- हर वर्ष स्कूलों की बंदी, यातायात अव्यवस्था और जनजीवन पर असर के बीच संतुलित व्यवस्था की जरूरत
पिछले एक दशक में बढ़ा यात्रा का दायरा
विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले दस वर्षों में कांवड़ यात्रा का स्वरूप पहले की तुलना में कहीं अधिक विशाल हुआ है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और बिहार सहित अनेक राज्यों से करोड़ों श्रद्धालु इसमें भाग लेने लगे हैं। इसके साथ ही सुरक्षा व्यवस्था, यातायात नियंत्रण और प्रशासनिक चुनौतियाँ भी कई गुना बढ़ गई हैं। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के अनेक जिलों में यात्रा के दौरान कई दिनों तक स्कूल-कॉलेज बंद रखने के आदेश जारी किए जाते रहे हैं। प्रशासन का तर्क है कि लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ और मार्ग परिवर्तन के कारण विद्यार्थियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। वहीं अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि हर वर्ष शिक्षा प्रभावित होना दीर्घकालीन समाधान नहीं हो सकता। कांवड़ यात्रा के दौरान सबसे बड़ी चुनौती यातायात व्यवस्था होती है। राष्ट्रीय राजमार्गों और प्रमुख सड़कों पर कई किलोमीटर लंबे जाम आम बात बन जाते हैं। कार्यालय जाने वाले कर्मचारियों, व्यापारियों और दैनिक यात्रियों को घंटों सड़क पर बिताने पड़ते हैं। इसके अलावा स्कूल और कॉलेज कई दिनों तक बंद रहते हैं। अस्पताल पहुँचने में मरीजों और एम्बुलेंस को कठिनाई होती है। छोटे व्यापारियों और दैनिक मजदूरों की आय प्रभावित होती है। सार्वजनिक परिवहन बाधित होने से यात्रियों को अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। कई स्थानों पर छोटी-छोटी घटनाएँ भी कानून-व्यवस्था की चुनौती बन जाती हैं। हालाँकि यह भी सच है कि अधिकांश कांवड़िये पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ यात्रा पूरी करते हैं। विवाद और हिंसा की घटनाएँ सीमित संख्या में होती हैं, लेकिन उनका प्रभाव व्यापक चर्चा का विषय बन जाता है।
पिछले दस वर्षों की प्रमुख घटनाएँ
-वर्ष 2016 और 2017 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ स्थानों पर कांवड़ियों और वाहन चालकों के बीच विवाद तथा तोड़फोड़ की घटनाएँ सामने आईं।
-2018 और 2019 में दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस-वे तथा अन्य मार्गों पर कई घंटे तक जाम लगा। कई जिलों में विद्यालयों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा।
-2020 और 2021 में कोविड-19 महामारी के कारण यात्रा सीमित रही और कई राज्यों ने प्रतिबंध लगाए।
-2022 से यात्रा फिर सामान्य रूप से प्रारंभ हुई और करोड़ों श्रद्धालुओं की भागीदारी दर्ज की गई। इसके साथ ही सुरक्षा व्यवस्था और यातायात प्रबंधन फिर बड़ी चुनौती बनकर सामने आया।
-2023, 2024 और 2025 में उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड के कई जिलों में स्कूल-कॉलेजों को कई दिनों तक बंद रखने या ऑनलाइन कक्षाएँ संचालित करने के आदेश जारी किए गए।
क्या स्कूल-कॉलेज बंद करना उचित है?
