दिन की सौर बिजली को रात तक पहुंचाने की कोशिश
SECI की नीलामी को सामान्य सौर बिजली खरीदने के तरीके से अलग तरीके से डिजाइन किया गया था। बिजली की सबसे ज्यादा जरूरत आम तौर पर शाम, रात और सुबह के समय होती है। इसलिए इस योजना में उन्हीं घंटों में ज्यादा बिजली उपलब्ध कराने की शर्त रखी गई। बिजली उत्पादकों को खरीदार द्वारा चुने गए छह पीक घंटों में कम से कम 90 प्रतिशत क्षमता उपलब्ध करानी होगी। सूरज न होने वाले बाकी घंटों में यह सीमा 70 प्रतिशत है। वहीं दिन के सौर घंटों में कम से कम 50 से 60 प्रतिशत क्षमता उपलब्ध करानी होगी। हर 15 मिनट के ब्लॉक में प्रदर्शन की जांच होगी। कमी रहने पर कॉन्ट्रैक्ट कीमत की 1.5 गुना दर से जुर्माना लगाया जा सकता है। यानी सिर्फ सोलर पैनल लगा देना पर्याप्त नहीं है। बिजली तब भी देनी होगी जब सूरज नहीं चमक रहा हो।
यहीं बैटरी स्टोरेज की भूमिका आती है।
1,000 मेगावाट बिजली के लिए कितनी क्षमता चाहिए?IECC के अध्ययन में भारत के 10 राज्यों में 10 वर्षों के हर घंटे के मौसम संबंधी आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। अध्ययन के मुताबिक राजस्थान जैसे अच्छे सौर संसाधन वाले इलाकों में हर 1,000 मेगावाट की ऐसी बिजली आपूर्ति के लिए सबसे कम लागत वाला मॉडल करीब 3,000 मेगावाट सौर क्षमता और 12 गीगावाट-घंटे बैटरी स्टोरेज का होगा। जिन राज्यों में सौर संसाधन कम हैं या मानसून का असर ज्यादा है, वहां सौर क्षमता की जरूरत लगभग 15 से 20 प्रतिशत अधिक हो सकती है। बैटरी की जरूरत फिर भी करीब 12 गीगावाट-घंटे रह सकती है। IECC के निदेशक और अध्ययन के मुख्य लेखक उमेद पालिवाल के मुताबिक भारत की भौगोलिक स्थिति इस मॉडल के लिए मददगार है। भारत भूमध्य रेखा के काफी करीब है। इसलिए यहां पूरे साल सौर ऊर्जा उत्पादन में मौसमी अंतर यूरोप जैसे ऊंचे अक्षांश वाले देशों की तुलना में कम रहता है। भारत के सामने मुख्य चुनौती दिन में मिलने वाली भरपूर सौर बिजली को शाम और रात तक पहुंचाने की है। कम लागत वाली बैटरी इस काम में मदद कर सकती हैं।
₹5.25 की कीमत क्यों महत्वपूर्ण है?
इस नीलामी में 16 कंपनियों ने बोली लगाई। इनमें से सात डेवलपरों को क्षमता मिली। सभी विजेता बोलियां सिर्फ एक पैसे के दायरे में रहीं, यानी ₹5.25 से ₹5.26 प्रति यूनिट। IECC के सह-निदेशक और अध्ययन के सह-लेखक निकित अभ्यंकर के मुताबिक यह बात महत्वपूर्ण है, क्योंकि ₹5.25 की कीमत किसी एक कंपनी की बेहद आक्रामक बोली नहीं लगती। सात अलग-अलग कंपनियों का लगभग एक ही कीमत पर बोली लगाना संकेत देता है कि यह कीमत भारत में भरोसेमंद नवीकरणीय बिजली के लिए एक बाजार मानक बन सकती है। और एक और बात है। 25 साल तक कीमत नाममात्र रूप से स्थिर रहने के कारण महंगाई को ध्यान में रखने पर वास्तविक कीमत समय के साथ घटती जाएगी।
उद्योगों के लिए भी बड़ा बदलाव
अगर इस मॉडल को बड़े पैमाने पर अपनाया जाता है तो इसका फायदा सिर्फ बिजली वितरण कंपनियों को नहीं होगा। डेटा सेंटर, एल्युमिनियम, स्टील और दूसरे ऊर्जा-गहन उद्योगों को दिन-रात लगातार बिजली चाहिए। इन उद्योगों के लिए ₹5.25 प्रति यूनिट पर 25 साल तक मिलने वाली भरोसेमंद और स्वच्छ बिजली एक आकर्षक विकल्प बन सकती है। IECC के फैकल्टी निदेशक और अध्ययन के सह-लेखक अमोल फड़के के मुताबिक ऐसी कीमत, भरोसेमंद आपूर्ति और लंबे समय की कीमत निश्चितता भारत के विनिर्माण क्षेत्र के लिए प्रतिस्पर्धात्मक लाभ बन सकती है। भारत के लिए इसका मतलब सिर्फ ज्यादा सौर और पवन क्षमता जोड़ना नहीं है। अब सवाल यह है कि इन स्रोतों से बनने वाली बिजली को जब जरूरत हो, तब उपलब्ध कैसे कराया जाए। बैटरी स्टोरेज इस बदलाव की एक अहम कड़ी बन सकता है। भारत ने पिछले डेढ़ दशक में सौर और पवन ऊर्जा की क्षमता तेजी से बढ़ाई है। अब अगला चरण ऐसी नवीकरणीय बिजली का है जो सिर्फ साफ नहीं हो, बल्कि भरोसेमंद भी हो। SECI की यह नीलामी बताती है कि उस दिशा में अर्थशास्त्र भी अब तेजी से बदल रहा है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें