नवरात्र विशेष : जागृत करें अंतःकरण में छिपी दैवी शक्ति… - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 11 अक्टूबर 2026

नवरात्र विशेष : जागृत करें अंतःकरण में छिपी दैवी शक्ति…

मां दुर्गा के नौ स्वरूपों से हमें शक्ति, विद्या, साहस, संयम, सिद्धि, ज्ञान और स्थिरता की सीख मिलती है. इस मौके पर हर भक्त के जीवन में शक्ति और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है. वैसे भी शिव की कार्यशक्ति से जन्मी मां दुर्गा का मानव जीवन में खासा महत्व है। मतलब साफ है नवरात्र केवल उपवास, आरती या देवी गीतों का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशक्ति को जागृत करने का आमंत्रण है। यह स्मरण कराता है कि जिस दिव्यता की हम पूजा करते हैं, वह बाहर नहीं, हमारे भीतर ही सुप्त है। रात्रि की निस्तब्धता में किया गया मंत्रजाप, साधक को उसी आंतरिक देवी तक पहुंचाता है। इसलिए इन नौ रात्रियों का वास्तविक महत्व केवल अनुष्ठानों में नहीं, उस साधना में है जो मन को स्थिर करती है, ज्ञान को प्रकाशित करती है और आत्मा को अद्वितीय बल प्रदान करती है। नवरात्र की हर रात हमें पुकारती है, अपने भीतर की देवी को जागृत करो, क्योंकि वही शक्ति मानव को भय, मोह और अज्ञान के अंधकार से मुक्त कर सकती है। यही नवरात्र का शाश्वत संदेश है . नवरात्र केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक शुद्धि की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। यह ऋतु परिवर्तन का प्राकृतिक संतुलन है, आत्मशक्ति का जागरण है और ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं से संवाद का अवसर है। इन नौ रातों में साधक यदि संकल्प और श्रद्धा के साथ साधना करें, तो जीवन की तीनों परतोंकृशरीर, मन और आत्माकृमें नई ऊर्जा का संचार निश्चित है


Shardiya-navratra
भारतीय संस्कृति में नवरात्र केवल पूजा-पाठ, उपवास और देवी गीतों का पर्व नहीं, बल्कि अंतःकरण में सुप्त दैवी शक्ति को जागृत करने का आध्यात्मिक आमंत्रण है। ये नौ रातें मनुष्य को स्वयं से साक्षात्कार करने, अपनी दुर्बलताओं को पहचानने और आत्मबल को नई दिशा देने का अवसर प्रदान करती हैं। मां दुर्गा के नौ स्वरूप जीवन के उन्हीं गुणों का प्रतीक हैं, जिनके बिना व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास संभव नहीं—स्थिरता, तप, साहस, सृजन, ममता, विवेक, निर्भयता, पवित्रता और सिद्धि। नवरात्र का मूल संदेश स्पष्ट है—जिस शक्ति की तलाश में मनुष्य मंदिरों और तीर्थों तक पहुंचता है, उसका एक अंश उसके अपने अंतःकरण में भी विद्यमान है। आवश्यकता केवल उसे पहचानने, परिष्कृत करने और सद्कर्मों में लगाने की है। दीपक की लौ तभी सार्थक है, जब वह बाहर के साथ भीतर के अंधकार को भी दूर करने की प्रेरणा दे। देवी की आराधना भी तभी पूर्ण होती है, जब उसका प्रकाश मनुष्य के विचार, व्यवहार और कर्म में दिखाई देने लगे।


शिव की चेतना, शक्ति का स्पंदन

भारत की आध्यात्मिक परंपरा का एक अनूठा पक्ष यह है कि यहां परमसत्ता को केवल पुरुष स्वरूप में नहीं, बल्कि मातृशक्ति के रूप में भी प्रतिष्ठित किया गया। शक्ति की उपासना भारतीय दर्शन में प्रकृति, सृजन, संरक्षण और परिवर्तन की व्यापक अवधारणा से जुड़ी है। यहां शिव और शक्ति को एक-दूसरे से पृथक नहीं, बल्कि परस्पर पूरक माना गया है। शिव चेतना के प्रतीक हैं तो शक्ति उस चेतना की क्रियाशील अभिव्यक्ति। शैव और शाक्त परंपराओं में यह भाव अलग-अलग रूपों में व्यक्त हुआ है कि चेतना और उसकी कार्यक्षमता के समन्वय के बिना सृष्टि की कल्पना अधूरी है। इसी दर्शन का जीवंत प्रतीक हैं मां दुर्गा। वे केवल दुष्ट शक्तियों का संहार करने वाली देवी नहीं, बल्कि जीवन को गति देने वाली ऊर्जा, ज्ञान को प्रकाशित करने वाली चेतना और अन्याय के सामने अडिग रहने वाले साहस की प्रतीक भी हैं। नवरात्र इसी शिव-शक्ति के अद्वैत भाव को आत्मसात करने का पर्व है। यह बताता है कि शक्ति का अर्थ केवल बाहुबल या विजय नहीं, बल्कि विवेक, धैर्य, करुणा और आत्मसंयम का संतुलन भी है। वास्तविक सामर्थ्य वह है, जो मनुष्य को अहंकार से बचाए, अन्याय के विरुद्ध खड़ा करे और दूसरों के कल्याण के लिए प्रेरित करे।


नौ स्वरूप, जीवन के नौ संदेश

देवी के नौ स्वरूपों की आराधना भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में विशेष महत्व रखती है। शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक की यह यात्रा साधक को जीवन के विभिन्न गुणों का स्मरण कराती है। प्रत्येक स्वरूप अपने भीतर एक संदेश समेटे हुए है। मां शैलपुत्री पर्वत जैसी स्थिरता और दृढ़ संकल्प की प्रतीक हैं। जीवन में परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, अपने मूल्यों और लक्ष्य पर अडिग रहना ही सफलता की पहली शर्त है। मां ब्रह्मचारिणी तप, त्याग और आत्मसंयम की प्रेरणा देती हैं। उनका स्वरूप बताता है कि बड़ी उपलब्धियों के लिए धैर्य, अनुशासन और निरंतर साधना आवश्यक है। इच्छाओं का विवेकपूर्ण नियमन ही मनुष्य को अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र बनाता है। मां चंद्रघंटा साहस, सजगता और अन्याय के प्रतिरोध का प्रतीक हैं। वे सिखाती हैं कि शांति का अर्थ कायरता नहीं और विनम्रता का अर्थ दुर्बलता नहीं। आवश्यकता पड़ने पर सत्य और न्याय की रक्षा के लिए निर्भीक होना भी धर्म है। मां कूष्मांडा सृजन और जीवन की ऊर्जा का प्रतीक हैं। उनका स्वरूप मनुष्य को निराशा के बीच भी संभावनाएं तलाशने, सकारात्मकता बनाए रखने और अपनी सामर्थ्य से नए मार्ग बनाने की प्रेरणा देता है। मां स्कंदमाता ममता, वात्सल्य और संरक्षण की प्रतीक हैं। उनकी आराधना हमें स्मरण कराती है कि शक्ति का सबसे सुंदर रूप वह है, जो दूसरों को संबल दे, कमजोरों की रक्षा करे और जीवन में करुणा का विस्तार करे। मां कात्यायनी संकल्प, साहस और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा देती हैं। उनका स्वरूप बताता है कि जीवन में कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं, जब मौन रहने के बजाय सत्य के पक्ष में खड़ा होना आवश्यक हो जाता है। मां कालरात्रि भय और अज्ञान के अंधकार से मुक्ति का संदेश देती हैं। उनका स्वरूप स्मरण कराता है कि भय से भागने के बजाय उसका सामना करना चाहिए। कई बार मनुष्य की सबसे बड़ी विजय बाहरी परिस्थितियों पर नहीं, अपने भीतर बैठे भय पर होती है। मां महागौरी पवित्रता, शांति और आत्मपरिष्कार की प्रतीक हैं। उनका संदेश है कि मन की निर्मलता, विचारों की शुद्धता और व्यवहार की सहजता से ही जीवन में वास्तविक संतुलन स्थापित होता है। मां सिद्धिदात्री साधना की पूर्णता, विवेक और सिद्धि का प्रतीक हैं। उनका स्वरूप बताता है कि ज्ञान और सामर्थ्य का सर्वोच्च उद्देश्य अहंकार का विस्तार नहीं, बल्कि आत्मबोध और लोककल्याण होना चाहिए। इस प्रकार नवदुर्गा की उपासना केवल नौ देवियों के दर्शन तक सीमित नहीं रहती। यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने और यह प्रश्न करने का अवसर देती है कि उसके जीवन में स्थिरता कितनी है, संयम कितना है, साहस कितना है और ज्ञान के प्रति उसकी साधना कितनी गहरी है।


महिषासुर का संहार और अंतर्मन की विजय

मार्कण्डेय पुराण में वर्णित देवी माहात्म्य के अनुसार, जब महिषासुर के अत्याचार से देवता व्याकुल हो उठे, तब देवताओं के तेज से आदिशक्ति का प्राकट्य हुआ। देवी ने महिषासुर का संहार कर दैवी व्यवस्था की पुनर्स्थापना की। यही कथा नवरात्र की आध्यात्मिक चेतना का प्रमुख आधार है। इस पौराणिक प्रसंग को केवल देवासुर संग्राम के रूप में देखना पर्याप्त नहीं। इसके भीतर मनुष्य के अंतर्द्वंद्व का भी गहरा संकेत छिपा है। महिषासुर को अहंकार, असीमित महत्वाकांक्षा और अनियंत्रित प्रवृत्तियों के प्रतीक के रूप में भी समझा जा सकता है। जब मनुष्य के भीतर लोभ, क्रोध, मोह और अहंकार का प्रभाव बढ़ता है, तब उसका विवेक कमजोर पड़ने लगता है। ऐसी स्थिति में आत्मसंयम और विवेक ही वे शक्तियां हैं, जो उसे पतन से बचाती हैं। आज का समाज भी अनेक प्रकार की चुनौतियों से गुजर रहा है। उपभोक्तावाद, प्रतिस्पर्धा, असहिष्णुता और तात्कालिक सफलता की आकांक्षा के बीच मनुष्य का मानसिक संतुलन प्रभावित होता है। ऐसे समय में नवरात्र का संदेश और प्रासंगिक हो उठता है। देवी की आराधना हमें अपने भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों को पहचानने और उन्हें सद्गुणों से पराजित करने की प्रेरणा देती है। प्रश्न यह नहीं कि हम कितनी बार मंदिर गए, कितने दीप जलाए या कितने अनुष्ठान किए। बड़ा प्रश्न यह है कि हमारी उपासना ने हमें कितना धैर्यवान बनाया, हमारे व्यवहार में कितनी करुणा आई और हमने अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का कितना साहस अर्जित किया। यदि आराधना के बाद भी हमारे भीतर अहंकार, द्वेष और असंवेदनशीलता बनी रहती है, तो साधना के वास्तविक उद्देश्य पर विचार करना आवश्यक है।


नवरात्र की नौ रातों का आध्यात्मिक रहस्य

'नवरात्र' शब्द का शाब्दिक अर्थ है—नौ रातें। भारतीय परंपरा में रात्रि को केवल दिन के अवसान के रूप में नहीं, बल्कि विश्राम, मौन, अंतर्मुखता और आत्मचिंतन के अवसर के रूप में भी देखा गया है। जब बाहरी गतिविधियां कम होती हैं, तब व्यक्ति को अपने विचारों, भावनाओं और अंतर्द्वंद्वों को समझने का अवसर मिलता है। इसीलिए नवरात्र की रातों में जप, ध्यान, मंत्रोच्चार और साधना की विशेष परंपरा रही है। मंदिरों में बजती घंटियां, शंखध्वनि, दीपों का प्रकाश और मंत्रों की लय वातावरण में एकाग्रता तथा भक्ति का भाव उत्पन्न करते हैं। साधक इन माध्यमों से अपने चंचल मन को स्थिर करने का प्रयास करता है। भारतीय आध्यात्मिक चिंतन में रात्रि का संबंध अंतर्मुखी साधना से भी जोड़ा गया है। दीपावली, महाशिवरात्रि और नवरात्र जैसे पर्व इस परंपरा के विविध रूप प्रस्तुत करते हैं। हालांकि इन पर्वों के धार्मिक और सांस्कृतिक कारण अलग-अलग हैं, लेकिन इनके भीतर आत्मचिंतन, अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने और चेतना को परिष्कृत करने का साझा भाव दिखाई देता है। नवरात्र की प्रत्येक रात साधक के लिए एक प्रश्न लेकर आती है—क्या हम अपने मन को इतना शांत कर सकते हैं कि अपने भीतर उठने वाली आवाज को सुन सकें? क्या हम कुछ समय बाहरी शोर से दूर रहकर अपने जीवन की दिशा पर विचार कर सकते हैं? संभवतः इसी आत्मसंवाद में साधना का एक महत्वपूर्ण पक्ष छिपा है।


त्रिगुण का दर्शन : तमस से सत्व की ओर

भारतीय दर्शन में प्रकृति के तीन गुण बताए गए हैं—तमस, रजस और सत्व। सांख्य दर्शन के अनुसार, ये तीनों गुण प्रकृति की मूल प्रवृत्तियों को व्यक्त करते हैं। तमस जड़ता, आलस्य और अज्ञान से जुड़ा है; रजस सक्रियता, आकांक्षा और कर्मप्रवृत्ति का द्योतक है; जबकि सत्व स्पष्टता, संतुलन, विवेक और ज्ञान की ओर उन्मुख करता है। नवरात्र की साधना को इन तीनों गुणों के संदर्भ में समझना एक रोचक आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करता है। देवी के महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती स्वरूप क्रमशः शक्ति, समृद्धि और ज्ञान के व्यापक भावों को अभिव्यक्त करते हैं। अलग-अलग शाक्त परंपराओं में इनके स्वरूपों और गुणों की व्याख्या में विविधता मिलती है, लेकिन तीनों के माध्यम से जीवन की पूर्णता का विचार स्पष्ट होता है। मनुष्य के जीवन में तमस का अर्थ केवल अंधकार नहीं, बल्कि वह जड़ता भी है, जो उसे प्रयास करने से रोकती है। रजस उसे कर्म के लिए प्रेरित करता है, लेकिन विवेक के अभाव में यही सक्रियता लालच, बेचैनी और अहंकार का कारण बन सकती है। सत्व मनुष्य को अपनी ऊर्जा का संतुलित उपयोग करना सिखाता है। इस दृष्टि से नवरात्र आत्मविकास की एक यात्रा है—पहले अपनी दुर्बलताओं को पहचानना, फिर उन्हें दूर करने के लिए सक्रिय होना और अंततः विवेकपूर्ण जीवन की ओर बढ़ना। साधना का उद्देश्य केवल शक्ति अर्जित करना नहीं, बल्कि उस शक्ति का उचित उपयोग करना भी है। सामर्थ्य के साथ विनम्रता, सफलता के साथ संवेदनशीलता और ज्ञान के साथ विवेक जुड़ जाए, तभी व्यक्तित्व में संतुलन आता है। यही त्रिगुण दर्शन का व्यावहारिक संदेश है।


आदिशक्ति : सृष्टि के प्रत्येक स्पंदन में

भारतीय धर्मग्रंथों में आदिशक्ति को सृष्टि की मूल ऊर्जा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। देवी को कहीं महाकाली, कहीं महालक्ष्मी और कहीं महासरस्वती के रूप में स्मरण किया जाता है। ये स्वरूप संहार और परिवर्तन, समृद्धि और संरक्षण तथा ज्ञान और सृजन की व्यापक अवधारणाओं को सामने रखते हैं। देवी माहात्म्य में शक्ति के विविध रूपों का वर्णन मिलता है। कहीं वे दुष्ट शक्तियों का विनाश करती हैं, कहीं भक्तों की रक्षा करती हैं और कहीं ज्ञान तथा कल्याण की अधिष्ठात्री के रूप में प्रतिष्ठित होती हैं। इन कथाओं का सांस्कृतिक महत्व इस बात में भी निहित है कि भारतीय परंपरा ने स्त्री को केवल पारिवारिक भूमिका तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सृजन, सामर्थ्य, ज्ञान और नेतृत्व की दिव्य अभिव्यक्ति के रूप में भी स्वीकार किया। शक्ति की यह अवधारणा आज के सामाजिक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। स्त्री का सम्मान, उसकी शिक्षा, सुरक्षा, स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता को स्वीकार करना भी उस व्यापक भावभूमि से जुड़ता है, जिसमें नारी को शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। यदि हम मां दुर्गा के सामने शीश झुकाते हैं, तो समाज में स्त्रियों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता भी हमारे आचरण का हिस्सा होना चाहिए। देवी की आराधना का यह सामाजिक पक्ष नवरात्र को केवल व्यक्तिगत आस्था का पर्व नहीं रहने देता, बल्कि उसे मानवीय गरिमा और समानता की प्रेरणा से भी जोड़ता है।


ऋतु परिवर्तन, उपवास और आत्मानुशासन

शारदीय नवरात्र का समय वर्षा ऋतु के बाद मौसम में बदलाव का भी समय होता है। तापमान, आर्द्रता और दैनिक दिनचर्या में होने वाले परिवर्तन शरीर की अनुभूतियों और खानपान की आदतों को प्रभावित कर सकते हैं। भारतीय परंपरा में ऐसे अवसरों पर संयमित भोजन, सात्त्विक आहार और नियमित दिनचर्या को महत्व दिया गया है। उपवास भी इसी व्यापक परंपरा का हिस्सा है। धार्मिक दृष्टि से यह श्रद्धा, संकल्प और आत्मनियंत्रण का प्रतीक है। कुछ लोगों के लिए यह भोजन की आदतों पर ध्यान देने और अनावश्यक खानपान से दूरी बनाने का अवसर भी हो सकता है। हालांकि उपवास के स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव व्यक्ति की आयु, शारीरिक स्थिति और खानपान पर निर्भर करते हैं। इसलिए इसे हर व्यक्ति के लिए समान रूप से लाभकारी या किसी रोग का उपचार मानना उचित नहीं होगा। वास्तविक अनुशासन केवल भोजन छोड़ने में नहीं, बल्कि अपनी आदतों को संतुलित करने में है। यदि कोई व्यक्ति उपवास के दौरान क्रोध, कटुता और दूसरों के प्रति दुर्भावना से दूरी बनाता है, तो उसका व्रत व्यापक अर्थ प्राप्त करता है। इसी प्रकार पर्याप्त जल, पौष्टिक भोजन और अपनी शारीरिक आवश्यकताओं का ध्यान रखना भी आवश्यक है। विशेष रूप से किसी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को कठोर उपवास करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। नवरात्र इस प्रकार शरीर और मन दोनों के प्रति सजग होने का अवसर बन सकता है। नियमित दिनचर्या, प्रार्थना, ध्यान, संयमित खानपान और सकारात्मक आचरण के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर सकता है।


