- घाट से गलियों तक कृष्णमय हुई काशी, मंदिरों में उमड़ा आस्था का सैलाब, आधी रात शंख-घंटों के बीच हुआ कान्हा का प्राकट्य
- 51 द्रव्यों से लड्डू गोपाल का महाभिषेक, हरिनाम संकीर्तन से गूंजा इस्कॉन, झांकियों में सजी ब्रज की छटा, बाल-कृष्ण बने बच्चे रहे आकर्षण का केंद्र
51 द्रव्यों से कान्हा का महाभिषेक
दुर्गाकुंड स्थित इस्कॉन मंदिर में जन्माष्टमी का उत्सव विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। यहां भगवान श्रीकृष्ण का 51 प्रकार के द्रव्यों से महाभिषेक किया गया। दूध, दही, गंगाजल, फल एवं पुष्प रस समेत विभिन्न द्रव्यों से तैयार विशेष मिश्रण से बाल गोपाल का अभिषेक हुआ। इसके साथ हरिनाम संकीर्तन और भक्ति संगीत से पूरा परिसर कृष्णमय रहा। मंदिर परिसर में फूलों और रोशनी की भव्य सजावट के बीच भगवान की बाल लीलाओं की झांकियों ने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। भक्तों की भीड़ के बीच ‘हरे कृष्ण, हरे राम’ का संकीर्तन देर तक गूंजता रहा।दुल्हन-सा सजा पुलिस लाइन मंदिर, वैदिक मंत्रों के बीच जन्मे कन्हाई
जन्माष्टमी पर पुलिस लाइन स्थित श्रीकृष्ण मंदिर दुल्हन की तरह सजाया गया। रंग-बिरंगी विद्युत झालरों, फूलों और आकर्षक सजावट से मंदिर परिसर जगमगा उठा। शाम ढलते ही यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी और भजन-कीर्तन से पूरा परिसर कृष्णमय हो गया। मध्यरात्रि का शुभ मुहूर्त आते ही पुलिस आयुक्त मोहित अग्रवाल ने परिजनों एवं पुलिस परिवार के साथ वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कराया। शंखनाद और घंटा-घड़ियाल की गूंज के बीच बाल गोपाल का पंचामृत से अभिषेक हुआ। नवीन वस्त्र और आभूषणों से सजे लड्डू गोपाल को पालने में विराजमान कराया गया। जन्म के साथ ही मंदिर परिसर ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ के जयघोष से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने आरती उतारी और माखन-मिश्री, पंजीरी तथा पंचमेवा का भोग लगाया। इसके पूर्व सूबे के स्टाम्प शुल्क पंजीयन राज्यमंत्री रविंद्र जायसवाल ने पुलिस लाइन में चल रहे रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम में कलाकारों का उत्साहवर्धन किया. पुलिस परिवारों के साथ शहर से पहुंचे श्रद्धालु भी इस अलौकिक क्षण के साक्षी बने। आधी रात में पुलिस लाइन का मंदिर ऐसा लग रहा था मानो काशी में ब्रज उतर आया हो।
विश्वनाथ धाम में कान्हा का स्वागत
श्रीकाशी विश्वनाथ धाम में भी जन्माष्टमी पर विशेष पूजन-अर्चन हुआ। घरों और मंदिरों में पंचामृत अभिषेक के बाद लड्डू गोपाल को नवीन पीताम्बर, मुकुट और आभूषणों से सजाया गया। माखन-मिश्री, पंजीरी, खीर, पंचमेवा और विभिन्न मिष्ठानों का भोग लगाया गया। काशी के लिए कृष्ण केवल पूजा के देवता नहीं, बल्कि बाल सखा, मुरलीधर, योगेश्वर और प्रेम के प्रतीक हैं। यही कारण है कि शिव की नगरी में कृष्ण जन्मोत्सव की अपनी अलग ही छटा दिखाई देती है।
बीएचयू में कृष्णोत्सव
बीएचयू के स्वतंत्रता भवन में भी जन्माष्टमी पर विशेष आयोजन हुआ। अभिषेक और संकीर्तन के बाद श्रीकृष्ण कथा, आरती और मध्यरात्रि में महाआरती हुई। छात्र-छात्राओं और श्रद्धालुओं ने भक्ति कार्यक्रमों में भाग लिया।
राधाकृष्ण मंदिर में तीन दिन तक उत्सव
