वाराणसी : स्वराज के अमर पुजारी को काशी का नमन - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 1 अगस्त 2026

वाराणसी : स्वराज के अमर पुजारी को काशी का नमन

  • लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि पर सिगरा तिराहे पर उमड़ा मराठी समाज, प्रतिमा पर अर्पित किए श्रद्धा-सुमन

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वाराणसी (सुरेश गांधी). सावन की भक्ति और राष्ट्रभाव से भरे काशी के वातावरण में शनिवार की सुबह एक बार फिर स्वराज के अमर पुजारी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की स्मृतियों से आलोकित हो उठी। उनकी पुण्यतिथि पर काशी के मराठी समाज ने सिगरा तिराहे पर स्थित तिलक प्रतिमा पर श्रद्धा-सुमन अर्पित कर राष्ट्रनायक को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। कार्यक्रम केवल औपचारिक पुष्पांजलि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्वाधीनता, स्वाभिमान और सांस्कृतिक चेतना के उन मूल्यों को पुनः स्मरण करने का अवसर बना, जिन्हें तिलक ने अपने जीवन से प्रतिष्ठित किया। प्रातः आठ बजे वाराणसी नगर निगम के पार्षद संतोष सोलापुरकर के नेतृत्व में प्रतिमा स्थल पर स्वच्छता अभियान चलाया गया। उपस्थित लोगों ने स्वयं प्रतिमा परिसर की सफाई की और राष्ट्रनायक के प्रति अपनी श्रद्धा को कर्म के रूप में व्यक्त किया। इसके बाद प्रतिमा का स्नान कराया गया, उसे स्वच्छ कर अंगवस्त्र अर्पित किया गया तथा माल्यार्पण किया गया। वातावरण में भारत माता के जयघोष और लोकमान्य तिलक अमर रहें के स्वर गूंजते रहे। सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक केवल स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, वे भारतीय आत्मा के जागरण के महापुरुष थे। उनका व्यक्तित्व प्रखर राष्ट्रवाद, अदम्य साहस, गहन विद्वत्ता और जननेतृत्व का अद्भुत समन्वय था। उन्होंने स्वराज को केवल राजनीतिक अधिकार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान का प्रश्न माना। उनका अमर उद्घोष 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा' आज भी भारतीय लोकतंत्र की चेतना में स्पंदित होता है।


वक्ताओं ने कहा कि अंग्रेजी शासन के विरुद्ध तिलक का तेवर सदैव निर्भीक और आक्रामक रहा। जनमानस ने उनके ओजस्वी वक्तृत्व और राष्ट्रसमर्पण से प्रभावित होकर उन्हें 'लोकमान्य' की उपाधि प्रदान की। उन्होंने सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा प्रारंभ कर समाज को सांस्कृतिक सूत्र में बांधने का कार्य किया और राष्ट्रीय आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाया। यह उत्सव धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता का विराट मंच बन गया। कार्यक्रम में तिलक की पत्रकारिता पर भी विस्तार से चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि मराठी दैनिक 'केसरी' और अंग्रेजी पत्र 'मराठा' के माध्यम से उन्होंने औपनिवेशिक शासन की नीतियों को चुनौती दी और स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक धार प्रदान की। जेल की कठोर परिस्थितियों में भी उनका चिंतन अविराम रहा। मांडले कारागार में रचित 'गीता रहस्य' आज भी कर्मयोग और राष्ट्रधर्म की अद्वितीय व्याख्या मानी जाती है। काशी की इस श्रद्धांजलि सभा ने यह संदेश दिया कि राष्ट्रनिर्माण केवल इतिहास की स्मृतियों से नहीं, बल्कि उन आदर्शों को वर्तमान जीवन में उतारने से होता है। जब समाज अपने महापुरुषों को केवल प्रतिमाओं तक सीमित न रखकर उनके विचारों को जीवन का मार्गदर्शक बनाता है, तभी श्रद्धांजलि सार्थक होती है। गंगा तट की यह प्राचीन नगरी आज भी उन राष्ट्रपुरुषों को उतनी ही श्रद्धा से स्मरण करती है, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अस्मिता के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। इस अवसर पर यादव राव पाठक, गोविंद शिधोरे, साधना वेदांती, मकरंद महेस्कर, षडानन पाठक कारखेडकर, सुहास पटवर्धन, गजानन जोशी, प्रणव देशपांडे सहित मराठी समाज के अनेक गणमान्य सदस्य उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रगान के साथ लोकमान्य तिलक के आदर्शों पर चलने का संकल्प दोहराया गया।

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