महिला पत्रकार की ओर से अधिवक्ता साइमन फारूकी ने याचिका दायर की थी। संक्षिप्त सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने कहा कि महिला पत्रकार को उच्चतम न्यायालय से पहले ही संरक्षण मिल चुका है। अदालत ने महिला पत्रकार के एक पुरुष सहकर्मी की उस याचिका पर सुनवाई भी स्थगित कर दी, जिसमें उसके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करने का अनुरोध किया गया है। दिल्ली पुलिस ने नयी दिल्ली जिले के कनॉट प्लेस उपमंडल में तैनात एसीपी भगत की शिकायत पर स्वतंत्र पत्रकार और अन्य लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। भगत ने आरोप लगाया था कि विरोध प्रदर्शन के दौरान उनके खिलाफ जातिसूचक टिप्पणियां की गईं, उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया और उनकी मानहानि की गई। प्राथमिकी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की संबंधित धाराओं तथा भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 221 (लोक सेवक को कर्तव्य निर्वहन से रोकना), धारा 356(2) (मानहानि) और धारा 3(5) (साझा मंशा) के तहत दर्ज की गई है। प्राथमिकी के अनुसार, भगत तीन अक्टूबर को जंतर-मंतर के पास बूटा सिंह गोलचक्कर के निकट कानून-व्यवस्था संबंधी ड्यूटी कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने कथित तौर पर महिला पत्रकार को सार्वजनिक रूप से उनकी मेघ/मेघवाल जाति के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करते और एसीपी के पद पर उनकी नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए सुना। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उन्होंने इन टिप्पणियों को नजरअंदाज किया और अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन जारी रखा। हालांकि, उसी दिन अपराह्न करीब तीन बजे महिला पत्रकार ने कथित तौर पर प्रदर्शनकारियों को संभालने और हिरासत में लेने के दौरान उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। इसके बाद उन्होंने अपने सहकर्मियों के साथ बार-बार भगत से बहस की जिससे उनके आधिकारिक काम में बाधा पहुंची। भगत ने यह भी आरोप लगाया कि महिला पत्रकार और कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के कुछ सदस्यों अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका, सौरव दास और रत्ना सिंह ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ और इंस्टाग्राम पर पोस्ट तथा रील साझा कीं, जिनमें उन पर आरोप लगाए गए थे।
नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक महिला पत्रकार की उस याचिका पर तत्काल आदेश देने से इनकार कर दिया, जिसमें इस महीने की शुरुआत में जंतर-मंतर के पास एक विरोध प्रदर्शन के दौरान एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ कथित जातिसूचक टिप्पणी करने और उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के आरोप में दर्ज मामले की जांच पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया है। न्यायमूर्ति मिनी पुष्कर्णा ने समय की कमी का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस का पक्ष सुने बिना कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि मामले पर दशहरा अवकाश के बाद सुनवाई होगी। उच्च न्यायालय 19 अक्टूबर से 26 अक्टूबर तक बंद रहेगा। इससे पहले, महिला पत्रकार ने सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) विवेक भगत के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी। दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा इस शिकायत की जांच कर रही है। महिला पत्रकार के वकील ने मामले की जांच पर रोक लगाने का आदेश देने का अनुरोध किया। इस पर न्यायाधीश ने कहा, ‘‘नहीं, इस तरह नहीं। उनका पक्ष सुने बिना मैं कोई आदेश पारित नहीं कर सकती।’’ न्यायाधीश ने कहा, ‘‘मैं इस तरह कोई आदेश पारित नहीं कर सकती। याचिकाकर्ताओं के वकील द्वारा जताई गई तात्कालिकता को देखते हुए मामले को 27 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।’’ महिला पत्रकार के वकील ने कहा कि यह ऐसा मामला है, जिसमें प्राथमिकी की जांच पर पूरी तरह रोक लगाने का आदेश आज ही दिया जाना चाहिए। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को महिला पत्रकार के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के वकील को उच्च न्यायालय के समक्ष यह आश्वासन देना चाहिए कि महिला पत्रकार के खिलाफ आगे कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। वकील ने आरोप लगाया कि एसीपी ने महिला पत्रकार को उनके खिलाफ दर्ज शिकायत पर आगे कार्रवाई करने से रोकने और डराने के लिए ही प्राथमिकी दर्ज कराई थी।

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