गोविंदजी नायक लेन स्थित श्रीराधाकृष्ण मंदिर में जन्माष्टमी उत्सव की शुरुआत विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र पाठ से हुई। शाम को महाभिषेक और मध्यरात्रि में महाआरती के बाद अगले दिन नंदोत्सव तथा उसके बाद झूलनोत्सव, भजन संध्या और भंडारे का आयोजन रखा गया है।
बाल-कृष्ण बने बच्चे, काशी में उतरा नंदगांव
जन्माष्टमी पर सबसे मनोहारी दृश्य मंदिरों के बाहर और घरों में दिखाई दिया। माता-पिता अपने बच्चों को बाल कृष्ण के रूप में सजाकर मंदिर पहुंचे। किसी के सिर पर मोरपंख मुकुट था तो किसी के हाथ में बांसुरी। कोई पीताम्बर में था तो कोई राधा का रूप धरे दिखाई दिया। नन्हे कान्हाओं के साथ श्रद्धालुओं ने तस्वीरें खिंचवाईं। कहीं नंदगांव की झलक दिखी तो कहीं वृंदावन की गलियां जीवंत हो उठीं। बच्चों की मासूम मुस्कान और कान्हा की वेशभूषा ने पूरे उत्सव में एक अलग ही रंग भर दिया।
झांकियों में दिखीं कृष्ण की बाल लीलाएं
शहर के मोहल्लों और कॉलोनियों में सजी झांकियों में श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से लेकर गोवर्धन पूजा, कालिया मर्दन, माखन चोरी और रासलीला तक के दृश्य जीवंत किए गए। कहीं कन्हैया गोपियों के साथ नजर आए तो कहीं यशोदा मैया की गोद में बाल गोपाल की मनोहारी छवि दिखाई दी। कई स्थानों पर दही-हांडी कार्यक्रम भी हुए। ‘गोविंदा आला रे... आला रे...’ के जयघोष के बीच युवाओं की टोलियों ने मटकी फोड़ी तो वातावरण तालियों और जयकारों से गूंज उठा।
घर-घर गूंजे सोहर, मंदिरों में हरिनाम
काशी की जन्माष्टमी की खूबसूरती सिर्फ मंदिरों तक सीमित नहीं रही। घरों में भी महिलाओं ने सोहर और बधाई गीत गाए। छोटे-छोटे पालनों में लड्डू गोपाल को झुलाया गया। जन्म के बाद भगवान की आरती उतारी गई और परिवार के सदस्यों ने प्रसाद ग्रहण किया। कहीं फूलों से पालना सजा था, कहीं अशोक की पत्तियों और पारंपरिक सामग्री से झांकी तैयार की गई थी। कहीं कान्हा शिव स्वरूप में दिखाई दिए तो कहीं आधुनिक काशी की झलक लिए झांकियों ने श्रद्धालुओं का ध्यान खींचा।
गोशालाओं में भी मना नंदोत्सव
कई गोशालाओं में गायों का पूजन किया गया। उन्हें गुड़, चना और केला खिलाकर भगवान कृष्ण के गोप्रेम का संदेश दिया गया। भक्तों ने कहा कि कृष्ण जन्मोत्सव तभी पूर्ण है, जब उसमें गाय, गोपाल और प्रकृति के प्रति वही प्रेम दिखाई दे, जिसका संदेश स्वयं कान्हा ने दिया।
भक्ति में डूबी काशी, ब्रज बन गया बनारस
रात के अंतिम पहर तक काशी की धड़कन में कृष्ण नाम घुला रहा। मंदिरों में आरती, गलियों में भजन, घरों में बधाई गीत और घाटों पर आध्यात्मिक वातावरण—हर ओर एक ही अनुभूति थी। महादेव की काशी ने एक बार फिर साबित किया कि यहां आस्था की कोई सीमा नहीं। यहां शिव के भक्त कृष्ण में भी अपना आराध्य देखते हैं और कृष्ण के भक्त काशी में भी वृंदावन खोज लेते हैं। मध्यरात्रि में जैसे ही ‘जन्मे कृष्ण कन्हाई... बधाई हो बधाई’ का स्वर उठा, हजारों हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में ऊपर उठ गए। शंख बज उठे, घंटियां झंकृत हो गईं और वातावरण में एक साथ गूंजा— ‘हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की...’ उस क्षण काशी सिर्फ काशी नहीं थी— वह नंदगांव थी, वह वृंदावन थी, वह यशोदा की गोद थी और वह कृष्ण की बांसुरी पर झूमती हुई ब्रजभूमि थी।


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