ट्रंप ने इजराइल में मतदान से कुछ दिन पहले नेतन्याहू की पुन: प्रधानमंत्री बनने की कोशिश का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया। नेतन्याहू ने कहा, “दो साल में कोई ऐसा राष्ट्रपति (अमेरिका में) सत्ता में आ सकता है, चाहे वह पुरुष हो या महिला, जो इजराइल के प्रति बेहद शत्रुतापूर्ण रवैया रखता हो।” उन्होंने सवाल किया, “आप ऐसी स्थिति से कैसे निपटेंगे? आप अमेरिका के साथ अपने संबंधों को किस तरह संभालेंगे? और इसके अलावा, किन समाधानों की जरूरत होगी?” इजराइली प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप के कार्यकाल के बचे हुए वर्षों का इस्तेमाल इजराइल को अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए करना चाहिए। उन्होंने कहा कि साथ ही, अमेरिका की नीति में संभावित बड़े बदलाव के लिए भी तैयार रहना चाहिए। उन्होंने कहा, “पहली बात यह है कि हमें अगले दो वर्षों के दौरान और उसके बाद के दो वर्षों में भी अमेरिका के साथ हरसंभव प्रयास करना चाहिए।” नेतन्याहू ने कहा, “दूसरी बात यह है कि हमें दूसरे गठबंधन बनाने चाहिए। मैं अभी अपने क्षेत्र और इसके बाहर के कई देशों के साथ इसी दिशा में काम कर रहा हूं। भारत कोई छोटा देश नहीं है। और अन्य कई देश भी हैं।” उन्होंने लातिन अमेरिका में राजनीतिक घटनाक्रम को इजराइल के सहयोगी देशों का दायरा बढ़ाने के एक अन्य अवसर के रूप में पेश किया।
नेतन्याहू ने कहा, “लातिन अमेरिका में बड़ा बदलाव हो रहा है और कुछ ही दिनों में ब्राजील में भी बहुत बड़ा बदलाव हो सकता है। हमें अपने गठबंधनों का दायरा बढ़ाना चाहिए और ऐसी क्षमताएं विकसित करनी चाहिए, जिससे हम( इजराइल) सभी के लिए उपयोगी बन सकें।” नेतन्याहू अक्सर भारत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ अपने संबंधों का उल्लेख करते रहे हैं। इसके जरिए वह यह बताने की कोशिश करते हैं कि इजराइल वैश्विक स्तर पर अलग-थलग नहीं है और उनकी सरकार ने कूटनीतिक मोर्चे पर सफलता हासिल की है। लंबे समय से जारी युद्ध के बीच इजराइल की स्वीकार्यता पर उठ रहे सवालों और गठबंधन मजबूत करने की जरूरत के संदर्भ में नेतन्याहू ने इस साल मई में एक चर्चित बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि भारत जैसी ‘बड़ी ताकत’ के साथ इजराइल के ‘विशिष्ट संबंध’ हैं और भारत में इजराइल के लिए ‘जबरदस्त प्यार’ है। इजराइल के कई विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं और समर्थकों में इजराइल के प्रति बढ़ती उदासीनता की वजह नेतन्याहू द्वारा लिए गए कई गलत फैसले हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, डेमोक्रेटिक पार्टी के पूर्व राष्ट्रपतियों बराक ओबामा और जो बाइडेन के साथ नेतन्याहू के संबंध अक्सर तनावपूर्ण रहे। हालांकि नेतन्याहू ने इन मतभेदों को अपने समर्थकों के सामने एक मजबूत नेता के साहस के रूप में पेश किया, जो इजराइल के हितों की रक्षा के लिए अमेरिकी राष्ट्रपतियों के सामने भी अपनी बात रखने से नहीं हिचकता। उनके मुताबिक, यह रणनीति नेतन्याहू के चुनाव अभियानों का एक प्रमुख आधार रही है और उन्हें चुनावी सफलता दिलाने में भी मददगार साबित हुई है। नेतन्याहू इजराइल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं। आगामी चुनाव में नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गादी आइजेनकोट ने उनकी सुरक्षा नीति की तीखी आलोचना की है। उन्होंने इसे गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के बजाय एक खोखली राजनीतिक कवायद बताया। आइजेनकोट ने कहा, “चुनाव से नौ दिन पहले और इजराइल के इतिहास की सबसे गंभीर विफलता तथा त्रासदी के तीन साल बाद, जब युद्ध के सभी मोर्चे अब भी खुले हैं, नेतन्याहू ने जनता के सामने अपनी ‘सुरक्षा नीति’ पेश करने का फैसला किया।” उन्होंने कहा, ‘‘नारेबाजी से भरे दो खोखले पन्ने, जिनका सुरक्षा नीति से कोई लेना-देना नहीं है, यह दिखाते हैं कि नेतन्याहू ने इजराइल को किस रणनीतिक शून्य में छोड़ दिया है और उन्हें इजराइली नागरिकों की सुरक्षा की कितनी कम परवाह है।”

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