भक्ति का केंद्र मंदिर नहीं, श्रद्धा है

नवरात्र के दिनों में देशभर के शक्तिपीठों और देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। कहीं घंटों की प्रतीक्षा के बाद दर्शन होते हैं, तो कहीं भक्त लंबी यात्रा करके मां के दरबार तक पहुंचते हैं। जो लोग दूरस्थ तीर्थों तक नहीं पहुंच पाते, वे अपने निकटवर्ती मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं अथवा घर में ही कलश स्थापना और देवी उपासना के माध्यम से पर्व मनाते हैं। भारतीय संस्कृति की व्यापकता इसी में है कि भक्ति को किसी एक स्थान या विधि तक सीमित नहीं माना गया। मंदिर सामूहिक आस्था के केंद्र हैं, लेकिन श्रद्धा का वास्तविक आधार मनुष्य का अंतःकरण है। पूजा की विधियां अलग हो सकती हैं, पर करुणा, सत्य, संयम और परोपकार जैसे मूल्यों का महत्व सभी के लिए बना रहता है। नवरात्र का अर्थ यह भी है कि धर्म को केवल अनुष्ठानों तक सीमित न रखा जाए। यदि मंदिर में मां के सामने दीप जलाने वाला व्यक्ति बाहर निकलकर किसी जरूरतमंद की सहायता करता है, किसी दुखी को सांत्वना देता है अथवा किसी अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाता है, तो उसकी भक्ति व्यवहार में भी प्रकट होती है। देवी के प्रति समर्पण तभी व्यापक अर्थ ग्रहण करता है, जब वह जीवन के प्रति हमारी जिम्मेदारी को बढ़ाए। आस्था मनुष्य को जोड़ने, संवेदनशील बनाने और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध कराने वाली शक्ति बने, यही उसकी सार्थकता है।


जागरण का वास्तविक अर्थ

नवरात्र का शाश्वत संदेश है—अपने भीतर की शक्ति को पहचानो, अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करो और अपने सामर्थ्य को लोककल्याण में लगाओ। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा हो, एक दीपक उसे चुनौती देने के लिए पर्याप्त है। इसी प्रकार जीवन की कठिनाइयों के बीच विवेक, साहस और धैर्य की छोटी-सी लौ भी नई राह दिखा सकती है। मां दुर्गा की आराधना हमें शक्ति देती है, लेकिन उस शक्ति की सार्थकता हमारे कर्मों से तय होती है। ज्ञान हमें दिशा देता है, लेकिन उसका मूल्य तभी है, जब वह विवेकपूर्ण निर्णयों में दिखाई दे। संयम हमें स्थिरता देता है, लेकिन उसकी पूर्णता तभी है, जब हम दूसरों के अधिकारों और भावनाओं का सम्मान करना सीखें। आज आवश्यकता केवल बाहरी उत्सव की नहीं, बल्कि भीतर के जागरण की भी है। अपने क्रोध पर नियंत्रण, अपने अहंकार का परिष्कार, अपने विचारों की शुद्धि और अपने व्यवहार में करुणा का विस्तार—यही वे साधन हैं, जिनसे मनुष्य अपने अंतःकरण को प्रकाशित कर सकता है। नवरात्र की नौ रातें इसी आत्मयात्रा का आमंत्रण हैं। शैलपुत्री की स्थिरता से आरंभ होकर सिद्धिदात्री के आत्मबोध तक पहुंचने वाली यह यात्रा हमें सिखाती है कि जीवन की सबसे बड़ी विजय स्वयं को बेहतर बनाने में है। देवी को बाहर पूजना आस्था है, उनके गुणो को अपने भीतर उतारना साधना है और उन गुणों को समाज के कल्याण में लगाना ही उस साधना की सार्थकता है। यही नवरात्र का वास्तविक अर्थ है, यही शक्ति-उपासना का मर्म और यही भारतीय अध्यात्म का शाश्वत संदेश—अपने अंतःकरण में छिपी दैवी शक्ति को जागृत करें, क्योंकि भीतर का प्रकाश ही जीवन को भय, मोह और अज्ञान के अंधकार से बाहर निकालने का मार्ग दिखाता है।





Suresh-gandhi


सुरेश गांधी

वरिष्ठ पत्रकार 

पत्रकार

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