यही सवाल केवल कुजटी का नहीं है। देश के कई ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों की नई और भव्य इमारतें बन चुकी हैं, लेकिन उनके भीतर पर्याप्त मानव संसाधन और जरूरी उपकरणों की कमी बनी रहती है। किसी अस्पताल का भवन मरीज का इलाज नहीं करता, वहां मौजूद स्वास्थ्यकर्मी करते हैं। जांच की मशीनें बीमारी की पहचान में मदद करती हैं और दवाइयां इलाज को आगे बढ़ाती हैं। इसलिए किसी स्वास्थ्य केंद्र का मूल्यांकन उसकी दीवारों, कमरों और रंग-रोगन से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि जरूरत पड़ने पर वहां मरीज को वास्तव में क्या मिलता है? ग्रामीण परिवारों के लिए यह कमी कई बार बहुत भारी पड़ती है। गांव में किसी व्यक्ति की तबीयत अचानक बिगड़ती है और स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र में जरूरी जांच या इलाज की सुविधा उपलब्ध नहीं होती, तो उसे ब्लॉक या जिला अस्पताल ले जाना पड़ता है। वहां भी सुविधा नहीं मिली तो निजी अस्पताल ही विकल्प बचता है। एक गरीब परिवार के लिए इसका मतलब केवल अतिरिक्त यात्रा नहीं है। वाहन का किराया, जांच का खर्च, दवाइयों का खर्च और निजी अस्पताल में इलाज की लागत मिलकर परिवार की आर्थिक स्थिति को हिला सकती है। कई परिवार इलाज के लिए उधार लेते हैं, बचत खर्च करते हैं या जरूरी जरूरतों को टालते हैं। बीमारी तब केवल स्वास्थ्य का संकट नहीं रहती, वह पूरे परिवार के लिए आर्थिक संकट बन जाती है।
स्वास्थ्य की तरह शिक्षा में भी ग्रामीण विकास की तस्वीर अक्सर भवन निर्माण के आसपास घूमती दिखाई देती है। स्कूल की नई इमारत बन गई, कमरे बढ़ गए और भवन आधुनिक दिखाई देने लगा तो उसे शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्धि मान लिया जाता है। लेकिन असली सवाल यह है कि उन कमरों में पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक हैं भी या नहीं? अगर किसी स्कूल में विषयवार शिक्षक नहीं हैं और विद्यार्थियों की संख्या के अनुपात में शिक्षक कम हैं, तो एक शिक्षक को अपने विषय के अलावा दूसरे विषय भी पढ़ाने पड़ते हैं। इसके साथ पाठ्यक्रम समय पर पूरा करने का दबाव भी रहता है। इसका सीधा असर पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ता है। विज्ञान और दूसरे व्यावहारिक विषयों की शिक्षा में प्रयोगशाला की भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन यदि आधुनिक भवन वाले स्कूल में प्रयोगशाला नहीं है या उसका उपयोग नहीं हो रहा है, तो बच्चों को विज्ञान की शिक्षा मुख्य रूप से किताबों तक सीमित रह जाती है। जिस उम्र में बच्चों को चीजों को देखकर, समझ कर और प्रयोग से सीखना चाहिए, उस उम्र में केवल पाठ याद करने पर जोर बढ़ जाता है। ऐसे में स्कूल की इमारत आधुनिक हो सकती है, लेकिन बच्चों का सीखने का अनुभव आधुनिक नहीं हो पाता है।
ग्रामीण स्कूलों में लड़कियों की जरूरतों को भी शिक्षा की गुणवत्ता का हिस्सा मानना होगा। लड़कियों के लिए साफ और सुरक्षित शौचालय, पानी, माहवारी के दौरान पैड की उपलब्धता और इस्तेमाल किए गए पैड के सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था जरूरी है। इन सुविधाओं को अतिरिक्त सुविधा मानना गलत होगा। एक किशोरी के लिए स्कूल में सम्मानजनक और सुविधाजनक वातावरण उसकी नियमित उपस्थिति और पढ़ाई जारी रखने से जुड़ा हुआ है। यदि स्कूल की इमारत सुंदर है, लेकिन ऐसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं, तो उस भवन का आधुनिक होना लड़कियों के लिए कोई मायने नहीं रखता है। ग्रामीण विकास की योजनाओं में दिखाई देने वाली चीजों को उपलब्धि में बदलना आसान है। सड़क बनी है तो उसका उद्घाटन हो सकता है, भवन बना है तो उसकी तस्वीर ली जा सकती है। लेकिन किसी डॉक्टर की नियमित उपलब्धता, किसी शिक्षक की विषयवार जिम्मेदारी, किसी जांच मशीन के सही समय पर इस्तेमाल या किसी किशोरी के लिए शौचालय और माहवारी के दौरान सुविधा की उपलब्धता को तस्वीर में दिखाना मुश्किल है। शायद यही कारण है कि भवन और निर्माण को विकास के प्रमाण के रूप में देखना आसान है, जबकि सेवाओं की गुणवत्ता पर सवाल करना अधिक जरूरी है।
इस सोच में बदलाव की जरूरत है। किसी गांव में अस्पताल बना है तो यह भी देखा जाना चाहिए कि वहां कितने डॉक्टर और नर्स तैनात हैं, वे नियमित रूप से उपलब्ध हैं या नहीं, कौन-कौन सी जांच हो सकती है और कितने मरीजों को केवल सुविधा के अभाव में दूसरे अस्पताल भेजना पड़ता है। इसी तरह स्कूल की सफलता केवल उसके भवन से नहीं, बल्कि शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात, विषयवार शिक्षकों, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, शौचालय, पानी और लड़कियों के लिए जरूरी सुविधाओं से तय होनी चाहिए। कुजटी के ग्रामीणों की आधुनिक उप स्वास्थ्य केंद्र को लेकर सीमित उम्मीद हमें इसी बड़े सवाल तक ले जाती है। ग्रामीणों को केवल आधुनिक भवन नहीं चाहिए। उन्हें ऐसी स्वास्थ्य सेवा चाहिए जो जरूरत के समय उनके काम आए। बच्चों को केवल नया स्कूल भवन नहीं चाहिए। उन्हें पर्याप्त शिक्षक, सीखने के साधन और ऐसा वातावरण चाहिए जिसमें वे अपनी पूरी क्षमता के साथ आगे बढ़ सकें। गांव का विकास तभी सार्थक होगा जब वहां रहने वाले लोगों को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए हर बार ब्लॉक, जिला मुख्यालय या शहर की ओर न देखना पड़े।
रितिका शर्मा
लूणकरणसर, राजस्थान
टीम, गाँव की आवाज़
(यह लेखिका की निजी राय है)


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