रिपोर्ट एक और महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा करती है। प्रभावित क्षेत्रों में अब गीली सर्दियों और उसके बाद आने वाले सूखे वसंत का क्रम जंगल की आग का बड़ा कारण बनता जा रहा है। सर्दियों में अच्छी बारिश से वनस्पति तेजी से बढ़ती है, लेकिन बाद में गर्मी और सूखे में यही वनस्पति सूखकर आग के लिए ईंधन बन जाती है। जर्मनी के Helmholtz Centre for Environmental Research की जलवायु वैज्ञानिक Andreia Ribeiro कहती हैं कि जब अलग-अलग क्षेत्रों में एक साथ भीषण आग लगती है, तो देशों के लिए एक-दूसरे की मदद करना भी मुश्किल हो जाता है। क्योंकि सभी जगह अग्निशमन संसाधनों की जरूरत एक ही समय पर पड़ने लगती है। फ्रांस के National Institute for Industrial Environment and Risks के Augustin Colette के अनुसार आग से उठे धुएं ने वायु गुणवत्ता पर भी गंभीर असर डाला। कई इलाकों में PM2.5 का स्तर यूरोप में "उचित वायु गुणवत्ता" माने जाने वाले स्तर से 20 गुना तक अधिक दर्ज किया गया। आग का धुआं 400 किलोमीटर दूर तक महसूस किया गया।
Imperial College London की शोधकर्ता Dr. Clair Barnes कहती हैं कि फ्रांस और स्पेन में जो हो रहा है, वह बदकिस्मती नहीं बल्कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। उनके मुताबिक पहले गीली सर्दी, फिर बेहद सूखी गर्मी और लगातार हीटवेव ने जंगलों को सूखी लकड़ी के ढेर में बदल दिया, जबकि बढ़ते तापमान ने छोटी-सी चिंगारी को भी विशाल आग में बदलने की परिस्थितियां पैदा कर दीं। Imperial College London में जलवायु विज्ञान की प्रोफेसर Dr. Friederike Otto कहती हैं कि यूरोप की जलवायु जितनी तेजी से बदल रही है, सरकारों की तैयारियां उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ रही हैं। उनके अनुसार फॉसिल फ्यूल का लगातार इस्तेमाल ऐसे मौसम को पहले की तुलना में कहीं अधिक सामान्य बना रहा है, जिसमें छोटी आग भी बड़ी आपदा में बदल सकती है। Red Cross Red Crescent Climate Centre की कार्यक्रम निदेशक Julie Arrighi का कहना है कि जैसे-जैसे भीषण गर्मी और सूखा बढ़ेगा, वैसे-वैसे जंगल की आग रोकने, उससे बचाव और आपदा प्रतिक्रिया क्षमता में निवेश भी तेज़ करना होगा।
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सचिवालय (UN Climate Change) के कार्यकारी सचिव Simon Stiell ने कहा कि ये "मेगा-फायर" दिखाते हैं कि अत्यधिक गर्मी और सूखे परिदृश्य किस तरह जंगल की आग को राष्ट्रीय आपदा में बदल सकते हैं। उनके मुताबिक कोयला, तेल और गैस का लगातार उपयोग पृथ्वी को और गर्म कर रहा है, जिससे ऐसी आग पहले से अधिक घातक और विनाशकारी होती जा रही है। उनका कहना है कि इसका समाधान फॉसिल फ्यूल से तेजी से रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बढ़ना और लोगों को बढ़ते जलवायु जोखिमों से सुरक्षित करना है। यह अध्ययन एक बार फिर याद दिलाता है कि जंगल की आग अब सिर्फ़ जंगलों की समस्या नहीं रह गई है। यह जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, वायु प्रदूषण, आपदा प्रबंधन और लोगों की सुरक्षा से जुड़ा संकट बन चुकी है। और वैज्ञानिकों की चेतावनी साफ़ है। जब तक वैश्विक तापमान बढ़ता रहेगा, ऐसी भीषण आग की घटनाएं पहले से अधिक बार और अधिक तीव्रता के साथ सामने आती रहेंगी।

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