सीहोर : कलयुग में राम से बड़ा राम का नाम : कथावाचक गणेशानंद महाराज - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

सोमवार, 21 सितंबर 2026

सीहोर : कलयुग में राम से बड़ा राम का नाम : कथावाचक गणेशानंद महाराज

  • माता सीता के वरदान से रामभक्त हनुमान बने अष्टसिद्धि नवनिधि के दाता

Ram-katha-sehore
सीहोर  वर्तमान समय में कलयुग चल रहा है इस कलयुग में राम से बड़ा राम का  नाम है उक्त विचार नयापुरा ग्रामवासियों द्वारा आयोजित भगवान शिवशक्ति नंदन प्रथम पूज्य श्रीगणेश जन्मोत्सव कार्यक्रम के दौरान श्रीहनुमंत कथा के अवसर पर कथावाचक गणेशानंद महाराज ने व्यक्त किए । कथा स्थल पर समाजसेवी ठाकुर भगत सिंह तोमर पंडित सुनील शर्मा डॉ. रघुवीर सिंह दांगी ने व्यास पीठ की पूजा कर शाल श्रीफल भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त किया । कथावाचक पंडित गणेशानंद महाराज ने सोमवार को श्रीहनुमंत कथा का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि रामेश्वरम में जब भगवान श्रीराम की सेना लंका पर आक्रमण के लिए समुद्र तट पर पहुँची, तब अपार जल को पार करना सबसे बड़ी चुनौती थी। भगवान राम के निर्देश पर नल और नील के नेतृत्व में वानर सेना ने रामसेतु बनाना शुरू किया। नल और नील को ऋषि का शाप वरदान बन गया था कि उनके द्वारा जल में फेंका गया कोई भी पत्थर डूबेगा नहीं। वानर सेना पत्थर उठाती और जल में फेंकती, वे तैरने लगते। यह देखकर भगवान राम के मन में विचार आया कि यदि मेरे नाम से पत्थर तैर रहे हैं, तो क्यों ना मैं स्वयं एक पत्थर जल में डालकर देखूँ। श्री राम एकांत में गए और उन्होंने एक पत्थर उठाकर समुद्र में डाला, लेकिन वह पत्थर तुरंत डूब गया। श्रीराम आश्चर्यचकित रह गए। उसी समय पास के वृक्ष पर बैठे हनुमान जी ने यह दृश्य देख लिया। वे नीचे आए और मुस्कुराते हुए विनम्रतापूर्वक बोले, हे प्रभु आप चिंतित क्यों हैं भगवान श्रीराम ने सकुचाते हुए कहा मेरे नाम से फेंके गए पत्थर पानी में तैर रहे हैं, लेकिन जब मैंने स्वयं अपने हाथ से पत्थर डाला, तो वह डूब गया। ऐसा क्यों हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा, हे नाथ इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। आध्यात्मिक सत्य यह है कि जिसे आपका नाम पकड़ लेता है जो आपके नाम का आश्रय लेता है उसे तो यह संसार रूपी भवसागर भी तार देता है। परंतु जिसे आप स्वयं अपने हाथों से छोड़ देंगे, उसे इस ब्रह्मांड में डूबने से कौन बचा सकता है यह कथा दर्शाती है कि व्यक्ति की स्वयं की शक्ति या कर्तृत्व भाव मैं कर रहा हूँ से कार्य नहीं सिद्ध होता, बल्कि ईश्वर के नाम के प्रति पूर्ण समर्पण और श्रद्धा से असंभव भी संभव हो जाता है।


माता सीता द्वारा हनुमानजी की राम भक्ति देखकर उन्हें अनेक वरदान  प्रदान किए कथावाचक गणेशानंद महाराज ने बताया कि लंका के अशोक वाटिका में जब हनुमान जी ने माता सीता को  मुद्रिका अंगूठी दी और उनका संदेश सुनाया, तब माता सीता का दुःख दूर हो गया। हनुमान जी की निष्काम सेवा, भक्ति और विनम्रता से प्रसन्न होकर जगतजननी माता जानकीजी ने उन्हें अष्ट सिद्धि नवनिधि के दाता का अलौकिक वरदान दिया। जब हनुमान जी ने माता सीता के दर्शन किए और राम-कथा सुनाई, तो माता सीता ने अत्यंत स्नेह से उनके मस्तक प वरदान दिएl माता सीता ने कहा, हे तात तुम अजर अमर रहोगे। जब तक संसार में राम-कथा रहेगी, तुम्हारा शरीर और यश अक्षुण्ण रहेगा। सीता जी ने हनुमान जी को केवल सिद्धियों का स्वामी ही नहीं बनाया, बल्कि यह अधिकार दिया कि वे जिसे चाहें उसे अष्ट सिद्धियाँ अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और नव निधियाँ पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नीलोत्पल, खर्व प्रदान कर सकते हैं।  हनुमान जी ने माता सीता से कहा कि मुझे संसार के किसी वैभव या सिद्धि की लालसा नहीं है, मुझे केवल श्रीराम के चरणों का प्रेम चाहिए। तब सीता जी ने वरदान दिया  तुम पर श्रीराम सदैव कृपालु रहेंगे l आध्यात्मिक दृष्टि से, सिद्धियाँ और निधियाँ व्यक्ति में अहंकार पैदा कर सकती हैं। परंतु हनुमान जी ने इन्हें अपने लिए नहीं, बल्कि प्रभु कार्य और भक्तों के कल्याण के लिए धारण किया। माता सीता का यह वरदान दर्शाता है कि जब कोई साधक अपना सब कुछ ईश्वर को समर्पित कर देता है, तो ईश्वर की पराशक्ति माता सीता उसे ब्रह्मांड की समस्त शक्तियाँ अष्टसिद्धि नवनिधि सौंप देती है, फिर भी साधक का अंतिम लक्ष्य केवल प्रभु-प्रेम ही रहता है।

कोई टिप्पणी नहीं: