दिल्ली : क्या दलबदल का ‘संवैधानिक पाप’ करने के आरोपी को पार्टी का चुनाव चिह्न दिया जा सकता है - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

दिल्ली : क्या दलबदल का ‘संवैधानिक पाप’ करने के आरोपी को पार्टी का चुनाव चिह्न दिया जा सकता है

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नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को मौखिक रूप से सवाल किया कि क्या ‘‘चुनाव चिह्न’ की भावना उन लोगों के लिए काम करती है, जिन्होंने दलबदल का ‘संवैधानिक पाप’ किया है। न्यायालय ने इस बारे में दलीलें सुनीं कि क्या निर्वाचन आयोग का शिवसेना के शिंदे गुट को चुनाव चिह्न आवंटित करने के लिए मुख्य रूप से विधायी संख्या पर भरोसा करना सही था। यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने शिवसेना में फूट से उठी कई याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को असली पार्टी मानने और उसे धनुष-बाण चुनाव चिह्न देने के निर्वाचन आयोग के फैसले को चुनौती देना भी शामिल था। पीठ शिंदे खेमे की ओर से पेश वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल की दलीलें सुन रही थी। कौल ने उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों का हवाला देते हुए विधायी बहुमत के परीक्षण पर भरोसा करने के निर्वाचन आयोग के रुख का बचाव किया और कहा कि चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश के तहत कौन सा गुट राजनीतिक दल का गठन करता है, यह निर्धारित करने में यह परीक्षण कानूनी रूप से वैध और प्रासंगिक बना हुआ है। न्यायमूर्ति बागची ने सवाल किया कि पार्टी का चुनाव चिह्न ऐसे हालात में कैसे काम करेगा, जब अयोग्यता की कार्रवाई का सामना कर रहे सदस्य बाद में अपनी सदस्यता खो देते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘स्वतंत्रता राजनीतिक दल के पास रहती है और इसमें कहा गया है कि अगर अयोग्य सदस्य चले जाते हैं, तो बचे हुए सदस्यों को एक अलग चिह्न मिलता है। अभी, आप सादिक अली (फैसला) पढ़ने वाले थे।’’ न्यायमूर्ति बागची ने पूछा, ‘‘क्या चुनाव चिह्न की भावना उन लोगों के लिए काम करेगी, जिन्होंने संवैधानिक पाप किया है, या यह उन लोगों के लिए काम करेगी जिन्होंने संवैधानिक पाप की शिकायत की है?” 


कौल ने कहा कि चुनाव चिह्न उस खेमे को मिलना चाहिए जो यह साबित करे कि वही असली राजनीतिक दल है। उन्होंने कहा कि अगर कोई भी समूह यह दावा साबित नहीं कर पाता, तो एक अलग सवाल उठेगा। सुनवाई बुधवार को जारी रहेगी। इससे पहले, पीठ ने पूछा था कि क्या निर्वाचन आयोग ने दोनों समूहों को धनुष-बाण का आरक्षित चुनाव चिह्न देने से मना करने और उनके अलग-अलग चुनाव चिह्नों पर चुनाव लड़ने की संभावना पर ठीक से विचार किया है। उसने यह भी सवाल उठाया था कि क्या विधायी संख्या को ‘सुरक्षित परीक्षण’ माना जा सकता है, जब उन्हीं विधायकों के खिलाफ अयोग्यता कार्यवाही लंबित हे, जिनकी संख्या उस बहुमत का आधार बनी थी। कौल ने कहा है कि शिंदे का समर्थन करने वाले 40 विधायक, 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सीट जीतने वाले 55 शिवसेना विधायकों के पक्ष में डाले गए मतों की 76 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते थे। उन्होंने लोकसभा के आंकड़ों का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि शिंदे का समर्थन करने वाले 13 सांसदों के पक्ष में डाला गया मत प्रतिशत अविभाजित पार्टी के निर्वाचित 18 सांसदों के पक्ष में डाले गये मतों का 73 प्रतिशत है। शिवसेना के उद्धव ठाकरे-नीत गुट के सुनील प्रभु द्वारा दायर मुख्य याचिका में, महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के 10 जनवरी, 2024 के फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य ठहराने से इनकार कर दिया गया था। उद्धव ठाकरे द्वारा दायर एक संबंधित याचिका में निर्वाचन आयोग के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें शिंदे गुट को आधिकारिक शिवसेना के रूप में मान्यता दी गई थी और उसे पार्टी का चुनाव चिह्न आवंटित किया गया था।

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