तत्कालीन विदेश मंत्री एमसी छागला की ओर से संसद में दिए गए बयान के मुताबिक, इसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और भारत सरकार के खिलाफ ‘अपमानजनक और आपत्तिजनक टिप्पणियां’ की गई थीं। ऐसे में 'अजय वियतनाम' के मंचन के दौरान चीनी राजनयिकों की मौजूदगी का महत्व थिएटर में बिताई गई एक शाम से कहीं ज्यादा था, खासकर इसलिए भी क्योंकि यह घटनाक्रम ठीक उसी समय हुआ था, जब नक्सलबाड़ी में किसानों का विद्रोह आकार ले रहा था। बस्तर के उथल-पुथल भरे अतीत पर लिखी गई एक नयी किताब उस घटनाक्रम और भारत में नक्सलवादी आंदोलन के उभार में चीन की भूमिका से जुड़े सवाल फिर से उठाती है। वरिष्ठ पत्रकार शांतनु नंदन शर्मा की लिखी 'रिबेल बस्तर : हिस्ट्री, माओइज्म एंड द सर्च फॉर आनसर्स इन इंडियाज हार्टलैंड' माओवादी विद्रोह से आगे बढ़कर बस्तर के आदिवासी प्रतिरोध, प्रशासनिक विफलता और संसाधनों के दोहन के लंबे इतिहास की पड़ताल करती है। शर्मा का तर्क है कि बस्तर में माओवाद ‘‘कोई अपवाद नहीं, बल्कि सत्ता के खिलाफ सदियों से चले आ रहे प्रतिरोध का ही एक नया अध्याय था।’’ हैचेट इंडिया ने यह किताब जुलाई में प्रकाशित की थी। किताब का एक अध्याय 1967 के नक्सलबाड़ी पर प्रकाश डालता है और इस बात की पड़ताल करता है कि भारत के पहले बड़े नक्सली विद्रोह में चीन की कितनी भूमिका थी और उस समय खुद भारतीय अधिकारियों को क्या शक था।
संसद में विपक्ष के सदस्यों ने यह जानना चाहा कि क्या नक्सलबाड़ी हिंसा से कुछ समय पहले चीनी दूतावास के अधिकारी कलकत्ता (अब कोलकाता) पहुंचे थे और क्या उनकी मौजूदगी का उस विद्रोह से कोई संबंध था। सरकार से भारत और चीन की ओर से एक-दूसरे के राजनयिकों पर लगाई गई अलग-अलग तरह की पाबंदियों के बारे में भी सवाल किए गए थे। विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाया था कि जहां चीन में भारतीय राजनयिकों की आवाजाही सिर्फ बीजिंग शहर की सीमाओं तक सीमित कर दी गई थी, वहीं चीनी राजनयिकों को पूरे भारत में कहीं भी आने-जाने की छूट क्यों दी गई थी। छागला का जवाब बहुत नपा-तुला था। उन्होंने कहा कि सरकार ने छानबीन की है और पाया है कि चीनी अधिकारी कलकत्ता (अब कोलकाता) तो गए थे, लेकिन नक्सलबाड़ी नहीं। जब छागला से पूछा गया कि चीनी अधिकारियों ने कलकत्ता में क्या किया, तो उन्होंने ‘अजय वियतनाम’ के मंचन से जुड़े कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी की ओर इशारा किया। यह पूछे जाने पर कि क्या चीनी अधिकारियों की मौजूदगी का अशांति से कोई संबंध था, छागला ने कहा कि हो सकता है उन्होंने ‘कलकत्ता से मदद और सहारा दिया हो’, लेकिन वे निश्चित रूप से नक्सलबाड़ी नहीं गए थे।
संसदीय रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि चीनी राजनयिकों ने विद्रोह को निर्देशित या आयोजित किया था। लेकिन इससे यह जरूर पता चलता है कि भारत सरकार चीन की राजनयिक गतिविधियों को लेकर चिंतित थी। बीजिंग की भूमिका को लेकर शक ने पांच जुलाई 1967 को एक स्पष्ट वैचारिक रूप ले लिया, जब चीन के 'पीपुल्स डेली' ने एक भड़काऊ संपादकीय छापा, जिसमें नक्सलबाड़ी विद्रोह की तारीफ की गई और भारत के लिए माओ के क्रांतिकारी रास्ते को अपनाने की सलाह दी गई। संपादकीय में भारतीय विद्रोहियों से कहा गया कि वे किसानों पर भरोसा करें, ग्रामीण इलाकों में अपने ठिकाने बनाएं, लंबे समय तक सशस्त्र संघर्ष करें और गांवों का इस्तेमाल करके शहरों को चारों तरफ से घेरकर उन पर कब्जा करें - यही वह रणनीति थी, जिसके आधार पर माओ ने चीन में क्रांति की थी। सरकारी बयान में चीन की सीधी भागीदारी को विद्रोह के बाद का बताया गया, जिसका आधार लगभग एक महीने बाद हुआ रेडियो बीजिंग का प्रसारण था। लेकिन हिंसा से कुछ ही दिन पहले कलकत्ता में चीनी राजनयिकों की मौजूदगी ने स्थिति को उलझा दिया, जिससे यह सवाल बना रहा कि वे राजनयिक असल में वहां क्या कर रहे थे।
शर्मा की किताब कागजी सबूतों की और गहराई में जाती है। इसमें वह विदेश मंत्रालय की फाइलों, सरकारी रिकॉर्ड और संसदीय दस्तावेजों के आधार पर बताते हैं कि कैसे भारतीय अधिकारियों ने बीजिंग के साथ तनाव बढ़ाए बिना, नक्सली गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए चीन को दोषी ठहराने के तरीके पर विचार-विमर्श किया। किताब के मुताबिक, लोकसभा में जवाब देने के लिए तैयार किया गया एक मसौदा असामान्य रूप से कड़े शब्दों वाला था। इसमें चीन की सूचना, प्रेस और प्रचार एजेंसियों (जिनमें नेपाल स्थित चीनी दूतावास भी शामिल था) पर आरोप लगाया गया था कि वे नक्सलबाड़ी और उसके आसपास सक्रिय भारतीयों की ‘देश-विरोधी और देशद्रोही गतिविधियों’ को खुलेआम बढ़ावा दे रही थीं। हालांकि, इंदिरा गांधी की ओर से दिए गए आखिरी लिखित जवाब में इस वाक्य का जिक्र नहीं था; उस समय इंदिरा के पास विदेश मंत्रालय का कामकाज भी था, क्योंकि सितंबर 1967 में उन्होंने छागला की जगह ली थी। किताब के अनुसार, मसौदे के एक और हिस्से में चीनी राजनयिकों के व्यवहार की कड़ी आलोचना की गई थी और नेपाल में चीनी मिशन के बारे में कहा गया था कि उसने ‘खुले तौर पर और बार-बार राजनयिक शिष्टाचार के हर नियम का उल्लंघन किया है’। उस हिस्से को भी हटा दिया गया। शर्मा का कहना है कि ये बदलाव भारतीय अधिकारियों के सामने मौजूद दुविधा की झलक देते हैं। उन्हें चीन के दखल की चिंता तो थी, लेकिन वे बीजिंग के साथ तनाव बढ़ाने से भी बच रहे थे, खासकर 1962 के युद्ध के बाद।

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