारोह रहा, जहाँ उन्होंने सभी छात्र-छात्राओं एवं उपस्थित शिक्षकों को जल संरक्षण, वृक्षारोपण, वृक्षों के संरक्षण तथा पर्यावरण सुरक्षा के प्रति व्यक्तिगत जिम्मेदारी निभाने का संकल्प दिलाया। डॉ. ठाकुर ने विद्यार्थियों एवं संस्थान के सभी शिक्षकों से अपने नाम से कम-से-कम एक पौधा लगाने तथा उसके संरक्षण एवं जीवित रहने की जिम्मेदारी लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि संस्थान परिसर में इस कार्यक्रम के अंतर्गत लगाए जाने वाले सभी वृक्षों की जी.आई.एस. आधारित टैगिंग कर किया जाएगा, जिससे प्रत्येक पौधे के विकास एवं संरक्षण की निगरानी की जा सके। कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र अत्यंत संवादात्मक एवं ज्ञानवर्धक रहा। छात्र-छात्राओं ने जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, वृक्ष संरक्षण तथा पर्यावरण से जुड़े विभिन्न विषयों पर प्रश्न पूछे। संसाधन व्यक्ति द्वारा विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का तकनीकी एवं व्यावहारिक तरीके से समाधान किया गया। कार्यक्रम में संस्थान के प्रो. प्रफुल्ल चंद्र, डॉ. अबुल कलाम आज़ाद सहित अन्य सम्मानित शिक्षकगण भी उपस्थित रहे। शिक्षकों की उपस्थिति ने विद्यार्थियों में कार्यक्रम के प्रति उत्साह एवं सहभागिता को और बढ़ाया। कार्यक्रम के अंत में प्राचार्य डॉ. चंदन कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में प्रथम वर्ष के लगभग 400 छात्र-छात्राओं की सक्रिय भागीदारी रही। कार्यक्रम ने विद्यार्थियों को यह संदेश दिया कि जल संरक्षण, वृक्ष संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित विषय नहीं हैं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी हैं।

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