यह प्रश्न दो दृष्टिकोणों से देखा जाना चाहिए। प्रशासन का कहना है कि जब करोड़ों श्रद्धालु सड़कों पर हों और प्रमुख मार्ग पूरी तरह कांवड़ मार्ग घोषित कर दिए जाएँ, तब विद्यार्थियों की सुरक्षा सर्वोपरि हो जाती है। ऐसे में अस्थायी बंदी व्यावहारिक निर्णय माना जाता है। दूसरी ओर शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि केवल कुछ मार्ग प्रभावित हैं, तो पूरे जिले के सभी शिक्षण संस्थानों को बंद करना आवश्यक नहीं होना चाहिए। वैकल्पिक मार्ग, समय परिवर्तन या ऑनलाइन कक्षाओं जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं। प्रख्यात शिक्षाविद डॉ. राकेश सिन्हा का मानना है कि धार्मिक आस्था का सम्मान लोकतंत्र की पहचान है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था बार-बार बाधित होना उचित नहीं। प्रशासन को तकनीक और बेहतर प्रबंधन का सहारा लेना चाहिए। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त डॉ. एस. वाई. कुरैशी ने कई अवसरों पर सार्वजनिक आयोजनों के संदर्भ में कहा है कि लोकतंत्र में सभी नागरिकों के अधिकार समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि किसी एक गतिविधि के कारण दूसरे नागरिकों के अधिकार अनावश्यक रूप से प्रभावित न हों। प्रबंधन विशेषज्ञ प्रो. अनुज धर का कहना है के भीड़ प्रबंधन केवल पुलिस का विषय नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक योजना, ट्रैफिक इंजीनियरिंग और नागरिक सहभागिता का संयुक्त परिणाम होता है। यातायात विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि पहले से विस्तृत योजना बनाई जाए तो अधिकांश समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
क्या है स्थायी समाधान
हर वर्ष एक जैसी समस्याएँ सामने आने का अर्थ है कि अब अस्थायी नहीं बल्कि दीर्घकालिक समाधान तलाशने होंगे।
1.सबसे पहले प्रमुख कांवड़ मार्गों पर स्थायी कांवड़ कॉरिडोर विकसित किए जाने चाहिए ताकि सामान्य यातायात प्रभावित न हो। 2.यात्रा को चरणबद्ध या क्षेत्रवार व्यवस्थित करने पर विचार किया जा सकता है जिससे एक समय में अत्यधिक भीड़ न हो।
3.केवल कांवड़ मार्ग से जुड़े क्षेत्रों के स्कूलों में अवकाश दिया जाए, जबकि अन्य क्षेत्रों में नियमित पढ़ाई जारी रहे। आवश्यकता पड़ने पर ऑनलाइन या हाइब्रिड कक्षाएँ संचालित की जा सकती हैं।
4.अस्पतालों के लिए चैबीसों घंटे ग्रीन कॉरिडोर सुनिश्चित किया जाए ताकि एम्बुलेंस कभी न रुके।
5.जीपीएस आधारित ट्रैफिक प्रबंधन, वैकल्पिक मार्गों की अग्रिम सूचना, पर्याप्त पार्किंग, अस्थायी शिविर और विश्राम स्थलों का निर्माण भी आवश्यक है।
6.धार्मिक संगठनों और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए ताकि श्रद्धालुओं को भी अनुशासन और यातायात नियमों के पालन के लिए प्रेरित किया जा सके।
7.किसी भी प्रकार की तोड़फोड़, हिंसा या कानून हाथ में लेने की घटना पर निष्पक्ष और त्वरित कार्रवाई हो, ताकि पूरी यात्रा की गरिमा बनी रहे।
आस्था और अधिकार-दोनों का सम्मान आवश्यक
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है। साथ ही शिक्षा, आवागमन और सुरक्षित जीवन का अधिकार भी सुनिश्चित करता है। इसलिए किसी भी नीति का उद्देश्य इन अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना होना चाहिए। कांवड़ यात्रा भारत की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान हर नागरिक का दायित्व है। वहीं प्रशासन का यह दायित्व भी है कि आम नागरिकों, विद्यार्थियों, मरीजों और व्यापारियों का जीवन अनावश्यक रूप से प्रभावित न हो।
कांवड़ यात्रा को समस्या के रूप में नहीं, बल्कि एक विशाल सार्वजनिक आयोजन के रूप में देखने की आवश्यकता है, जिसके लिए आधुनिक प्रबंधन, वैज्ञानिक योजना और संवेदनशील प्रशासन अनिवार्य है। हर वर्ष स्कूलों की बंदी, यातायात अव्यवस्था और जनजीवन में बाधा यदि दोहराई जा रही है, तो यह संकेत है कि अब स्थायी समाधान की दिशा में गंभीर पहल की जानी चाहिए। आस्था और व्यवस्था एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि सरकार, प्रशासन, धार्मिक संगठन और समाज मिलकर दूरदर्शी योजना बनाएँ, तो करोड़ों श्रद्धालुओं की यात्रा भी सुचारु रूप से संपन्न हो सकती है और आम नागरिकों का जीवन भी सामान्य बना रह सकता है। यही संतुलन भारत की लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक परंपरा की वास्तविक पहचान है।
डॉ. चेतन आनंद
(कवि और पत्रकार)

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