- पद्मश्री डॉ. टीके लहरी प्रकरण में नया मोड़ : मुख्यमंत्री के संज्ञान के बाद मंत्री पहुंचे बीएचयू, डॉ. लहरी ने कहा—कोई अप्रिय घटना नहीं हुई
- देखरेख कर रहे डॉक्टर हटाए गए, अस्पताल की सात सदस्यीय और शासन की तीन सदस्यीय जांच शुरू
डॉ. लहरी की चुप्पी से बड़ा सवाल
सवाल यह नहीं है कि आरोप सही हैं या गलत। सवाल यह है कि इतने गंभीर आरोप सामने आने की नौबत आखिर आई क्यों? और यदि कोई अप्रिय घटना हुई ही नहीं, तो फिर आरोपों, शिकायतों, अस्पताल के स्पष्टीकरण और संबंधित डॉक्टर की सफाई के बीच इतनी विसंगति क्यों दिखाई दे रही है? बीएचयू प्रशासन का कहना है कि डॉ. लहरी लंबे समय से गंभीर उम्रजनित और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं तथा उन्हें विशेष चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया है। अस्पताल के अनुसार उन्हें जनवरी से उपचार दिया जा रहा है और विभिन्न विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में उनकी जांच-देखभाल की जा रही है। दूसरी ओर, परिजनों की शिकायत के बाद सामने आए आरोपों ने अस्पताल की देखभाल व्यवस्था पर सवाल खड़े किए. इसी बीच जिस चिकित्सक डॉ. अरविंद पांडेय की देखरेख में डॉ. लहरी थे, उन्हें ड्यूटी से हटा दिया गया है। अस्पताल ने सात सदस्यीय जांच समिति भी गठित की है। यानी अब एक नहीं, बल्कि दो स्तरों पर जांच की तस्वीर सामने है।
‘थप्पड़ नहीं, बलपूर्वक रोकना था’—आरोपी डॉक्टर की सफाई
आरोपों के बीच डॉ. अरविंद पांडेय की ओर से भी सफाई सामने आई है। उनका कहना है कि डॉ. लहरी को थप्पड़ नहीं मारा गया, बल्कि सफाई की प्रक्रिया पूरी कराने के लिए उन्हें ‘फोर्सफुली रीस्ट्रेन’ किया गया। उनका दावा है कि उस समय डॉ. लहरी सफाई कर्मचारी को सहयोग नहीं कर रहे थे और स्थिति को संभालने के लिए उन्हें बलपूर्वक रोकना पड़ा। यहीं से जांच की असली जरूरत सामने आती है। यदि यह महज चिकित्सा प्रक्रिया के दौरान मरीज को नियंत्रित करने की स्थिति थी, तो क्या निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन हुआ? क्या बल प्रयोग आवश्यक और आनुपातिक था? क्या घटना की तत्काल चिकित्सकीय और प्रशासनिक रिपोर्ट बनी? और यदि आरोप थप्पड़ या दुर्व्यवहार के हैं तो क्या मेडिकल रिकॉर्ड में उसके कोई संकेत मिले? इन सवालों का जवाब जांच से ही मिल सकता है।
जिसने दो किमी पैदल चलकर मरीजों को उम्मीद दी
डॉ. टीके लहरी की पहचान किसी सामान्य चिकित्सक की नहीं रही है। कार्डियोथोरेसिक सर्जरी के क्षेत्र में उनके योगदान और मरीजों के प्रति समर्पण ने उन्हें अलग पहचान दी। सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका अस्पताल से रिश्ता समाप्त नहीं हुआ। वर्षों तक वह मरीजों की सेवा के लिए पैदल अस्पताल पहुंचते रहे। उनके जीवन की यह तस्वीर चिकित्सा पेशे में उस दौर की याद दिलाती है, जब डॉक्टर और मरीज का संबंध केवल दवा, जांच और रिपोर्ट तक सीमित नहीं था। मरीज उनके लिए एक केस नंबर नहीं था। बीमारी से जूझते व्यक्ति के साथ मानसिक संबल, भरोसा और अपनापन भी उपचार का हिस्सा था। शायद यही कारण है कि डॉ. लहरी की मौजूदा स्थिति सिर्फ एक वरिष्ठ डॉक्टर की बीमारी भर नहीं है; यह उस चिकित्सा संस्कृति की परीक्षा भी है जिसकी वह खुद मिसाल रहे हैं। जिस डॉक्टर ने जीवनभर दूसरों को बीमारी से लड़ने का हौसला दिया, आज वही स्वयं बीमारी से जूझ रहे हैं। और जब उनके साथ कथित दुर्व्यवहार की खबर सामने आती है तो स्वाभाविक रूप से समाज के भीतर बेचैनी पैदा होती है।
त्याग की आदत वाले डॉक्टर का ‘मुकरना’ भी सवाल
डॉ. लहरी ने मंत्री से किसी अप्रिय घटना से इनकार किया है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन इसी तरह सामने आए आरोपों और शिकायतों को भी केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि स्वयं डॉ. लहरी ने घटना से इनकार कर दिया। क्योंकि जिस व्यक्ति ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा संस्थान, मरीजों और चिकित्सा सेवा को दिया हो, उसके लिए अपने साथ हुई किसी कथित घटना को लेकर भी संस्थान की प्रतिष्ठा को प्राथमिकता देना असंभव नहीं। संभव है कि उन्होंने किसी व्यक्तिगत असुविधा या विवाद को महत्व न दिया हो। लेकिन यही कारण है कि उनके कथन के साथ-साथ स्वतंत्र तथ्यों की जांच भी जरूरी हो जाती है। न तो आरोप को अंतिम सत्य माना जा सकता है, न इनकार को जांच का अंत। सच दोनों के बीच मौजूद हो सकता है।
बीएचयू के सामने सिर्फ एक घटना नहीं, भरोसा बचाने की चुनौती
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बीएचयू प्रशासन ने अब जांच की प्रक्रिया शुरू की है। डॉ. अरविंद पांडेय को डॉ. लहरी की देखरेख से हटाया गया है और सात सदस्यीय समिति बनाई गई है। शासन स्तर पर भी तीन सदस्यीय समिति को जांच की जिम्मेदारी दी गई है। अब जांच को केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहना चाहिए। घटना के समय मौजूद लोगों के बयान, मेडिकल रिकॉर्ड, डॉ. लहरी की चिकित्सकीय स्थिति, वार्ड की निगरानी व्यवस्था और संबंधित कर्मचारियों की भूमिका—हर पहलू की निष्पक्ष पड़ताल जरूरी है। क्योंकि बीएचयू केवल एक अस्पताल नहीं है। यह चिकित्सा शिक्षा, शोध और सेवा की ऐसी परंपरा का नाम है जिसकी प्रतिष्ठा देशभर में है। यहां किसी मरीज की गरिमा, किसी वरिष्ठ चिकित्सक का सम्मान और संस्थान की प्रतिष्ठा—इनमें से किसी एक को दूसरे के मुकाबले छोटा नहीं माना जा सकता।
सवाल अब जांच से जवाब मांग रहे हैं
डॉ. लहरी ने कहा—कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। संबंधित डॉक्टर का कहना है—थप्पड़ नहीं मारा, सफाई के लिए बलपूर्वक रोका। बीएचयू कह रहा है कि डॉ. लहरी उम्रजनित मानसिक और शारीरिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। परिजनों ने सवाल उठाए हैं। अस्पताल ने जांच समिति बनाई है और शासन ने अलग जांच के निर्देश दिए हैं। इन तमाम दावों के बीच अब सबसे जरूरी है—न कोई पूर्वाग्रह, न कोई दबाव, न कोई जल्दबाजी। सच जो भी हो, वह सामने आना चाहिए। क्योंकि जिस डॉक्टर ने जीवनभर मरीजों को भरोसा दिया, उसके मामले में सबसे बड़ा न्याय यही होगा कि संस्थान भी उसके साथ वही भरोसा कायम रखे—इलाज में भी, जांच में भी और इंसानियत में भी।
बीएचयू का पक्ष
मारपीट के आरोप तथ्यहीन : बीएचयू के चिकित्सा अधीक्षक ने डॉ. टीके लहरी के साथ मारपीट या दुर्व्यवहार के आरोपों को तथ्यहीन बताया है। ई-मेल मिलने के बाद आईएमएस निदेशक और चिकित्सा अधीक्षक ने वार्ड पहुंचकर डॉ. लहरी का हाल जाना। विशेषज्ञों ने की जांच : 3 सितंबर को हृदय रोग, मेडिसिन, मनोचिकित्सा, वृद्धावस्था रोग, न्यूरोलॉजी, क्रिटिकल केयर तथा टीबी-छाती रोग विशेषज्ञों ने उनकी जांच की। रिपोर्ट में विभिन्न शारीरिक बीमारियों के साथ उम्रजनित सीनाइल डिमेंशिया और व्यवहार परिवर्तन की समस्या बताई गई है। 27 जनवरी से भर्ती : डॉ. लहरी 27 जनवरी 2026 से छाती संबंधी समस्या के उपचार के लिए भर्ती हैं। बीएचयू का दावा है कि चिकित्सक-कर्मचारी लगातार उनकी देखभाल कर रहे हैं और उन्हें विशेष निगरानी में रखा गया है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें